जंतर-मंतर बवाल: पुलिसकर्मियों के परिवार बोले- असामाजिक तत्वों पर हो कार्रवाई
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों ने हिंसा पर चिंता जताते हुए उपद्रवियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने...

द क्लिफ न्यूज़ | नई दिल्ली | 31 जुलाई 2026
जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद, जहाँ ड्यूटी पर तैनात कई दिल्ली पुलिस के जवानों को गंभीर चोटें आईं, अब पीड़ित पुलिसकर्मियों के परिवार सामने आए हैं। उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसा के बीच अंतर पर गंभीर सवाल उठाते हुए असामाजिक तत्वों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि प्रदर्शन की आड़ में पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाजी और हमला करना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।
इंस्पेक्टर नंद किशोर की बेटी ने मीडिया से बातचीत करते हुए इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी मांगें रखना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का प्रयोग करते हुए हिंसक तरीकों का सहारा लेना या ऑन-ड्यूटी अधिकारियों पर हमला करना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि ड्यूटी पर जाते समय पुलिसकर्मियों के परिवारों को हमेशा यह डर लगा रहता है कि उनका प्रियजन सुरक्षित घर लौट पाएगा या नहीं।
वहीं, गंभीर रूप से घायल सब-इंस्पेक्टर अशोक मीणा के परिजनों ने पुलिस कर्मियों की सुरक्षा व्यवस्था पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने सवाल उठाया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अपनी जान जोखिम में डालने वाले पुलिस अधिकारियों को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है? उनका मानना है कि यदि ऑन-ड्यूटी जवानों पर हमला करने वालों को खुली छूट मिलती रही, तो इससे पुलिस बल का मनोबल गिरेगा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना अत्यंत कठिन हो जाएगा।
हिंसा और शांतिपूर्ण आंदोलन में स्पष्ट अंतर की वकालत
पीड़ित परिवारों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि वे छात्रों या किसी भी समूह के शांतिपूर्ण आंदोलन के खिलाफ नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने प्रदर्शन की आड़ में लोहे की रॉड, पथराव और अन्य हिंसक साधनों का इस्तेमाल करने वाले असामाजिक तत्वों की पहचान कर उन पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की मांग की है। परिवारों का कहना है कि जब 280 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं और उनमें से कई को फ्रैक्चर जैसी गंभीर चोटें आई हैं, तो इस घटना को केवल 'छात्र आंदोलन' कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने ऐसे तत्वों को उपद्रवी करार दिया है, जो आंदोलन की आड़ में अराजकता फैला रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट से ठोस दिशा-निर्देशों की मांग
घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों, जिनमें असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस, सब-इंस्पेक्टर और कांस्टेबल रैंक के अधिकारियों के परिजन शामिल हैं, ने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनकी मुख्य मांगों में यह सुनिश्चित करना शामिल है कि मानवाधिकारों की अवधारणा केवल प्रदर्शनकारियों तक सीमित न रहे, बल्कि ऑन-ड्यूटी पुलिस अधिकारियों के लिए भी कानूनी सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित की जाए।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से विशेष रूप से हिंसक प्रदर्शनों और भीड़ नियंत्रण के दौरान पुलिसकर्मियों की सुरक्षा के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करने का अनुरोध किया है। इसके अलावा, परिवारों ने यह भी मांग की है कि हिंसा फैलाने, पुलिस पर हमला करने और दंगा भड़काने वाले मुख्य साजिशकर्ताओं के खिलाफ बिना किसी राजनीतिक दबाव के तुरंत एफआईआर दर्ज की जाए और सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
परिजनों की यह अपील इस बात को रेखांकित करती है कि कानून तोड़ने वालों और सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने वालों के खिलाफ जवाबदेही तय करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों का मनोबल बना रहे।
