कामाख्या देवी: 12 को सावन अमावस्या पर भव्य मेले का आयोजन
प्रतागढ़ के कामाख्या देवी मंदिर में 12 अगस्त को सावन अमावस्या पर भव्य मेला लगेगा। 130 फीट ऊंचा झरना और रहस्यमयी गुफा श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।

द क्लिफ न्यूज़ | 11 अगस्त 2026
राजस्थान की सीमा से सटे प्रतागढ़ जिले के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों के बीच स्थित अतिप्राचीन कामाख्या देवी (कामाता देवी) मंदिर, जिसे 'छोटी वैष्णो देवी' के नाम से भी जाना जाता है, श्रद्धालुओं के लिए आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। यह सुरम्य स्थल प्रकृति प्रेमियों के लिए भी किसी जन्नत से कम नहीं है, जो जमीन की सतह से करीब 400 फीट नीचे, मेरियाखेड़ी और खोरिया गांवों के बीच स्थित है।
हालांकि यहां पहुंचने का मार्ग 'कठिन' बताया जाता है, जिसमें बड़ी-बड़ी चट्टानें, पथरीले रास्ते और घने जंगल शामिल हैं, लेकिन भक्तों की अटूट आस्था इन दुश्वारियों को पार कर मां के दरबार तक ले जाती है। अरावली की पहाड़ियों की गोद में बसे इस स्थान की प्राकृतिक सुंदरता आगंतुकों को मंत्रमुग्ध कर देती है।
बारिश में झरने का मनमोहक दृश्य
बारिश के मौसम में, विशेष रूप से इस क्षेत्र में, लगभग 130 फीट की ऊंचाई से गिरता पानी का झरना एक प्रमुख आकर्षण का केंद्र बनता है। चारों ओर फैली हरियाली, पहाड़ियों से टकराती ठंडी हवाएं और झरने की कल-कल करती धाराएं यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर खींच लाती हैं। झरने के नीचे प्रकृति के मनोरम दृश्यों का आनंद लेने वाले लोग कुछ पल के लिए जीवन की भागदौड़ और तनाव को भूल जाते हैं। यह नज़ारा इतना मनमोहक होता है मानो प्रकृति ने स्वयं अपने हाथों से इस जगह की तस्वीर संवारी हो।
गुफा का रहस्य और देवी का चमत्कार
कामाख्या देवी स्थल की एक और अनूठी विशेषता लगभग 20 फीट गहरी सुरंगनुमा गुफा है, जो श्रद्धालुओं के लिए कौतूहल का विषय बनी हुई है। मान्यता है कि अप्रैल-मई की भीषण गर्मी के महीनों में भी इस गुफा से पानी निकलता रहता है। श्रद्धालु बताते हैं कि गुफा में बांस की लकड़ी हिलाने पर पानी आ जाता है, जिसे वे मां कामाख्या की कृपा और एक चमत्कार मानते हैं। यह रहस्यमय गुण इस स्थान को और भी अधिक आध्यात्मिक बना देता है।
सावन अमावस्या पर भव्य मेले की तैयारी
इस वर्ष, 12 अगस्त 2026, बुधवार को सावन अमावस्या के अवसर पर कामाख्या देवी मंदिर परिसर में एक दिवसीय भव्य मेले का आयोजन किया जाएगा। ग्राम पंचायत केशरपुरा और मंदिर समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित होने वाले इस मेले में राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात सहित आसपास के कई जिलों से हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। मेले के दौरान, मनिहारी सामग्री, चटपटे व्यंजन, खिलौने और विभिन्न प्रकार की दुकानें सजेंगी, जहाँ श्रद्धालु मां के दर्शन के साथ-साथ खरीदारी का भी आनंद लेंगे। सावन अमावस्या पर यहां आस्था का सैलाब उमड़ता है और पूरा क्षेत्र मेले की रौनक में रंग जाता है।
विकास की बाट जोह रहा पर्यटन स्थल
अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व के बावजूद, कामाख्या देवी स्थल आज भी अपेक्षित विकास से दूर है। यहां पहुंचने के लिए सुगम मार्ग, पर्याप्त सुविधाएं और पर्यटन विकास की सख्त आवश्यकता है। यदि स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग इस स्थल की ओर ध्यान दें और मूलभूत सुविधाओं का विस्तार करें, तो यह क्षेत्र न केवल धार्मिक पर्यटन बल्कि प्राकृतिक पर्यटन का भी एक बड़ा केंद्र बन सकता है।
अनूठा पूजा-अर्चना का विधान
कामाख्या देवी का यह प्राचीन मंदिर अपनी पूजा-अर्चना की विधि के कारण भी अनूठा है। यहां माता की पूजा-अर्चना के लिए कोई अधिकृत पुजारी नियुक्त नहीं है। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु स्वयं ही मां के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं। यह व्यवस्था इस विश्वास को दर्शाती है कि “जिसके मन में श्रद्धा, उसके लिए मां का दरबार सदा खुला है।”
वन्यजीवों का खतरा और सूर्यास्त के बाद सन्नाटा
घने जंगल और कंदराओं के बीच स्थित होने के कारण, इस स्थान पर कभी-कभी हिंसक वन्यजीवों के देखे जाने की भी सूचना मिलती है। इसी कारणवश, श्रद्धालु और पर्यटक आमतौर पर सूर्यास्त से पहले ही इस क्षेत्र से लौट जाते हैं। शाम ढलते ही, यह इलाका दिन की चहल-पहल के विपरीत सन्नाटे में डूब जाता है, जो इसके जंगली और एकांत स्वरूप को दर्शाता है।
प्राकृतिक सौंदर्य, रोमांच, गहरी आस्था और अनसुलझे रहस्य का संगम कामाख्या देवी मंदिर का एक अनूठा अनुभव प्रदान करता है। यही कारण है कि कहा जाता है कि “एक बार जो यहां आया, वह इस जगह की यादें दिल में बसाकर ही लौटता है।”
