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कंधे के दर्द और अकड़न का प्रमुख कारण: प्राइमरी ग्लेनोह्यूमरल ऑस्टियोआर्थराइटिस

प्राइमरी ग्लेनोह्यूमरल ऑस्टियोआर्थराइटिस एक अपक्षयी रोग है, जो कंधे के जोड़ को प्रभावित करता है। इससे दर्द, अकड़न और कार्यक्षमता में कमी आती है।

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कंधे के दर्द और अकड़न का प्रमुख कारण: प्राइमरी ग्लेनोह्यूमरल ऑस्टियोआर्थराइटिस

द क्लिफ न्यूज़ | 11 अक्टूबर 2026

प्राइमरी ग्लेनोह्यूमरल ऑस्टियोआर्थराइटिस, कंधे के जोड़ को प्रभावित करने वाली एक प्रमुख अपक्षयी बीमारी है। इस स्थिति में, ह्यूमरस (बांह की ऊपरी हड्डी) और ग्लेनॉइड (कंधे की कटोरी) के बीच मौजूद आर्टिकुलर कार्टिलेज, जो जोड़ों को चिकनाई प्रदान करती है, धीरे-धीरे घिसने लगती है। इसके परिणामस्वरूप कंधे में असहनीय दर्द, अकड़न, क्रेपिटस (जोड़ों से चरमराहट जैसी आवाज) और हाथ की गतिविधियों में गंभीर कमी आ जाती है। हालांकि कंधा शरीर का भार उठाने वाला प्रमुख जोड़ नहीं है, फिर भी इस गठिया के बढ़ने पर व्यक्ति की दैनिक गतिविधियां गंभीर रूप से बाधित होने लगती हैं।

इस बीमारी का सबसे प्रमुख लक्षण कंधे में गहराई तक महसूस होने वाला दर्द है। शुरुआती चरणों में, यह दर्द विशेष रूप से हाथ उठाते समय, भारी वस्तुएँ पकड़ते समय, या कंधे का अधिक उपयोग करने पर ही होता है। परंतु, जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, यह दर्द आराम करते समय और यहाँ तक कि रात में भी व्यक्ति को परेशान कर सकता है। दर्द के साथ-साथ, जोड़ में धीरे-धीरे अकड़न बढ़ती जाती है। विशेष रूप से, हाथ को बाहर की ओर घुमाने (एक्सटर्नल रोटेशन) की क्षमता में उल्लेखनीय कमी आ जाती है। बाल संवारने, कपड़े पहनने, सिर के ऊपर रखी वस्तुओं को उठाने, या पीठ के पीछे हाथ ले जाने जैसी सामान्य क्रियाएं भी अत्यंत कठिन हो जाती हैं। कुछ रोगियों को अपने कंधे को हिलाते समय चरमराहट या रगड़ने जैसी आवाजें भी सुनाई दे सकती हैं, जो क्षतिग्रस्त कार्टिलेज का संकेत है।

निदान और परीक्षण की प्रक्रिया

प्राइमरी ग्लेनोह्यूमरल ऑस्टियोआर्थराइटिस के निदान के लिए चिकित्सक सर्वप्रथम रोगी के दोनों कंधों की सक्रिय (रोगी द्वारा की जाने वाली) और निष्क्रिय (चिकित्सक द्वारा की जाने वाली) गति की सीमा का सावधानीपूर्वक आकलन करते हैं। इसमें एक्सटर्नल रोटेशन, एब्डक्शन (हाथ को शरीर से दूर ले जाना) और इंटरनल रोटेशन (हाथ को शरीर की ओर लाना) जैसी महत्वपूर्ण गतियों का मूल्यांकन किया जाता है। इसके अतिरिक्त, रोटेटर कफ की मांसपेशियों, डेल्टॉइड (कंधे की प्रमुख मांसपेशी) और एक्सिलरी नर्व (तंत्रिका) की कार्यक्षमता की गहन जांच की जाती है। एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि यदि सक्रिय और निष्क्रिय दोनों गतियों में समान रूप से कमी है, तो यह ग्लेनोह्यूमरल गठिया का संकेत हो सकता है। वहीं, यदि दर्द की तुलना में मांसपेशियों की कमजोरी अधिक है, तो यह रोटेटर कफ की चोट की ओर इशारा करती है। रोगी की गर्दन की जांच भी आवश्यक है, ताकि सर्वाइकल रेडिकुलोपैथी (गर्दन की नस दबने) या शरीर के किसी अन्य हिस्से से उत्पन्न होने वाले दर्द की संभावना को खारिज किया जा सके।

नैदानिक इमेजिंग में, एक्स-रे इस बीमारी की प्रारंभिक जांच का सबसे महत्वपूर्ण और सुलभ माध्यम है। विभिन्न दृश्यों, जैसे कि ट्रू एपी (एंटीरियर-पोस्टीरियर) या ग्राशे व्यू और एक्सिलरी लेटरल व्यू, से जोड़ की स्थिति का विस्तृत आकलन किया जाता है। कुछ विशिष्ट मामलों में, स्कैपुलर-वाई व्यू का भी उपयोग किया जा सकता है। एक्स-रे में जोड़ के बीच की दूरी का कम होना, सबकोंड्रल स्क्लेरोसिस (हड्डी का सघन होना), हड्डी के भीतर सिस्ट (छोटी गांठें), ह्यूमरल हेड (ऊपरी बांह की हड्डी का सिर) पर ऑस्टियोफाइट्स (अतिरिक्त हड्डी का निर्माण) और ग्लेनॉइड (कंधे की कटोरी) के घिसाव जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। कई बार, ह्यूमरल हेड अपनी सामान्य स्थिति से पीछे की ओर खिसक जाता है। यदि हड्डियों की बनावट, ग्लेनॉइड के घिसाव या सर्जरी की योजना का अधिक विस्तृत और त्रि-आयामी (3D) आकलन आवश्यक हो, तो कंप्यूटेड टोमोग्राफी (CT) स्कैन एक अत्यंत उपयोगी उपकरण साबित होता है। वहीं, मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (MRI) कंधे के रोटेटर कफ, मांसपेशियों और अन्य मुलायम ऊतकों की स्थिति का गहन मूल्यांकन करने में सहायक है, जो गठिया के साथ-साथ होने वाली अन्य समस्याओं की पहचान में मदद करती है।

