BREAKING
Revolutionary climate technology breakthrough announced • Championship finals draw record 150M+ viewers • Global markets surge following policy changes • New discovery in quantum computing promises faster processors
The Cliff News
Regional

करुणाधाम में तीन दिवसीय महायज्ञ संपन्न, महालक्ष्मी की भव्य आरती

भोपाल में करुणाधाम आश्रम में 23 जुलाई से शुरू हुआ त्रिदिवसीय सार्वभौम दिग्विजय महायज्ञ आज पूर्णाहुति और महालक्ष्मी की भव्य आरती के साथ संपन्न हुआ।

Jul 25
2 मिनट में पढ़ें
करुणाधाम में तीन दिवसीय महायज्ञ संपन्न, महालक्ष्मी की भव्य आरती

द क्लिफ न्यूज़ | भोपाल | 25 जुलाई 2026

करुणाधाम आश्रम, नेहरू नगर, भोपाल में श्री महालक्ष्मी देवालय स्थापना महोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित त्रिदिवसीय सार्वभौम दिग्विजय महायज्ञ का समापन आज पूर्णाहुति और मां महालक्ष्मी की भव्य दिव्य आरती के साथ हुआ। पीठाधीश्वर गुरुदेव श्री सुदेश जी शांडिल्य महाराज के सानिध्य में संपन्न हुए इस महायज्ञ में 5108 वैदिक मंत्रों के साथ गौ घृत से आहुति दी गई।

यह अनुष्ठान 23 जुलाई को शुरू हुआ था। इसके पहले दो दिनों में शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया था, जिसमें संगीत और वाद्य यंत्रों की प्रस्तुतियों ने समा बांधा। तीसरे और अंतिम दिवस पर अश्वमेध मंत्रों के साथ आहुति संपन्न हुई, जिसके पश्चात अश्व की शोभायात्रा निकाली गई। यजमान को सिंहासन पर आरूढ़ कराकर धर्म दंड प्रदान किया गया।

सनातन परंपरा में महायज्ञ का महत्व

श्री सुदेश जी शांडिल्य महाराज ने इस त्रिदिवसीय महायज्ञ का अनुष्ठान सनातन परंपरा के अनुसार संपन्न करवाया। उन्होंने बताया कि विश्व के भूमंडल पर भारत की सनातन वैदिक चिंतन धारा की सार्वलौकिक, सर्व सामाजिक, सार्वकालिक मंगलकामना, अभ्युदय एवं सुशांति के लिए कर्मकांड के विविध प्रकार ऋषियों द्वारा अनादि काल से संपादित किए जाते रहे हैं। विशेष रूप से भूमंडल पर भारतीय मेधा के बौद्धिक दिग्विजय की कामना सर्वोपरि रही है। दर्शपूर्णमासेष्टि, राजसूय याग, वाजपेय याग, अश्वमेध याग, सर्व सामाजिक संवाद याग इत्यादि इसके उदाहरण हैं। इन यागों के माध्यम से ही सनातन मेधा ने वैश्विक सभ्यता को अपने लोक कल्याणकारी उद्देश्यों को प्रसारित किया है।

यज्ञ के विभिन्न चरण

यज्ञ के प्रथम दिवस पंचांग प्रयोग, जल यात्रा, अश्व पूजन, मंडप प्रवेश, चतुषष्ठी योगिनी मंडल, भद्र मंडल, ग्रह मंडल, रुद्र मंडल की स्थापना और अरणीमंथन द्वारा अग्नि का आधान किया गया। द्वितीय दिवस नित्य पूजन, ब्राह्मणवरण, दक्षिण अग्नि में अग्नि की स्थापना, शुक्ल यजुर्वेद के मंत्रों में वाजपेय, राजसूय, सौत्रामणि, रुद्र सूक्त तथा शुक्ल यजुर्वेद के अध्याय 28.21 एवं 23 से घृत की आहुति दी गई। इसी दिन राजसूय यज्ञ के अंतर्गत मंडप पर तुरीय संगीत और सितार वादन का कार्यक्रम भी संपन्न हुआ। अंतिम दिवस नित्य पूजन, ब्राह्मण पूजन और अश्वमेध मंत्रों से आहुति के उपरांत अश्व की शोभायात्रा निकली। यजमान का द्वार-पूजन और सत्कार हुआ। द्वार से मंडप तक नृत्य प्रस्तुति व मंगल वाद्य, सितार वादन की प्रस्तुतियां दी गईं। तत्पश्चात यजमान को धर्म दंड प्रदान किया गया, जिसके बाद अभिषेक, पूर्णाहुति और महाआरती के साथ अनुष्ठान का समापन हुआ।