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कार्पल टनल सिंड्रोम: कलाई की नस दबने से हाथ की पकड़ तक प्रभावित

कार्पल टनल सिंड्रोम (CTS) एक न्यूरोपैथी है जिसमें कलाई की मीडियन नर्व पर दबाव पड़ता है। शुरुआती लक्षण सुन्नपन और झुनझुनी होते हैं, लेकिन गंभीर होने पर हाथ की पकड़ भी प्रभावित हो सकती है।

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कार्पल टनल सिंड्रोम: कलाई की नस दबने से हाथ की पकड़ तक प्रभावित

द क्लिफ न्यूज़ | 6 अक्टूबर 2026

कार्पल टनल सिंड्रोम (CTS) एक सामान्य समस्या है जो कलाई में मीडियन नर्व पर दबाव पड़ने से उत्पन्न होती है। यह नर्व अंगूठे, तर्जनी, मध्यमा और रिंग फिंगर के आधे हिस्से की संवेदना के साथ-साथ अंगूठे की कुछ महत्वपूर्ण मांसपेशियों की गतिविधियों को भी नियंत्रित करती है। प्रारंभिक चरणों में, इस स्थिति के मुख्य लक्षण सुन्नपन और झुनझुनी के रूप में सामने आते हैं। हालांकि, यदि मीडियन नर्व पर दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो यह हाथ की पकड़ की शक्ति को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है, जिससे दैनिक गतिविधियों में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

कार्पल टनल कलाई के सामने स्थित एक संकरी जगह है, जिसके ऊपर ट्रांसवर्स कार्पल लिगामेंट होता है। इसी संकरी जगह से मीडियन नर्व के साथ-साथ उंगलियों को मोड़ने वाले फ्लेक्सर टेंडन भी गुजरते हैं। जब इस टनल के भीतर दबाव बढ़ता है, तो मीडियन नर्व दब जाती है, जिससे CTS के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

कार्पल टनल सिंड्रोम के प्रमुख लक्षण

इस सिंड्रोम के सबसे आम लक्षणों में अंगूठे, तर्जनी, मध्यमा और अनामिका उंगली के एक हिस्से में सुन्नपन, झुनझुनी, जलन और कभी-कभी बिजली के झटके जैसा एहसास शामिल है। कई मरीज़ों में ये लक्षण रात के समय और भी बढ़ जाते हैं, जिससे उनकी नींद बाधित हो जाती है। ऐसे में, मरीज़ अक्सर राहत पाने के लिए अपने हाथों को हिलाते या झटकते हैं। लंबे समय तक मोबाइल फोन का उपयोग करने, वाहन चलाने या कलाई को एक ही स्थिति में मोड़कर रखने से भी हाथ सुन्न पड़ सकते हैं। कुछ मामलों में, दर्द कलाई से आगे बढ़कर अग्रबाहु और कोहनी तक महसूस हो सकता है।

मोटर नर्व पर पड़ने वाला प्रभाव

गंभीर या लंबे समय तक बने रहने वाले कार्पल टनल सिंड्रोम में, मीडियन नर्व की मोटर शाखा भी प्रभावित हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप अंगूठे के अपोजिशन (यानी अंगूठे को अन्य उंगलियों से मिलाना) और एब्डक्शन (यानी अंगूठे को उंगलियों से दूर ले जाना) जैसी गतियों में कमजोरी आ सकती है। समय के साथ, अंगूठे के आधार पर स्थित थेनार मांसपेशियों में कमजोरी और एट्रोफी (सूखापन) भी विकसित हो सकती है। थेनार एमिनेंस का चपटा होना इस स्थिति का एक महत्वपूर्ण संकेत है। इस स्थिति के कारण पेन पकड़ना, बटन लगाना, छोटी वस्तुओं को उठाना, वस्तुओं को उंगलियों के बीच दबाना (पिंचिंग) और हाथ से किए जाने वाले अन्य बारीक कामों में काफी परेशानी हो सकती है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि CTS में सामान्यतः 'क्लॉ हैंड' (पंजा जैसी विकृति) नहीं बनती; रिंग और छोटी उंगली में 'क्लॉइंग' जैसी विकृति अक्सर अलनार नर्व की समस्या से संबंधित होती है।

