कंधे का दर्द: रोटेटर कफ रोग को न करें नज़रअंदाज़
40 वर्ष से अधिक आयु के लोगों, खिलाड़ियों और खास काम करने वालों में आम, कंधे का दर्द रोटेटर कफ डिज़ीज़ का संकेत हो सकता है। समय पर पहचान और उपचार से बिना सर्जरी संभव है रिकवरी।

द क्लिफ न्यूज़ | 4 अगस्त 2026
आज के समय में कंधे का दर्द एक आम समस्या के रूप में उभर रहा है, जो विशेष रूप से 40 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों, खिलाड़ियों, जिम जाने वालों और ऐसे लोगों को प्रभावित करता है जिनके काम में हाथ को बार-बार सिर के ऊपर उठाना पड़ता है। इस दर्द का एक प्रमुख कारण रोटेटर कफ डिज़ीज़ है। यदि इस बीमारी की समय पर पहचान कर उचित उपचार शुरू कर दिया जाए, तो अधिकांश मरीज बिना किसी सर्जरी के ही अपने सामान्य जीवन में लौट सकते हैं।
रोटेटर कफ, कंधे के जोड़ को स्थिरता प्रदान करने वाली चार महत्वपूर्ण मांसपेशियों और उनके टेंडन का एक जटिल समूह है। इसमें सुप्रास्पिनैटस, इन्फ्रास्पिनैटस, टेरेस माइनर और सबस्कैपुलरिस जैसी मांसपेशियां शामिल हैं। सुप्रास्पिनैटस हाथ को ऊपर उठाने की शुरुआती गति में सहायता करती है, जबकि इन्फ्रास्पिनैटस और टेरेस माइनर कंधे को बाहर की ओर घुमाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वहीं, सबस्कैपुलरिस मांसपेशी हाथ को अंदर की ओर घुमाने का कार्य करती है। इन मांसपेशियों या इनसे जुड़े टेंडन में सूजन, घिसाव या किसी प्रकार के फटने की समस्या को रोटेटर कफ डिज़ीज़ कहा जाता है।
रोटेटर कफ डिज़ीज़ के विभिन्न रूप और जोखिम कारक
रोटेटर कफ डिज़ीज़ के कई रूप हो सकते हैं, जिनमें रोटेटर कफ टेंडिनोपैथी, सबक्रोमियल इम्पिंजमेंट सिंड्रोम, पार्शियल (आंशिक) और फुल-थिकनेस (पूर्ण) रोटेटर कफ टियर (फटना), तथा कैल्सिफिक टेंडिनाइटिस प्रमुख हैं। उम्र बढ़ने के साथ टेंडन में स्वाभाविक रूप से होने वाले अपक्षयी परिवर्तन (Degenerative changes) इस बीमारी के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक हैं। इसके अलावा, बार-बार हाथों को सिर के ऊपर ले जाने वाली गतिविधियां, कंधे में लगी कोई चोट, अचानक गिर जाना, मधुमेह, धूम्रपान और खराब शारीरिक मुद्रा (Posture) भी इस बीमारी के खतरे को बढ़ा सकते हैं।
लक्षणों को पहचानना: कब लें चिकित्सक की सलाह?
रोटेटर कफ डिज़ीज़ का सबसे स्पष्ट लक्षण कंधे के बाहरी हिस्से में होने वाला दर्द है। यह दर्द हाथ को ऊपर उठाने, बाल संवारने, कपड़े पहनने या कोई वजन उठाने जैसी गतिविधियों के दौरान विशेष रूप से बढ़ जाता है। कई बार मरीज रात में प्रभावित करवट लेकर सोने पर तेज दर्द का अनुभव करते हैं, जिससे उनकी नींद बाधित होती है। समय के साथ, प्रभावित कंधे की मांसपेशी की ताकत धीरे-धीरे कम होने लगती है और हाथ को ऊपर उठाने में कठिनाई होने लगती है। अक्सर, 60 से 120 डिग्री के बीच हाथ उठाते समय दर्द में अत्यधिक वृद्धि देखी जाती है, जिसे 'पेनफुल आर्क' (Painful Arc) के नाम से जाना जाता है। गंभीर मामलों में, कंधे की गतिशीलता (Range of motion) भी सीमित हो सकती है।
निदान की प्रक्रिया: शारीरिक परीक्षण से लेकर एमआरआई तक
रोग के निदान के लिए चिकित्सक सबसे पहले रोगी का शारीरिक परीक्षण करते हैं। इस दौरान, वे नीयर इम्पिंजमेंट टेस्ट, हॉकिन्स-कैनेडी टेस्ट, खाली कैन (जोबे) टेस्ट, ड्रॉप आर्म टेस्ट, एक्सटर्नल रोटेशन लैग साइन, लिफ्ट-ऑफ टेस्ट और बेली प्रेस टेस्ट जैसे विशिष्ट परीक्षणों का उपयोग करते हैं। इन परीक्षणों से कंधे की मांसपेशियों और टेंडन की कार्यक्षमता का आकलन किया जाता है।
