जौहर विश्वविद्यालय पर बुलडोजर: छात्र भविष्य पर, विद्वान राष्ट्र निर्माण पर सवाल उठा रहे
रामपुर के जौहर विश्वविद्यालय के 38 भवनों को अवैध बताकर गिराने के आदेश पर छात्रों का धरना जारी है। विद्वानों का कहना है कि यह कार्रवाई शिक्षा और राष्ट्र निर्माण पर बहस छेड़ती है।

द क्लिफ न्यूज़ | रामपुर | 26 जुलाई 2026
रामपुर में मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय परिसर की 38 इमारतों को अवैध निर्माण बताते हुए गिराने के आदेश ने जहाँ हजारों छात्रों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है, वहीं सामाजिक चिंतकों और शिक्षाविदों ने इस कार्रवाई को राष्ट्र निर्माण, शिक्षा की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के व्यापक मुद्दों से जोड़ते हुए गंभीर सवाल उठाए हैं। विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर छात्रों का धरना जारी है, जो रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) के इस फैसले का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। छात्रों का कहना है कि इस ध्वस्तीकरण से उनकी पढ़ाई, करियर और पूरा भविष्य दांव पर लगा है।
इस पूरे घटनाक्रम पर सामाजिक चिंतक राम पुनियानी ने अपने लेख “इमारतें ढहाने से कमजोर होता है देश” के माध्यम से विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया है। लेख के हिंदी अनुवादक अमरीश हरदेनिया हैं। पुनियानी ने भवनों को गिराने की कार्रवाई को केवल एक कानूनी विवाद मानने से इनकार करते हुए इसे शिक्षा, सामाजिक न्याय और राष्ट्र निर्माण से जुड़े एक बड़े मुद्दे के तौर पर प्रस्तुत किया है। उन्होंने तर्क दिया है कि किसी शैक्षणिक संस्थान के विरुद्ध इस प्रकार की कार्रवाई केवल अव्यवहारिक ही नहीं, बल्कि देश के विकास की दिशा पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती है।
छात्रों के भविष्य पर संकट की आहट
जौहर विश्वविद्यालय की विधि संकाय की छात्रा मेहरोजा खान ने इस कार्रवाई को हजारों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ बताया है। उनके अनुसार, विश्वविद्यालय में कई छात्र, विशेषकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अनाथ और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों को फीस में महत्वपूर्ण छूट या पूर्ण राहत मिलती है। यह सुविधा उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती है। बी. फार्मा, डी. फार्मा जैसे कई व्यावसायिक पाठ्यक्रम यहाँ संचालित होते हैं, जिनके लिए अन्य संस्थानों में स्थानांतरण कई छात्रों के लिए संभव नहीं होगा, जिससे उनकी शिक्षा बीच में ही रुक सकती है। छात्रों का कहना है कि यह कार्रवाई उनके सपनों को तोड़ रही है और उन्हें अनिश्चित भविष्य की ओर धकेल रही है।
विवादित निर्माण और आरडीए का पक्ष
मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय की नींव 18 सितंबर 2006 को रखी गई थी और इसका संचालन मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट करता है। समय के साथ विश्वविद्यालय का विस्तार हुआ और विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों की शुरुआत हुई। हालांकि, इसके निर्माण कार्यों को लेकर लंबे समय से कानूनी और प्रशासनिक विवाद चला आ रहा है। रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) का दावा है कि विश्वविद्यालय परिसर की 38 इमारतें बिना आवश्यक सरकारी अनुमतियों और स्वीकृतियों के बनाई गई हैं। आरडीए के अनुसार, केवल चिकित्सा महाविद्यालय और प्रशासनिक भवन ही नियमानुसार स्वीकृत हैं।
वहीं, विश्वविद्यालय प्रबंधन का तर्क है कि जिन भवनों के निर्माण पर आपत्ति जताई जा रही है, वे उस समय बने थे जब यह क्षेत्र आरडीए के अधिकार क्षेत्र में नहीं था। उनका कहना है कि इन निर्माणों के लिए स्थानीय जिला पंचायत से विधिवत अनुमति प्राप्त की गई थी। यह विरोधाभासी पक्ष इस मामले की जटिलता को उजागर करता है, जहाँ एक पक्ष नियमों के उल्लंघन का आरोप लगा रहा है, तो दूसरा पक्ष प्रक्रियात्मक त्रुटियों और अधिकार क्षेत्र के विवाद का हवाला दे रहा है।
राष्ट्र निर्माण की अवधारणा पर पुनर्विचार
राम पुनियानी ने अपने लेख में स्वतंत्र भारत के बाद के राष्ट्र निर्माण के पथ की तुलना करते हुए तर्क दिया है कि उस दौर में आईआईटी, एम्स, सार्वजनिक उपक्रमों और बड़ी सिंचाई परियोजनाओं के निर्माण को विकास का पर्याय माना जाता था। उन्होंने एक अहम सवाल उठाया है कि क्या आज के भारत में राष्ट्र निर्माण और विकास का मार्ग संस्थानों को मजबूत करने से होकर गुजरता है, या फिर विवादित निर्माणों को ध्वस्त करने से? उनका मानना है कि किसी शैक्षणिक संस्थान के विरुद्ध ऐसी कठोर कार्रवाई, भले ही वह नियमों के उल्लंघन के आरोप में हो, देश की समावेशी विकास की अवधारणा को कमजोर करती है।
पुनियानी ने देश भर में चल रही धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों से संबंधित बहसों का भी उल्लेख किया है। उन्होंने उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 का संदर्भ देते हुए कहा कि यह कानून 15 अगस्त 1947 की स्थिति को बनाए रखने का प्रावधान करता है। उनका तर्क है कि केवल ऐतिहासिक दावों के आधार पर वर्तमान सामाजिक संबंधों और शैक्षणिक संस्थानों को प्रभावित करना राष्ट्रहित में नहीं है। इस प्रकार की कार्रवाइयाँ समाज में विभाजन को बढ़ा सकती हैं, जैसा कि अन्य मामलों में देखा गया है।
कानून, न्याय और राजनीति का संगम
जौहर विश्वविद्यालय विवाद एक बार फिर इस बहस को तेज करता है कि अवैध निर्माणों पर कार्रवाई किस दिशा में होनी चाहिए। प्रशासन इसे नियमों के पालन का एक अनिवार्य हिस्सा बता रहा है, जबकि विरोध करने वाले इसे शिक्षा के अधिकार, सामाजिक न्याय और अल्पसंख्यकों के संस्थानों को निशाना बनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। यह मामला कानूनी प्रक्रिया और राजनीतिक संवेदनशीलता के बीच एक नाजुक संतुलन की मांग करता है।
यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक निर्णय इस जटिल मुद्दे का समाधान कैसे करते हैं। हजारों छात्रों का शैक्षणिक भविष्य और एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का अस्तित्व अब अदालतों और सरकारी फैसलों पर टिका हुआ है। इस मामले का परिणाम न केवल जौहर विश्वविद्यालय के भविष्य को तय करेगा, बल्कि देश में शैक्षिक संस्थानों के संचालन और सरकारी कार्रवाइयों की प्रकृति पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।
