घुटने की टोपी खिसकने को नजरअंदाज न करें: बच्चों से बड़ों तक, जानिए खतरे और उपचार
पटेला डिसलोकेशन, यानी घुटने की टोपी का अपनी जगह से खिसक जाना, एक गंभीर समस्या है। प्रारंभिक लापरवाही से बार-बार खिसकने व अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। जानिए लक्षण, जांच और आधुनिक उपचार।

द क्लिफ न्यूज़ | 31 जुलाई 2026
घुटने की टोपी, जिसे चिकित्सा की भाषा में पटेला कहा जाता है, जांघ की हड्डी (फीमर) के सामने स्थित एक विशेष खांचे (ट्रोक्लियर ग्रूव) में सरकती है। जब चोट, अचानक मोच या तेज झटके के कारण यह अपने सामान्य मार्ग से विचलित हो जाती है, तो इस स्थिति को 'पटेला डिसलोकेशन' या घुटने की टोपी का खिसकना कहते हैं। अधिकांश मामलों में, पटेला बाहर की ओर खिसकती है, जिससे मेडियल पटेलोफेमोरल लिगामेंट (MPFL) को भी क्षति पहुंच सकती है। यह समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन इसके कारण, जोखिम, उपचार और परिणाम आयु वर्ग के अनुसार भिन्न होते हैं।
चिकित्सकों के अनुसार, पटेला डिसलोकेशन के लक्षणों को कभी भी सामान्य मोच समझकर अनदेखा नहीं करना चाहिए। घुटने के सामने अचानक तेज दर्द, घुटने की टोपी का अपनी जगह से हटना, घुटने में तेजी से सूजन आना, पैर को सीधा करने में कठिनाई, वजन उठाने में समस्या और ऐसा महसूस होना कि घुटना जवाब दे रहा है या दोबारा खिसक सकता है, ये सभी पटेला डिसलोकेशन के प्रमुख संकेत हैं।
विभिन्न आयु समूहों में पटेला डिसलोकेशन के कारण
बच्चों और किशोरों में पटेला डिसलोकेशन अक्सर खेलकूद के दौरान, दौड़ते समय अचानक दिशा बदलने या घुटने के मुड़ जाने से होता है। इस आयु वर्ग में लिगामेंट का अधिक लचीलापन, पटेला के खांचे का उथला होना, पटेला अल्टा (पटेला का असामान्य रूप से ऊपर की ओर स्थित होना) और बढ़ा हुआ Q-एंगल (जांघ की हड्डी और पिंडली की हड्डी के बीच का कोण) जैसे जन्मजात या संरचनात्मक कारण इस जोखिम को काफी बढ़ा देते हैं।
युवा वयस्कों में, फुटबॉल, बास्केटबॉल, कबड्डी जैसे उच्च प्रभाव वाले खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ी गिरने या घुटने के अचानक मुड़ने के कारण इस चोट का शिकार हो सकते हैं। वहीं, 40–50 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्तियों में, पटेला डिसलोकेशन का कारण प्रायः गिरना, घुटने पर सीधा आघात, मांसपेशियों की कमजोरी, ऑस्टियोआर्थराइटिस या ऑस्टियोपोरोसिस जैसी स्थितियां हो सकती हैं। इस आयु वर्ग में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि डिसलोकेशन के साथ कहीं कोई फ्रैक्चर या एक्सटेंसर मैकेनिज्म (घुटने को सीधा करने वाली प्रणाली) को चोट तो नहीं पहुंची है।
सटीक निदान के लिए आवश्यक जांचें
पटेला डिसलोकेशन के सही उपचार के लिए सटीक निदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, चिकित्सक मरीज की शारीरिक जांच करते हैं ताकि चोट की सीमा का आकलन किया जा सके। इसके बाद, एक्स-रे कराया जाता है, जिससे किसी संभावित फ्रैक्चर का पता लगाया जा सके या उसे खारिज किया जा सके। यदि लिगामेंट, कार्टिलेज या हड्डी के अंदरूनी चोट का संदेह होता है, तो एमआरआई (MRI) जांच की सलाह दी जाती है। एमआरआई से मेडियल पटेलोफेमोरल लिगामेंट (MPFL) के फटने, ऑस्टियोकॉन्ड्रल फ्रैक्चर (हड्डी और कार्टिलेज का एक साथ टूटना), कार्टिलेज को नुकसान, बोन ब्रूज (हड्डी पर चोट का निशान) और पहले से मौजूद संरचनात्मक असामान्यताओं की विस्तृत जानकारी मिलती है। यह जानकारी आगे के उपचार की योजना बनाने में अत्यंत सहायक होती है।
