ईरान-इजराइल तनाव का असर: भारत को 23 डॉलर प्रति MMBtu से महंगी मिली एलएनजी
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत को एलएनजी की खरीद के लिए 23 डॉलर प्रति MMBtu से अधिक कीमत चुकानी पड़ी है, जो 2022 के ऊर्जा संकट के बाद सबसे ऊंची दरों में से एक है।

द क्लिफ न्यूज़ | 22 अगस्त 2026
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़े जोखिम का सीधा असर भारत के ऊर्जा आयात पर दिखाई दे रहा है। सितंबर में डिलीवरी के लिए सरकारी ऊर्जा कंपनियों को एलएनजी (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) के एक कार्गो के लिए 23 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू (MMBtu) से अधिक कीमत चुकानी पड़ी है। यह मूल्य वृद्धि 2022 के वैश्विक ऊर्जा संकट के बाद एलएनजी खरीद के लिए सबसे ऊंची दरों में से एक है, जिससे देश की ऊर्जा लागत और आयात बिल बढ़ने की आशंका है।
यह महँगी खरीद इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में आपूर्ति और मांग के बीच असंतुलन गहराता जा रहा है। विशेष रूप से एशियाई बाज़ार में स्पॉट एलएनजी की कीमतों में तेज़ी से उछाल आया है, जिसके चलते भारत जैसी बड़ी एलएनजी खरीदार कंपनियों को अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उच्च कीमतों पर सौदा करने को मजबूर होना पड़ रहा है।
सरकारी कंपनियों को चुकानी पड़ी ऊंची कीमत
सरकारी गैस कंपनी गेल इंडिया (GAIL India) ने सितंबर माह में डिलीवरी के लिए एक एलएनजी कार्गो की खरीद 23 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू से अधिक की दर पर की है। इसी तरह, गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (GSPC) ने भी सितंबर डिलीवरी वाली गैस के लिए लगभग 23 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू का भुगतान किया है। दो प्रमुख सरकारी कंपनियों द्वारा इतनी अधिक कीमत पर एलएनजी खरीदना बाज़ार में तत्काल उपलब्ध गैस की मांग और आपूर्ति के बीच बड़े अंतर को दर्शाता है। खरीदारों को अपनी तत्काल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए महंगे स्पॉट कार्गो पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जो उनकी लागत को बढ़ा रहा है।
2022 के बाद सबसे महंगा सौदा
एलएनजी की वर्तमान कीमतें साल 2022 के ऊर्जा संकट के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर हैं। उस समय रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण यूरोप और एशिया में प्राकृतिक गैस की कीमतों में अभूतपूर्व तेज़ी देखी गई थी। अब एक बार फिर पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्षों और समुद्री व्यापार मार्गों पर अनिश्चितता ने वैश्विक गैस बाज़ार को प्रभावित किया है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव बढ़ने से न केवल जहाजों की आवाजाही पर असर पड़ रहा है, बल्कि बीमा लागत में भी वृद्धि की आशंका है। इस महत्वपूर्ण जलमार्ग से एलएनजी और अन्य ऊर्जा उत्पादों की आवाजाही प्रभावित होने पर एशियाई खरीदारों को वैकल्पिक और अधिक महंगी आपूर्ति स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ सकता है, जिससे परिवहन दूरी और लागत दोनों बढ़ जाती है।
ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया का तनाव बड़ा कारण
एलएनजी बाज़ार में मौजूदा तेज़ी के पीछे मुख्य कारणों में से एक ईरान और पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव को माना जा रहा है। क्षेत्र में किसी भी बड़े संघर्ष का असर सीधे तेल और गैस की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति पर पड़ सकता है। ऊर्जा बाज़ार में केवल वास्तविक आपूर्ति में बाधा ही कीमतों को नहीं बढ़ाती, बल्कि आपूर्ति बाधित होने की आशंका मात्र भी खरीदारों को अतिरिक्त कार्गो सुरक्षित करने के लिए प्रेरित करती है। इससे स्पॉट बाज़ार में प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है और कीमतें ऊपर जाने लगती हैं।
