जादवपुर में 'गेरुआ सम्मान यात्रा': शुभेंदु का लाल सलाम पर राष्ट्रवाद का वार
पश्चिम बंगाल के जादवपुर में बुधवार को भाजपा की 'गेरुआ सम्मान यात्रा' निकली। शुभेंदु अधिकारी ने 'कश्मीर मांगे आजादी' व 'लाल सलाम' जैसी ताकतों को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया।

द क्लिफ न्यूज़ | कोलकाता | 9 सितंबर 2026
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बुधवार को जादवपुर, जो कभी वामपंथी छात्र राजनीति का प्रमुख केंद्र रहा है, एक नए वैचारिक टकराव का गवाह बना। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में निकली करीब तीन किलोमीटर लंबी ‘गेरुआ सम्मान यात्रा’ ने गोलपार्क से जादवपुर 8बी तक पहुंचकर यह संकेत दिया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अब उन वैचारिक परिसरों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है, जिन्हें लंबे समय से वामपंथ का गढ़ माना जाता रहा है।
गेरुआ वस्त्र और भगवा ध्वज के साथ यात्रा में शामिल शुभेंदु अधिकारी के साथ बड़ी संख्या में भाजपा समर्थक, साधु-संत और सनातन विचारधारा से जुड़े लोग भी मौजूद थे। ‘जय श्रीराम’ के नारों के बीच संपन्न हुई इस यात्रा को भाजपा ने भगवा रंग की गरिमा और उससे जुड़े मूल्यों के सम्मान का अभियान बताया। यह आयोजन जादवपुर विश्वविद्यालय में वामपंथी छात्र संगठनों और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के बीच पोस्टर, ग्रैफिटी और नारेबाजी को लेकर चल रहे विवाद की पृष्ठभूमि में हुआ।
शुभेंदु अधिकारी का 'लाल सलाम' पर प्रहार
यात्रा के उपरांत जादवपुर के बाहर एक सभा को संबोधित करते हुए शुभेंदु अधिकारी ने भगवा रंग के अपमान को बर्दाश्त न करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कथित तौर पर ‘कश्मीर मांगे आजादी’ और ‘लाल सलाम’ जैसे नारों का प्रयोग करने वाली ताकतों को जादवपुर से उखाड़ फेंकने का संकल्प व्यक्त किया। अधिकारी ने जादवपुर को महर्षि अरविंद की भूमि और उत्कृष्टता का केंद्र बताते हुए विश्वविद्यालय परिसर की राजनीतिक संस्कृति में बदलाव की आवश्यकता पर बल दिया।
मुख्यमंत्री अधिकारी का यह बयान केवल विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं रहा। इसके माध्यम से भाजपा पश्चिम बंगाल में अपने पुराने वैचारिक संघर्ष को नए राजनीतिक प्रतीकों के साथ आगे बढ़ाती दिखाई दे रही है। भगवा, राष्ट्रवाद, सनातन संस्कृति और वामपंथी राजनीति के बीच टकराव को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने की कोशिश इस पूरे अभियान में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई। भाजपा की ओर से यह भी कहा गया कि यात्रा का उद्देश्य भगवा रंग से जुड़े मूल्यों, आदर्शों और गरिमा के प्रति जागरूकता पैदा करना है।
विपक्ष के तंज और भाजपा का वैचारिक दावा
इस यात्रा के साथ ही राजनीतिक स्तर पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो गया। विरोधी खेमे ने भाजपा पर विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति और सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। आलोचकों का मानना है कि विश्वविद्यालयों को वैचारिक टकराव के अखाड़े के बजाय शिक्षा, शोध और अकादमिक स्वतंत्रता के केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। वहीं, भाजपा का तर्क है कि राष्ट्रविरोधी नारों और भगवा संस्कृति के अपमान को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
यात्रा के दौरान विश्वविद्यालय के भीतर भी तनावपूर्ण माहौल देखा गया। वामपंथी छात्र संगठनों और एबीवीपी के बीच हालिया टकराव ने जादवपुर को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। ऐसे परिदृश्य में, भाजपा का यह प्रदर्शन केवल शक्ति प्रदर्शन तक सीमित नहीं था, बल्कि उस पुराने राजनीतिक भूगोल को चुनौती देने का एक प्रयास था, जिसमें जादवपुर को लंबे समय तक वामपंथी छात्र राजनीति का एक मजबूत किला माना जाता रहा है।
वामपंथ के गढ़ में 'गेरुआ' की बढ़ती मौजूदगी
जादवपुर का यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में देखे गए एक व्यापक रुझान का हिस्सा है। कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहाँ वामपंथी प्रभाव वाले क्षेत्रों में भाजपा ने अपनी संगठनात्मक और वैचारिक पकड़ मजबूत की है। 2018 में त्रिपुरा में भाजपा ने 25 वर्षों के वाम शासन को समाप्त कर सत्ता हासिल की थी। इसी प्रकार, पश्चिम बंगाल में 34 वर्षों के वाम मोर्चा शासन के बाद सत्ता तृणमूल कांग्रेस के पास जाने के बावजूद, भाजपा मुख्य विपक्षी शक्ति के रूप में उभरी।
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) भी लंबे समय तक वामपंथी छात्र राजनीति का एक प्रमुख केंद्र रहा है, जहाँ एबीवीपी की बढ़ती सक्रियता ने छात्र राजनीति के पारंपरिक समीकरणों को चुनौती दी है। केरल में भी, जहाँ वाम लोकतांत्रिक मोर्चे का गहरा प्रभाव है, भाजपा अपना आधार बढ़ाने के प्रयास कर रही है।
पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की आज की 'गेरुआ सम्मान यात्रा' इसी व्यापक राजनीतिक कथा का एक नया अध्याय है। यह यात्रा दर्शाती है कि भाजपा अब केवल सीटों और वोटों की लड़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि वह विचार, प्रतीक और सांस्कृतिक पहचान की लड़ाई को भी अपने राजनीतिक विस्तार के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर रही है। जादवपुर की गलियों में आज भगवा झंडों और ‘जय श्रीराम’ के नारों के बीच दिया गया संदेश, विश्वविद्यालय की दीवारों से कहीं आगे तक जाने की महत्वाकांक्षा रखता है। लाल सलाम की पुरानी छाया के बीच गेरुआ सम्मान यात्रा का उतरना बंगाल की बदलती राजनीति का एक प्रतीक है, हालांकि यह देखना बाकी है कि क्या यह प्रतीक स्थायी राजनीतिक बदलाव में तब्दील हो पाएगा, जो भाजपा के लिए अगली बड़ी परीक्षा होगी।