निदान की प्रक्रिया

कार्पल टनल सिंड्रोम का निदान करने के लिए, चिकित्सक सबसे पहले मरीज़ के लक्षणों का विस्तृत विवरण लेते हैं और फिर हाथ तथा कलाई की शारीरिक जांच करते हैं। निदान की पुष्टि के लिए कुछ विशिष्ट परीक्षण किए जाते हैं। फेलन टेस्ट (Phalen's test) में, मरीज़ की कलाई को कुछ देर तक मोड़कर रखने के लिए कहा जाता है ताकि लक्षणों की उत्पत्ति की जांच की जा सके। टिनेल साइन (Tinel's sign) परीक्षण में, चिकित्सक कार्पल टनल वाले क्षेत्र पर हल्के से टैप करते हैं ताकि झुनझुनी जैसी प्रतिक्रिया की जांच की जा सके। डर्कन कार्पल कंप्रेशन टेस्ट (Durkan's carpal compression test) में, कार्पल टनल पर सीधे दबाव डालकर लक्षणों की गंभीरता का आकलन किया जाता है। इसके अतिरिक्त, अंगूठे की पकड़ और पिंच स्ट्रेंथ (पकड़ने की क्षमता) तथा थेनार मांसपेशियों की स्थिति का मूल्यांकन भी किया जाता है।

अधिक जटिल मामलों में या निदान की पुष्टि के लिए, नर्व कंडक्शन स्टडी (NCS) और इलेक्ट्रोमायोग्राफी (EMG) जैसे परीक्षणों का सहारा लिया जा सकता है। NCS के माध्यम से यह मापा जाता है कि नर्व कितनी तेजी से सिग्नल भेज रही है, जबकि EMG मांसपेशियों की विद्युत गतिविधि का विश्लेषण करता है। हल्के CTS में, मुख्य रूप से संवेदी नर्व का चालन धीमा पाया जा सकता है। हालांकि, अधिक गंभीर अवस्थाओं में, मोटर चालन में भी बदलाव, नर्व सिग्नल का कमजोर होना और एक्सोनल क्षति (नर्व फाइबर का नुकसान) जैसे निष्कर्ष सामने आ सकते हैं। हाई-रिजॉल्यूशन अल्ट्रासाउंड (High-resolution ultrasound) का उपयोग मीडियन नर्व के क्रॉस-सेक्शनल एरिया में वृद्धि, नर्व के चपटे होने, टेनोसिनोवाइटिस (टेंडन की सूजन) या अन्य संरचनात्मक कारणों का पता लगाने के लिए भी किया जा सकता है, जो नर्व पर दबाव डाल रहे हों।

उपचार और प्रबंधन

हल्के से मध्यम श्रेणी के कार्पल टनल सिंड्रोम के लिए, प्रारंभिक उपचार के तौर पर रात में न्यूट्रल-पोजीशन रिस्ट स्प्लिंट (neutral-position wrist splint) का उपयोग बहुत प्रभावी हो सकता है। यह स्प्लिंट कलाई को आराम की स्थिति में रखता है, जिससे नर्व पर पड़ने वाला तनाव कम होता है। इसके अलावा, ऐसी गतिविधियों से बचना चाहिए जिनमें कलाई को लंबे समय तक मोड़कर रखना पड़े, बार-बार कलाई को मोड़ने-सीधा करने का काम हो, मजबूत पकड़ बनाए रखनी पड़े या कंपन वाले उपकरणों का उपयोग करना पड़े।

मधुमेह (डायबिटीज), हाइपोथायरायडिज्म, मोटापा, या रूमेटॉइड गठिया जैसी सहवर्ती स्वास्थ्य स्थितियां भी CTS को बढ़ा सकती हैं। इसलिए, इन बीमारियों का उचित प्रबंधन भी उपचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कुछ मरीज़ों को कार्पल टनल में कॉर्टिकोस्टेरॉइड इंजेक्शन से अस्थायी राहत मिल सकती है, लेकिन गंभीर और लगातार नर्व कम्प्रेशन के मामलों में इसे स्थायी समाधान नहीं माना जाता। दर्द निवारक दवाएं केवल दर्द को कम करने में मदद कर सकती हैं, लेकिन ये मीडियन नर्व पर पड़ने वाले यांत्रिक दबाव को सीधे दूर नहीं करतीं। विटामिन सप्लीमेंट्स का उपयोग केवल तभी उचित है जब किसी विशेष विटामिन की वास्तविक कमी हो।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार सुन्नपन महसूस हो रहा हो, हाथ की कमजोरी बढ़ रही हो, या थेनार मांसपेशियों में क्षय के लक्षण दिखाई दे रहे हों, तो उन्हें समय रहते विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। क्योंकि नर्व पर लंबे समय तक पड़ने वाला दबाव स्थायी क्षति का कारण बन सकता है, जिसका उपचार जटिल हो जाता है।