इंदौर में कविता शिविर: फिलिस्तीनी संघर्ष पर कवियों ने छेड़े प्रतिरोध के स्वर
इंदौर में प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा आयोजित दो दिवसीय कविता शिविर में वरिष्ठ और युवा कवियों ने फिलिस्तीन के संघर्ष पर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं।

Indore | संवाददाता: आशीष नेमा
द क्लिफ न्यूज़ | इंदौर | 15 अक्टूबर 2026
इंदौर में सात अक्टूबर को इजरायल द्वारा फिलिस्तीन पर किए गए आक्रमण की स्मृति में आयोजित एक विशेष दो दिवसीय कविता शिविर में कवियों ने सामाजिक न्याय, शोषितों के संघर्ष और व्यवस्था के प्रति प्रतिरोध के स्वर बुलंद किए। 'कविता से दोस्ती' विषय पर आधारित इस साहित्यिक आयोजन का शहर के अभिनव कला समाज सभागृह और इंदौर प्रेस क्लब में आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य कविता की रचना प्रक्रिया, उसकी वैचारिकी और सामाजिक सरोकारों पर वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ संवाद स्थापित करना था।
कार्यक्रम में भोपाल से पधारे कवि कुमार अंबुज, आरती और अनिल करमेले, तथा अशोकनगर के हरिओम राजोरिया ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कुमार अंबुज ने अपनी प्रसिद्ध कविताओं 'याचिका', 'श्रृंखला' और 'अलिखित खतरा' का पाठ किया, जबकि हरिओम राजोरिया ने 'हैसियत', 'पैसा जो है सो है' और 'डर-डर कर रहने का समय' जैसी रचनाएं सुनाईं। कवियत्री आरती ने 'मृत्यु शैया पर एक स्त्री का बयान' और 'रामराज्य की तैयारी का प्रोग्राम' जैसी कविताओं के माध्यम से मार्मिक अभिव्यक्ति दी। इस अवसर पर विनीत तिवारी ने फिलिस्तीनी संघर्ष के प्रतीक तरबूज के ऐतिहासिक संदर्भ को याद करते हुए एक फिलिस्तीनी कविता का अनुवाद भी प्रस्तुत किया, जिसने श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव डाला।
फिलिस्तीनी संघर्ष और सामाजिक न्याय के स्वर
शिविर में प्रस्तुत की गई अधिकांश कविताओं में स्त्री, मजदूर, युवा और समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े शोषित वर्ग के अथाह संघर्षों को प्रमुखता से चित्रित किया गया। इन रचनाओं ने अन्याय, गैर-बराबरी और शोषण पर आधारित वर्तमान सामाजिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े किए। कवियों ने अमेरिका और इजरायल द्वारा फिलिस्तीन में किए जा रहे कथित नरसंहार के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त की। कविताओं में व्यवस्था के प्रति असहमति और प्रतिरोध का स्वर अत्यंत स्पष्ट था, जिसने उपस्थित श्रोताओं को समकालीन समय की विसंगतियों पर गहराई से विचार करने के लिए प्रेरित किया। यह प्रतिरोध केवल शब्दों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह समाज में व्याप्त गहरी असमानताओं और मानवीय पीड़ा के प्रति एक मुखर आवाज का प्रतिनिधित्व करता था। कई रचनाओं में फिलिस्तीनी लोगों की दशा को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया, जो वैश्विक मंच पर न्याय की मांग को रेखांकित करता है।
कविता लेखन की प्रक्रिया और वैचारिकी पर चर्चा
काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. जाकिर हुसैन ने की, जबकि सारिका श्रीवास्तव ने कुशलतापूर्वक संचालन किया। कार्यक्रम के अंत में हरनाम सिंह ने सभी का आभार व्यक्त किया। आयोजन के विभिन्न सत्रों में देवास, उज्जैन और अशोकनगर से आए कवियों के साथ-साथ इंदौर के अनेक युवा रचनाकारों ने भी अपनी नवीन कृतियों का पाठ किया। रचना पाठ के उपरांत, वरिष्ठ कवियों ने युवा रचनाकारों की कविताओं पर विस्तृत और सारगर्भित टिप्पणी की। कुमार अंबुज और अन्य विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि कविता केवल मनोरंजन का साधन न होकर, समाज की अंतर्निहित बेचैनी और उसकी गहरी आकांक्षाओं की एक सशक्त अभिव्यक्ति है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कविता कभी भी विचार-विहीन नहीं हो सकती और कवियों के लिए इतिहास तथा मिथक के बीच के सूक्ष्म अंतर को समझना अत्यंत आवश्यक है। इस चर्चा का उद्देश्य युवा कवियों को न केवल अपनी रचनात्मकता को निखारने के लिए प्रेरित करना था, बल्कि उन्हें सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों की गहरी समझ के साथ अपनी रचनाओं को और अधिक प्रासंगिक बनाने के लिए भी प्रोत्साहित करना था।
समकालीन विसंगतियों पर गहरा चिंतन
इस दो दिवसीय साहित्यिक आयोजन में, जिसे 'कविता से दोस्ती' नाम दिया गया था, साहित्यकारों ने समकालीन समाज की जटिलताओं और विसंगतियों पर गहन चिंतन किया। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि साहित्य, विशेषकर कविता, सामाजिक चेतना जगाने का एक शक्तिशाली माध्यम है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कवियों की ज़िम्मेदारी है कि वे उन आवाजों को अपनी कविताओं में स्थान दें जो अक्सर अनसुनी रह जाती हैं। फिलिस्तीनी संघर्ष पर आधारित रचनाओं ने यह दर्शाया कि किस प्रकार कविताएं वैश्विक अन्याय के खिलाफ एक एकजुटता का प्रतीक बन सकती हैं। इसके अतिरिक्त, कई युवा कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से स्थानीय मुद्दों, जैसे कि शहरीकरण का प्रभाव, पर्यावरण क्षरण और सामाजिक असमानता पर भी प्रकाश डाला, जिसने आयोजन को और भी बहुआयामी बना दिया। विशेषज्ञों की टिप्पणियों ने इस बात पर प्रकाश डाला कि किस प्रकार एक कविता में प्रयुक्त प्रतीक, बिम्ब और भाषा पाठक के मन पर गहरा प्रभाव डाल सकती है।
साहित्यिक संवाद और युवा प्रतिभा का सम्मान
इस महत्वपूर्ण साहित्यिक आयोजन में राम आसरे पांडे, जावेद आलम, चुन्नीलाल वाधवानी, अभय नेमा, नेहा दुबे, रविन्द्र व्यास, अनुराधा तिवारी, फादर पायस लाकरा, प्रकाश पाठक, अमेय कांत, शिरीन भावसार, विनोद पुरोहित और राज कुमार यादव सहित शहर के अनेक प्रबुद्ध नागरिक और साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। इन सभी की उपस्थिति ने कार्यक्रम को एक गरिमामय स्वरूप प्रदान किया। दो दिनों तक चली इस गोष्ठी ने कविता और समाज के बीच के गहरे और अटूट अंतर्संबंधों को एक नई और प्रभावशाली दृष्टि प्रदान की, जिससे साहित्यिक समुदाय में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। विशेष रूप से, वरिष्ठ कवियों द्वारा युवा रचनाकारों की कविताओं पर की गई आलोचनात्मक टिप्पणियां, जिन्हें सकारात्मक और रचनात्मक बनाया गया था, ने युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। यह आयोजन केवल साहित्यिक प्रस्तुतियों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने एक ऐसा मंच प्रदान किया जहाँ विभिन्न पीढ़ियों के कवि और साहित्यकार एक-दूसरे के विचारों से जुड़ सके और समकालीन साहित्यिक परिदृश्य पर सार्थक विमर्श कर सके। इस संवाद ने यह भी स्पष्ट किया कि किस प्रकार कविताएं समय की कसौटी पर खरी उतरती हैं और सामाजिक परिवर्तन में अपनी भूमिका निभाती हैं।
