कलाई के दर्द का कारण: रेडिओकार्पल आर्थराइटिस के लक्षण और उपचार
रेडिओकार्पल आर्थराइटिस कलाई के जोड़ को प्रभावित करता है, जिससे गंभीर दर्द, जकड़न और दैनिक कार्यों में कठिनाई होती है। यह चोटों के बाद विकसित हो सकता है और इसके निदान व उपचार के कई तरीके उपलब्ध हैं।

द क्लिफ न्यूज़ | 22 अक्टूबर 2026
कलाई में असहनीय दर्द, जकड़न और पकड़ में कमजोरी जैसी समस्याएँ अक्सर लोगों को परेशान करती हैं। इन लक्षणों के पीछे एक प्रमुख कारण रेडिओकार्पल आर्थराइटिस हो सकता है, जो कलाई के जोड़ को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाली एक अपक्षयी (degenerative) बीमारी है। यह बीमारी विशेष रूप से कलाई में हुई फ्रैक्चर या लिगामेंट की चोट के बाद विकसित हो सकती है, जिससे दैनिक गतिविधियों को अंजाम देना भी दूभर हो जाता है।
रेडिओकार्पल आर्थराइटिस में, कलाई के जोड़ का वह उपास्थि (articular cartilage) क्षतिग्रस्त हो जाता है जो डिस्टल रेडियस (हाथ की ऊपरी हड्डी) और कार्पल हड्डियों, विशेष रूप से स्केफॉइड और ल्यूनेट, के बीच स्थित होती है। यह उपास्थि हड्डियों के बीच घर्षण को कम करती है और जोड़ की सुचारु गति सुनिश्चित करती है। इसके क्षतिग्रस्त होने पर हड्डियों के बीच सीधा संपर्क होने लगता है, जिससे दर्द और अकड़न महसूस होती है।
आघातजन्य गठिया: चोटों का दीर्घकालिक प्रभाव
इस रोग का एक मुख्य कारण आघातजन्य गठिया (traumatic arthritis) है। जब डिस्टल रेडियस के इंट्रा-आर्टिकुलर फ्रैक्चर (जोड़ के भीतर होने वाले फ्रैक्चर) के बाद हड्डी की सतह पूरी तरह से सही स्थिति में नहीं जुड़ पाती, तो जोड़ पर दबाव असमान रूप से पड़ने लगता है। कॉल्स फ्रैक्चर (Colles' fracture) और स्मिथ फ्रैक्चर (Smith's fracture) जैसी चोटों के गलत जुड़ाव के बाद भी यह स्थिति उत्पन्न हो सकती है। हड्डी के झुकाव में परिवर्तन, रेडियल ऊँचाई में बदलाव या जोड़ की सतह में किसी भी विकृति से जोड़ की सामान्य कार्यप्रणाली बाधित हो जाती है।
इसके अतिरिक्त, स्केफॉइड हड्डी के फ्रैक्चर का ठीक से न जुड़ पाना (non-union) रेडिओकार्पल आर्थराइटिस का कारण बन सकता है, जिसे SNAC (Scaphoid Non-union Advanced Collapse) कलाई के नाम से जाना जाता है। इसी तरह, स्केफोल्यूनेट लिगामेंट (scapholunate ligament) की चोट भी SLAC (Scapholunate Advanced Collapse) कलाई के रूप में गठिया को जन्म दे सकती है। सूजन संबंधी रोग जैसे रुमेटीइड आर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis) भी कलाई के जोड़ को लक्षित कर सकते हैं और इस प्रकार के गठिया को बढ़ावा दे सकते हैं।
लक्षणों की पहचान: दर्द से लेकर जकड़न तक
रेडिओकार्पल आर्थराइटिस का सबसे आम और प्राथमिक लक्षण कलाई में होने वाला दर्द है। यह दर्द तब अधिक बढ़ जाता है जब व्यक्ति कोई वस्तु पकड़ने की कोशिश करता है, वजन उठाता है, हाथ के सहारे अपने शरीर का भार संभालने का प्रयास करता है, या कलाई को पीछे की ओर मोड़ने की कोशिश करता है। प्रभावित जोड़ के क्षेत्र में हल्का दबाव पड़ने पर भी कोमलता (tenderness) महसूस हो सकती है।
दर्द के साथ-साथ, कलाई को मोड़ने (flexion) और सीधा करने (extension) की क्षमता में उल्लेखनीय कमी आ जाती है। कलाई की पकड़ (grip strength) कमजोर हो जाती है, जिससे रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम जैसे बोतल खोलना या दरवाज़े का हैंडल घुमाना भी मुश्किल हो सकता है। कुछ रोगियों को कलाई के जोड़ के आसपास सूजन भी महसूस होती है और गति के दौरान चरमराहट (crepitus) की आवाज सुनाई दे सकती है। गंभीर अवस्था में, यह दर्द लगातार बना रह सकता है, जिससे कपड़े पहनने, लिखने, भोजन करने या अन्य सामान्य गतिविधियों में गंभीर परेशानी उत्पन्न हो सकती है।
निदान प्रक्रिया: एक्स-रे से लेकर एमआरआई तक
रेडिओकार्पल आर्थराइटिस के निदान के लिए चिकित्सक रोगी के चिकित्सा इतिहास की गहन जानकारी लेते हैं। इसमें पुराने फ्रैक्चर, चोटों का विवरण और वर्तमान लक्षणों के बारे में पूछताछ शामिल होती है। इसके बाद कलाई की शारीरिक जाँच की जाती है ताकि दर्द के स्रोत और गति की सीमा का पता लगाया जा सके।
