BREAKING
Revolutionary climate technology breakthrough announced • Championship finals draw record 150M+ viewers • Global markets surge following policy changes • New discovery in quantum computing promises faster processors
The Cliff News
National

गुरु पूर्णिमा: ज्ञान और समर्पण का पर्व, गुरु को ईश्वर का स्वरूप मानने की परंपरा

भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व ज्ञान, श्रद्धा और आत्मबोध का प्रतीक है, जिसमें गुरु को ईश्वर के समान माना जाता है।

Few hours ago
4 मिनट में पढ़ें
गुरु पूर्णिमा: ज्ञान और समर्पण का पर्व, गुरु को ईश्वर का स्वरूप मानने की परंपरा

द क्लिफ न्यूज़ | 29 जुलाई 2026

समस्त भारत में आज गुरु पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन भारतीय संस्कृति में ज्ञान, समर्पण और आत्मबोध के महापर्व के रूप में विख्यात है। विशेष रूप से, यह आदिशंकर महर्षि वेदव्यास की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, जिन्होंने वेदों का विभाजन किया, महाभारत की रचना की और अट्ठारह पुराणों का संकलन किया। इसी कारण उन्हें “व्यास” और “जगद्गुरु” की उपाधि से अलंकृत किया गया है, और इस दिन को “व्यास पूर्णिमा” के नाम से भी जाना जाता है।

भारतीय दर्शन में गुरु को ईश्वर का प्रत्यक्ष स्वरूप माना गया है। स्कन्द पुराण में वर्णित श्लोक—“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”—इस मान्यता को सुदृढ़ करता है। इसका अर्थ है कि गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं, और वे साक्षात् परब्रह्म का स्वरूप हैं, ऐसे गुरु को बार-बार प्रणाम है। यह पर्व इस गहन सत्य का स्मरण कराता है कि गुरु वह दिव्य शक्ति हैं, जो मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर सत्य और ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं।

गुरु और ईश्वर: एक अविभाज्य संबंध

सनातन धर्म का यह सिद्धांत है कि ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सुगम और प्रभावी मार्ग गुरु के माध्यम से ही प्रशस्त होता है। भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय के चौंतीसवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं: “तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥” अर्थात, तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास विनम्रता, सेवा और जिज्ञासा के साथ जाना चाहिए, वही तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश देंगे जिससे सत्य का बोध होगा। यह श्लोक गुरु के प्रति निष्ठा और समर्पण के महत्व को रेखांकित करता है।

इसी प्रकार, मुण्डक उपनिषद् भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के लिए योग्य गुरु की शरण लेना अनिवार्य बताता है। गुरु के मार्गदर्शन के बिना आत्मज्ञान की प्राप्ति अत्यंत कठिन मानी गई है। यह परंपरा दर्शाती है कि गुरु मात्र शिक्षक नहीं, बल्कि वे मार्गदर्शक हैं जो शिष्य को उसकी आंतरिक क्षमता को पहचानने और आध्यात्मिक प्रगति करने में सहायता करते हैं।

वेद, पुराणों और ग्रंथों में गुरु महिमा

ऋग्वेद ज्ञान को जीवन का सर्वोच्च प्रकाश मानता है। छांदोग्य उपनिषद् में सत्यकाम जाबाल और उनके गुरु गौतम ऋषि का प्रसंग गुरु-शिष्य परंपरा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो गुरु के प्रति शिष्य के अटूट विश्वास और समर्पण को दर्शाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करना यह सिखाता है कि स्वयं ईश्वर भी गुरु की मर्यादा का पालन करते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में गुरु की महिमा का बखान करते हुए लिखा है: “बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।” इसका आशय है कि गुरु मनुष्य रूप में स्वयं भगवान हैं, जिनकी कृपा से जीवन प्रकाशित होता है। यह पंक्तियाँ गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा और उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान के प्रकाश को जीवन में उतारने की प्रेरणा देती हैं।

संत प्रेमानंद जी महाराज का आध्यात्मिक संदेश

वृंदावन के प्रख्यात संत प्रेमानंद जी महाराज अपने सत्संगों के माध्यम से अक्सर गुरु के वास्तविक स्वरूप और महत्व पर प्रकाश डालते हैं। वे कहते हैं कि गुरु का कार्य केवल मंत्र प्रदान करना नहीं, बल्कि शिष्य के जीवन को भगवान की ओर मोड़ देना है। उनके अनुसार, जिस शिष्य के मन में गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा, दृढ़ विश्वास और सेवा का भाव होता है, उसके जीवन में स्वतः ही भक्ति का संचार हो जाता है। संत प्रेमानंद जी महाराज स्पष्ट करते हैं कि गुरु को केवल एक शारीरिक इकाई मानना एक भूल है; गुरु का वास्तविक स्वरूप एक दिव्य चेतना है, जो साधक को ईश्वर से साक्षात्कार कराती है।

महाराज का यह भी संदेश है कि गुरु के बताए मार्ग पर निष्ठापूर्वक चलना ही सच्ची गुरु-दक्षिणा है। केवल औपचारिक पूजन या सम्मान पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके उपदेशों और सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारना ही वास्तविक श्रद्धा का द्योतक है। यह गुरु-शिष्य के संबंध की गहराई और व्यावहारिकता को दर्शाता है।

गुरु पूर्णिमा का प्रासंगिक आध्यात्मिक संदेश

गुरु पूर्णिमा का पर्व हमें अहंकार को त्याग कर विनम्रतापूर्वक ज्ञान ग्रहण करने की प्रेरणा देता है। यह दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि जहाँ माता-पिता हमें जीवन प्रदान करते हैं, वहीं गुरु हमें जीवन का वास्तविक उद्देश्य और अर्थ समझाते हैं। गुरु हमारे भीतर छिपी हुई दिव्यता को जागृत करते हैं और हमें धर्म, सत्य, करुणा तथा आत्म-अनुशासन के मार्ग पर चलने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

आज के भौतिकतावादी युग में, जब मनुष्य भौतिक उपलब्धियों की दौड़ में अधिक संलग्न है, गुरु पूर्णिमा का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि वास्तविक सफलता केवल धन, संपत्ति या पद में निहित नहीं है, बल्कि सदाचार, आत्मज्ञान और ईश्वर के साथ गहरे जुड़ाव में है। यह पर्व हमें आत्म-मंथन करने और अपने जीवन के उद्देश्यों को पुनः परिभाषित करने का अवसर प्रदान करता है।