उपचार के विकल्प: रूढ़िवादी से सर्जिकल तक

प्राइमरी ग्लेनोह्यूमरल ऑस्टियोआर्थराइटिस की शुरुआती और मध्यम अवस्था में उपचार का प्राथमिक उद्देश्य दर्द को नियंत्रित करना और कंधे की कार्यक्षमता को यथासंभव बनाए रखना होता है। इसके लिए, चिकित्सकों द्वारा उन गतिविधियों से बचने की सलाह दी जाती है जो दर्द को बढ़ाती हैं, जैसे कि बार-बार सिर के ऊपर हाथ उठाना या भारी वजन उठाना। फिजियोथेरेपी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिसमें हल्के रेंज-ऑफ-मोशन व्यायाम (जोड़ों को धीरे-धीरे घुमाने वाले), स्कैपुला (कंधे की ब्लेड) के नियंत्रण वाले अभ्यास, और रोटेटर कफ को मजबूत करने वाले विशिष्ट व्यायाम शामिल किए जा सकते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि ये सभी व्यायाम रोगी की सहनशीलता और शारीरिक स्थिति के अनुसार ही किए जाएं।

दर्द निवारण के लिए, पैरासिटामोल या नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इन्फ्लेमेटरी दवाओं (NSAIDs) का उपयोग चिकित्सकीय सलाह के अनुसार किया जा सकता है। इन दवाओं का चयन करते समय, रोगी के गुर्दे (किडनी), हृदय और पेट संबंधी किसी भी मौजूदा जोखिम को ध्यान में रखना आवश्यक है, क्योंकि इन दवाओं के कुछ दुष्प्रभाव हो सकते हैं। कुछ चुनिंदा रोगियों में, जोड़ के भीतर कॉर्टिकोस्टेरॉइड इंजेक्शन से अस्थायी रूप से दर्द से राहत मिल सकती है। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि हाइलूरोनिक एसिड, प्लेटलेट-रिच प्लाज्मा (PRP), और स्टेम-सेल इंजेक्शन जैसे उपचारों को अभी तक कार्टिलेज पुनर्निर्माण के लिए प्रमाणित उपचार नहीं माना गया है और इनके प्रभाव सीमित हो सकते हैं।

जब गैर-सर्जिकल उपचार के सभी प्रयास विफल हो जाते हैं और रोगी को लगातार गंभीर दर्द और कार्यक्षमता में कमी का सामना करना पड़ता है, तो शोल्डर आर्थ्रोप्लास्टी (कंधे के जोड़ का प्रत्यारोपण) पर विचार किया जाता है। यदि रोटेटर कफ की मांसपेशियां अच्छी स्थिति में हैं और ग्लेनॉइड की हड्डी पर्याप्त रूप से मजबूत है, तो एनाटॉमिक टोटल शोल्डर आर्थ्रोप्लास्टी (जहां कृत्रिम जोड़ को शरीर की प्राकृतिक संरचना के अनुरूप लगाया जाता है) एक उपयुक्त विकल्प हो सकती है। इसके विपरीत, यदि रोटेटर कफ गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त है और मरम्मत योग्य नहीं है, या कफ टियर आर्थ्रोपैथी (गंभीर टियर के कारण होने वाली गठिया) जैसी स्थितियाँ हैं, अथवा कुछ जटिल हड्डीय विकृतियाँ मौजूद हैं, तो रिवर्स टोटल शोल्डर आर्थ्रोप्लास्टी (जहां कृत्रिम जोड़ के कुछ हिस्सों को पलट कर लगाया जाता है) पर विचार किया जाता है। सर्जरी का अंतिम निर्णय रोगी की उम्र, हड्डियों की बनावट, मांसपेशियों की वर्तमान स्थिति, समग्र चिकित्सकीय स्वास्थ्य और व्यक्तिगत अपेक्षाओं जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।

भविष्य की दिशा और प्रबंधन

प्राइमरी ग्लेनोह्यूमरल ऑस्टियोआर्थराइटिस के प्रभावी प्रबंधन में समय पर पहचान, सटीक इमेजिंग तकनीकों का उपयोग और प्रत्येक रोगी के लिए व्यक्तिगत उपचार योजना का निर्माण अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही निदान और एक व्यवस्थित पुनर्वास कार्यक्रम के माध्यम से, रोगी दर्द को बेहतर ढंग से नियंत्रित कर सकते हैं और अपने कंधे की कार्यक्षमता को बनाए रखने या उसमें सुधार करने में सफल हो सकते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि प्रभावित व्यक्ति गुणवत्तापूर्ण जीवन जी सके और अपनी दैनिक गतिविधियों को निर्बाध रूप से कर सके।

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