घाना से 9 भारतीय नाविकों की सकुशल वापसी, भारत सरकार की कूटनीतिक सफलता
घाना में चार महीने से अधिक समय से फंसे एम.वी रहाफ मून के नौ भारतीय नाविकों को भारतीय उच्चायोग के प्रयासों से भारत लाया गया।

द क्लिफ न्यूज़ | अकरा | 24 जुलाई 2026
घाना के अकरा बंदरगाह पर चार महीने से अधिक समय से फंसे नौ भारतीय नाविकों को भारत सरकार के अथक राजनयिक प्रयासों के बाद सुरक्षित वतन वापस भेज दिया गया है। एम.वी रहाफ मून नामक मालवाहक जहाज के ये क्रू सदस्य जहाज के मालिक द्वारा लावारिस छोड़ दिए जाने के कारण गंभीर आर्थिक और मानवीय संकट का सामना कर रहे थे। अकरा स्थित भारतीय उच्चायोग की सक्रिय पहल और त्वरित कूटनीतिक हस्तक्षेप के फलस्वरूप, सभी नाविकों को 23 जुलाई 2026 को अकरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से भारत के लिए रवाना किया गया।
यह सफल रेस्क्यू मिशन भारत सरकार की अपने नागरिकों की सुरक्षा के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है, विशेषकर जब वे विदेशी धरती पर विपरीत परिस्थितियों में फंसे हों। उच्चायोग ने 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर इस जानकारी को साझा करते हुए बताया कि एम.वी रहाफ मून के नौ भारतीय क्रू सदस्यों की स्वदेश वापसी सुनिश्चित की गई है।
'क्रू एबंडनमेंट' का गंभीर मामला
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) और अन्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह मामला समुद्री इतिहास में 'क्रू एबंडनमेंट' (जहाज के मालिक द्वारा चालक दल को लावारिस छोड़ देना) का एक अत्यंत गंभीर उदाहरण था। इन नौ भारतीयों के अलावा, जहाज पर दो अज़रबैजानी और एक तुर्की नागरिक भी सवार थे। जहाज के मालिक ने 3 मार्च 2026 को घाना के तेमा बंदरगाह पर जहाज और उसके चालक दल को पूरी तरह से असहाय स्थिति में छोड़ दिया था।
लगभग 142 दिनों के अनिश्चितता भरे इंतजार के दौरान, चालक दल को पिछले चार महीनों से वेतन का भुगतान भी नहीं किया गया था। इस स्थिति ने न केवल उनके सामने गहरा आर्थिक संकट खड़ा कर दिया था, बल्कि गंभीर मानवीय पीड़ा का कारण भी बन गया था।
उच्चायोग के समन्वय का परिणाम
भारतीय उच्चायोग ने घाना मैरीटाइम अथॉरिटी, घाना पोर्ट्स एंड हार्बर्स अथॉरिटी और इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट वर्कर्स फेडरेशन (आईटीएफ) के सक्रिय सहयोग और समर्थन से इस रेस्क्यू ऑपरेशन को अंजाम दिया। इन सभी संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों से नाविकों को समय पर सहायता मिल सकी और उनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित हुई। यह घटना अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के प्रवर्तन और नाविकों के अधिकारों की सुरक्षा की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालती है।