एशियाई एलएनजी बाज़ार के लिए कतर एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता है, और कतर के निर्यात ढांचे को संभावित नुकसान की खबरों ने बाज़ार की चिंता को और बढ़ा दिया है। कतर से आपूर्ति में किसी भी कमी का सीधा असर भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे प्रमुख एशियाई खरीदारों पर पड़ सकता है।
भारत के लिए एलएनजी का महत्व
भारत में प्राकृतिक गैस का उपयोग बिजली उत्पादन, उर्वरक निर्माण, विभिन्न उद्योगों, शहरी क्षेत्रों में पाइप्ड गैस आपूर्ति और वाहनों के लिए सीएनजी के रूप में किया जाता है। विशेष रूप से उर्वरक उद्योग में प्राकृतिक गैस की भूमिका महत्वपूर्ण है, क्योंकि खाद कारखानों को निर्बाध गैस आपूर्ति सुनिश्चित करना कृषि क्षेत्र के लिए आवश्यक है। इसलिए, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कीमतें चाहे जितनी भी बढ़ जाएं, आवश्यक क्षेत्रों के लिए गैस की उपलब्धता बनाए रखना सरकार की प्राथमिकता बनी हुई है।
भारत अपनी प्राकृतिक गैस की कुछ ज़रूरतें दीर्घकालिक अनुबंधों के माध्यम से पूरी करता है, लेकिन अतिरिक्त मांग या आपूर्ति में कमी होने पर कंपनियों को स्पॉट मार्केट पर निर्भर रहना पड़ता है। वर्तमान भू-राजनीतिक तनाव के कारण स्पॉट मार्केट में कीमतें काफी ऊंची हो गई हैं। सरकारी कंपनियों के सामने अब यह चुनौती है कि घरेलू ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त मात्रा में एलएनजी सुरक्षित की जाए, लेकिन अत्यधिक कीमत चुकाने से भी बचा जाए।
महंगी गैस का प्रभाव
एलएनजी की कीमतों में इस तेज़ी का असर कई क्षेत्रों पर पड़ेगा। सबसे पहले, भारत के ऊर्जा आयात बिल में वृद्धि होगी। इसके बाद, गैस आधारित बिजली उत्पादन, औद्योगिक गैस की लागत और विभिन्न उद्योगों के उत्पादन खर्च पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उर्वरक क्षेत्र में, यदि सरकार गैस की ऊंची लागत का भार वहन करती है, तो सब्सिडी का दबाव बढ़ेगा। वहीं, यदि यह लागत उद्योगों पर डाली जाती है, तो उनके उत्पादन खर्च में वृद्धि हो सकती है।
एलएनजी का भुगतान विदेशी मुद्रा में होने के कारण, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज वृद्धि से देश के व्यापार संतुलन और चालू खाते पर भी दबाव पड़ सकता है। भारत पहले से ही अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है, ऐसे में तेल और गैस, दोनों की कीमतों में एक साथ तेजी आर्थिक दबाव को और बढ़ा सकती है।
कंपनियों के लिए लागत प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन गया है। यदि महंगी गैस को उपभोक्ताओं तक उसी अनुपात में नहीं पहुंचाया जा सका, तो कंपनियों के मुनाफे पर दबाव आ सकता है। सरकार के सामने दोहरी चुनौती है: एक ओर घरेलू उद्योगों, बिजली संयंत्रों और उर्वरक कारखानों को आवश्यक गैस उपलब्ध कराना, और दूसरी ओर महंगे आयात से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव को सीमित रखना।
आगे की राह
आने वाले महीनों में भारत के लिए वैश्विक गैस बाज़ार पर पैनी नज़र रखना महत्वपूर्ण होगा। पश्चिम एशिया में संघर्ष की स्थिति, हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही, कतर की निर्यात क्षमता और अन्य एशियाई देशों की एलएनजी मांग, कीमतों की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक होंगे। फिलहाल, 23 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू से अधिक की कीमत पर एलएनजी की खरीद यह दर्शाती है कि वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में आपूर्ति सुरक्षा को लेकर दबाव काफी बढ़ गया है। भारत के लिए चुनौती केवल पर्याप्त गैस खरीदने की नहीं, बल्कि ऊंची अंतरराष्ट्रीय कीमतों के बीच ऊर्जा सुरक्षा और लागत के बीच संतुलन बनाए रखने की है।
