अरावली विवाद: केंद्र का बड़ा कदम, खनन-प्रतिबंधित क्षेत्र और बढ़ेंगे; ICFRE को नए ज़ोन चिन्हित करने का निर्देश
अरावली पर्वतमाला की एक समान परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार किए जाने के बाद देशभर में उठे विरोध के बीच केंद्र सरकार ने स्थिति...

अरावली पर्वतमाला की एक समान परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार किए जाने के बाद देशभर में उठे विरोध के बीच केंद्र सरकार ने स्थिति स्पष्ट करने और पर्यावरणीय चिंताओं को संबोधित करने के लिए अहम कदम उठाया है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने बुधवार को निर्देश जारी कर खनन-प्रतिबंधित क्षेत्रों का दायरा और बढ़ाने का निर्णय लिया तथा एक केंद्रीय संस्था को पूरे अरावली क्षेत्र में ऐसे अतिरिक्त ज़ोन/भू-आकृतियों की पहचान करने को कहा है, जहां खनन पूरी तरह वर्जित होना चाहिए।
मौजूदा स्थिति क्या है?
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, लगभग 1.4 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली अरावली पर्वतमाला में इस समय कुल क्षेत्रफल का महज 0.2% हिस्सा ही खनन के लिए पात्र माना जाता है। मंत्रालय के ताज़ा निर्देशों का अर्थ यह है कि भविष्य में प्रतिबंधित क्षेत्रों का विस्तार इस 0.2% के भीतर भी किया जा सकता है—यानी खनन-मुक्त क्षेत्र और बढ़ेंगे।
ICFRE को अहम जिम्मेदारी
मंत्रालय ने भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) को सतत खनन के लिए प्रबंधन योजना (MPSM) तैयार करने के दौरान पूरे अरावली परिदृश्य का आकलन करने को कहा है। इसमें गुजरात से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) तक फैली पर्वतमाला की निरंतर भू-वैज्ञानिक संरचना, स्थानीय भू-आकृति, पारिस्थितिकी और जैव विविधता को ध्यान में रखते हुए ऐसे सभी भू-रूप/क्षेत्र चिन्हित किए जाएंगे, जहां खनन पर पूर्ण प्रतिबंध आवश्यक है—कोर/इनवायोलेट क्षेत्र और पहाड़ियां/रेंज इसके दायरे में आएंगी।
राज्यों को सख्त निर्देश: नई खनन लीज़ पर रोक
मंत्रालय ने अरावली-क्षेत्र वाले राज्यों—हरियाणा, राजस्थान और गुजरात—को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि नई खनन लीज़ का आवंटन नहीं किया जाएगा। यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर के आदेश की पुन: पुष्टि है, जिसमें कहा गया था कि MPSM के अंतिम रूप लेने तक कोई नई लीज़ नहीं दी जाए।
चल रहे खनन पर कड़ा नियमन
जहां खनन पहले से जारी है, वहां राज्यों को पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है। मंत्रालय के अनुसार, मौजूदा गतिविधियों पर अतिरिक्त प्रतिबंधों के साथ कड़ा नियमन होगा, ताकि पर्यावरण संरक्षण और सतत खनन सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।
100-मीटर परिभाषा पर भ्रम दूर
मीडिया में सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) से जुड़ी 100-मीटर की नई परिभाषा को लेकर कथित असहमति की खबरों पर मंत्रालय ने स्पष्टीकरण दिया। अधिकारियों के मुताबिक, यह किसी एक विशेषज्ञ सदस्य की टिप्पणी थी, न कि CEC की सामूहिक राय। CEC के सदस्य जे. आर. भट्ट 3 अक्टूबर की चर्चाओं में शामिल हुए थे, लेकिन मंत्रालय की रिपोर्ट का औपचारिक परीक्षण CEC द्वारा नहीं किया गया था।
मंत्रालय ने रेखांकित किया कि अरावली की पारिस्थितिकी के संरक्षण के लिए 100-मीटर की परिभाषा अपनाने पर CEC की सहमति है।
क्यों अहम है यह फैसला?
विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली उत्तर भारत की जल सुरक्षा, भूजल रिचार्ज और वायु गुणवत्ता (AQI) के लिए जीवनरेखा है। अनियंत्रित खनन से जलस्रोतों का क्षरण, धूल-प्रदूषण और जैव विविधता को नुकसान पहुंचता है। केंद्र के ताज़ा निर्देश न केवल कानूनी स्पष्टता लाते हैं, बल्कि खनन बनाम संरक्षण की बहस में पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता देते हैं।