नैदानिक इमेजिंग के लिए, सामान्यतः ए.पी. (anterior-posterior), पार्श्व (lateral) और तिरछे (oblique) एक्स-रे किए जाते हैं। इन एक्स-रे में जोड़ के बीच की जगह का कम होना, हड्डी के नीचे घनत्व का बढ़ना (subchondral sclerosis), ऑस्टियोफाइट्स (osteophytes) यानी अतिरिक्त हड्डी का निर्माण, सबकोंड्रल सिस्ट (subchondral cysts) और जोड़ की सतह में विकृति जैसे संकेत दिखाई दे सकते हैं। यदि फ्रैक्चर के बाद हड्डियों की स्थिति को और स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक हो, तो कंप्यूटेड टोमोग्राफी (CT scan) स्कैन अत्यंत उपयोगी होता है। लिगामेंट्स, उपास्थि या अन्य नरम ऊतकों (soft tissues) में चोट के संदेह की स्थिति में मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (MRI) की सलाह दी जा सकती है, क्योंकि यह इन ऊतकों की विस्तृत जानकारी प्रदान करता है।
उपचार के विकल्प: रूढ़िवादी से लेकर सर्जिकल समाधान तक
रेडिओकार्पल आर्थराइटिस का उपचार रोग की गंभीरता, दर्द के स्तर, रोगी की आयु, उसकी दैनिक गतिविधियों की आवश्यकता और जोड़ में क्षति के विशिष्ट स्थान पर निर्भर करता है। शुरुआती अवस्था में, सबसे पहले गतिविधियों में आवश्यक बदलाव करने की सलाह दी जाती है ताकि जोड़ पर अनावश्यक दबाव न पड़े। सीमित अवधि के लिए कलाई की स्प्लिंट (splint) का उपयोग भी आराम प्रदान कर सकता है। इसके साथ ही, हाथ की थेरेपी (hand therapy) और विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए व्यायाम कलाई की कार्यक्षमता को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।
चिकित्सीय सलाह के अनुसार, स्थानीय नॉन-स्टेरायडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स (NSAIDs) या अन्य दर्द निवारक दवाओं का उपयोग दर्द और सूजन को कम करने के लिए किया जा सकता है। यदि लगातार दर्द बना रहता है, तो कुछ विशेष मामलों में कॉर्टिकोस्टेरॉइड इंजेक्शन (corticosteroid injection) जोड़ में इंजेक्ट करके अस्थायी राहत प्रदान की जा सकती है। यदि हड्डी के गलत जुड़ाव के कारण जोड़ पर असामान्य दबाव पड़ रहा हो, तो इसे ठीक करने के लिए सुधारात्मक ऑस्टियोटॉमी (corrective osteotomy) सर्जरी पर विचार किया जा सकता है।
गंभीर मामलों में सर्जरी और भविष्य की राह
गंभीर रेडिओकार्पल आर्थराइटिस की स्थिति में सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है। रोग की विशिष्ट स्थिति और क्षति के स्वरूप के आधार पर विभिन्न सर्जिकल विकल्प उपलब्ध हैं। इनमें प्रॉक्सिमल रो कार्पेक्टॉमी (Proximal Row Carpectomy), फोर-कॉर्नर फ्यूजन (Four-corner fusion) या अन्य आंशिक फ्यूजन (partial fusion) शामिल हैं। एक अन्य विकल्प टोटल रिस्ट आर्थ्रोडेसिस (Total Wrist Arthrodesis) है, जिसमें कलाई के जोड़ को पूरी तरह से स्थिर कर दिया जाता है।
कलाई का संपूर्ण फ्यूजन (fusion) दर्द से काफी राहत दिला सकता है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप कलाई को मोड़ने और सीधा करने की गति पूरी तरह समाप्त हो जाती है, जो दैनिक जीवन में एक बड़ी बाधा हो सकती है। कुछ चुनिंदा रोगियों के लिए, कलाई की संपूर्ण आर्थ्रोप्लास्टी (Total Wrist Arthroplasty) यानी कृत्रिम जोड़ का प्रत्यारोपण भी एक विकल्प हो सकता है। यह महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक प्रक्रिया हर रोगी के लिए उपयुक्त नहीं होती। जोड़ की उपास्थि की स्थिति, क्षति के स्वरूप और रोगी की समग्र स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर ही अंतिम निर्णय लिया जाता है।
स्मिथ फ्रैक्चर के बाद रेडिओकार्पल आर्थराइटिस का जोखिम तब विशेष रूप से बढ़ जाता है, जब जोड़ की सतह में अंतर बना रहता है, रेडियल हड्डी की लंबाई कम हो जाती है (radial shortening), कलाई के आगे के झुकाव (volar tilt) में विकृति आती है, या कार्पल हड्डियों का संरेखण (alignment) बिगड़ जाता है। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि फ्रैक्चर का गलत जुड़ाव या एक्स-रे में गठिया के प्रारंभिक संकेत दिखना हमेशा गंभीर दर्द का कारण नहीं बनता। समय पर उचित जाँच, विशेषज्ञ की सलाह और एक सुनियोजित पुनर्वास कार्यक्रम के माध्यम से उपचार की सही दिशा निर्धारित की जा सकती है और कलाई के दर्द को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा सकता है।