इसके अतिरिक्त, एक्स-रे की मदद से हड्डियों में होने वाले किसी भी असामान्य बदलाव, कैल्सीफिक जमाव (जैसे कैल्शियम के कण) और एक्रोमियल स्पर (हड्डी का असामान्य उभार) का पता लगाया जा सकता है। अल्ट्रासाउंड जांच टेंडन में सूजन और आंशिक फटने की जानकारी देने में सहायक होती है। हालांकि, रोटेटर कफ टेंडन के फटने की सीमा, मांसपेशियों की वर्तमान स्थिति और सर्जरी की आवश्यकता का सबसे सटीक आकलन करने के लिए मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) को सबसे विश्वसनीय जांच विधि माना जाता है।
उपचार के विकल्प: गैर-सर्जिकल से लेकर सर्जिकल हस्तक्षेप तक
अधिकांश रोटेटर कफ डिज़ीज़ के मामलों में, उपचार की शुरुआत बिना सर्जरी के ही की जाती है। इसमें सबसे पहले उन गतिविधियों से बचना शामिल है जो दर्द को बढ़ाती हैं। नियमित फिजियोथेरेपी और कंधे की गति को बनाए रखने वाले व्यायाम, साथ ही रोटेटर कफ और स्कैपुलर स्टेबलाइजर मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम उपचार योजना का एक अभिन्न अंग हैं। दर्द को नियंत्रित करने के लिए डॉक्टर पैरासिटामोल या नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स (NSAIDs) जैसी दवाओं की सलाह दे सकते हैं। तीव्र दर्द की स्थिति में, बर्फ की सिकाई राहत प्रदान कर सकती है। कुछ विशेष मामलों में, सबक्रोमियल कॉर्टिकोस्टेरॉइड इंजेक्शन और अल्ट्रासाउंड-निर्देशित पुनर्वास (rehabilitation) भी प्रभावी साबित हो सकते हैं।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि प्रीगैबलिन और डुलोक्सेटीन जैसी दवाएं रोटेटर कफ डिज़ीज़ के नियमित उपचार का हिस्सा नहीं हैं। इनका उपयोग केवल उन चयनित मरीजों के लिए किया जाता है, जिनमें तीन महीने से अधिक समय से लगातार दर्द बना हुआ हो और साथ ही सेंट्रल सेंसिटाइजेशन, मायोफेशियल पेन सिंड्रोम, अवसाद (Depression), चिंता विकार (Anxiety disorders) या न्यूरोपैथिक दर्द (Neuropathic pain) जैसी सह-मौजूदा समस्याएं भी मौजूद हों।
सर्जरी की आवश्यकता कब होती है?
सर्जरी की आवश्यकता उन परिस्थितियों में उत्पन्न हो सकती है जहां अचानक लगी गंभीर चोट के कारण रोटेटर कफ का पूरा टेंडन फट गया हो। यदि तीन से छह महीने तक उचित गैर-सर्जिकल उपचार के बावजूद दर्द और कंधे की कार्यक्षमता में सुधार न हो, कंधे में अत्यधिक कमजोरी बनी रहे, या सक्रिय व्यक्तियों में एक बड़ा टियर पाया जाए, तो सर्जिकल हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है। वर्तमान में, आर्थ्रोस्कोपिक रोटेटर कफ रिपेयर (Arthroscopic rotator cuff repair) सबसे अधिक की जाने वाली सर्जिकल प्रक्रिया है, जिसमें छोटे चीरों के माध्यम से सर्जरी की जाती है। कुछ जटिल मामलों में, सबक्रोमियल डीकंप्रेशन (Subacromial decompression), डेब्राइडमेंट (Debridement) या रिवर्स शोल्डर आर्थ्रोप्लास्टी (Reverse shoulder arthroplasty) जैसी प्रक्रियाओं की भी आवश्यकता पड़ सकती है।
संक्षेप में, रोटेटर कफ डिज़ीज़ से प्रभावी ढंग से राहत पाने के लिए समय पर रोग की पहचान, सटीक निदान और विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह के अनुसार उपचार अत्यंत महत्वपूर्ण है। उचित फिजियोथेरेपी, नियमित व्यायाम, जीवनशैली में आवश्यक बदलाव और निरंतर चिकित्सकीय देखरेख के माध्यम से अधिकांश मरीज अपनी सामान्य दैनिक गतिविधियों को सफलतापूर्वक फिर से शुरू कर सकते हैं। कंधे के दर्द को कभी भी सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर यदि यह लंबे समय तक बना रहे या हाथ उठाने में महत्वपूर्ण कठिनाई हो। ऐसे में, शीघ्रता से एक विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना ही सर्वोत्तम उपाय है।