गैर-सर्जिकल उपचार और फिजियोथेरेपी का महत्व
पहली बार होने वाले अधिकांश पटेला डिसलोकेशन का उपचार बिना ऑपरेशन के सफलतापूर्वक किया जाता है। इसमें सबसे पहले पटेला को सावधानीपूर्वक उसकी सामान्य स्थिति में वापस लाया जाता है। इसके बाद, चिकित्सक बर्फ की सिकाई, कम्प्रेशन (दबाव), पैर को ऊंचा रखने और आवश्यकतानुसार दर्द निवारक दवाओं की सलाह देते हैं। चोट की गंभीरता के आधार पर, घुटने को दो से तीन सप्ताह तक ब्रेस या इममोबिलाइज़र की मदद से स्थिर रखा जा सकता है।
सर्जरी के बाद, फिजियोथेरेपी उपचार का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें क्वाड्रिसेप्स (जांघ के सामने की मांसपेशी), विशेष रूप से वास्टस मेडियलिस ऑब्लिकस (VMO) मांसपेशी को मजबूत करने वाले व्यायाम कराए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, हिप एब्डक्टर (कूल्हे को बाहर की ओर ले जाने वाली मांसपेशी) की मजबूती, संतुलन और प्रोप्रियोसेप्शन (शरीर की स्थिति का बोध) प्रशिक्षण पर भी जोर दिया जाता है। कुछ मामलों में, पटेला को स्थिर रखने वाले विशेष ब्रेस का उपयोग भी किया जा सकता है।
सर्जरी का विकल्प और आधुनिक तकनीकें
हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है। यदि डिसलोकेशन के साथ ऑस्टियोकॉन्ड्रल फ्रैक्चर हो और हड्डी के छोटे टुकड़े (लूज़ बॉडी) मौजूद हों, पटेला को सामान्य स्थिति में लाना संभव न हो, MPFL का बड़ा हिस्सा हड्डी से उखड़ गया हो (एवल्शन फ्रैक्चर), कार्टिलेज को गंभीर क्षति पहुंची हो, या बार-बार पटेला खिसकने की समस्या हो, तो ऑपरेशन की सलाह दी जाती है। ऐसी शारीरिक असामान्यताएं जो लगातार घुटने में अस्थिरता पैदा कर रही हों, उनके निवारण के लिए भी सर्जरी आवश्यक हो सकती है। इन जटिल मामलों में, MPFL रिकंस्ट्रक्शन जैसी आधुनिक सर्जरी तकनीकें अच्छे परिणाम देती हैं, जिससे घुटने की स्थिरता बहाल होती है।
पुनरावृत्ति और दीर्घकालिक जटिलताएं
समय पर उचित उपचार और नियमित फिजियोथेरेपी के अभाव में, लगभग 15 से 50 प्रतिशत मरीजों, विशेषकर युवाओं में, पटेला के दोबारा खिसकने का खतरा बना रहता है। इसके अलावा, घुटने की पुरानी अस्थिरता, लगातार घुटने के आगे दर्द बने रहना, कार्टिलेज का खराब होना, पेटेलोफेमोरल ऑस्टियोआर्थराइटिस (पटेला और फीमर के बीच का गठिया), और खेल प्रदर्शन में कमी जैसी गंभीर दीर्घकालिक जटिलताएं विकसित हो सकती हैं।
सही समय पर निदान, प्रभावी उपचार और निरंतर पुनर्वास के माध्यम से, अधिकांश मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने सामान्य जीवन और खेलकूद की गतिविधियों में सफलतापूर्वक लौट सकते हैं। हालांकि, जिन व्यक्तियों में जन्मजात या संरचनात्मक जोखिम कारक मौजूद होते हैं, उनमें पटेला के दोबारा खिसकने की संभावना अधिक होती है, और उन्हें भविष्य में MPFL रिकंस्ट्रक्शन जैसे सर्जिकल स्टेबिलाइजेशन की आवश्यकता पड़ सकती है। इसलिए, पहली बार पटेला डिसलोकेशन को एक मामूली चोट मानकर इसे नज़रअंदाज़ करने के बजाय, तत्काल एक विशेषज्ञ ऑर्थोपेडिक चिकित्सक से परामर्श लेना सबसे विवेकपूर्ण कदम है।
