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गर्भावस्था में एनीमिया: शिशु के मस्तिष्क विकास पर असर, शोध में खुलासे

किंग्स कॉलेज लंदन और यूनिवर्सिटी ऑफ केपटाउन के शोध में खुलासा हुआ है कि गर्भावस्था के दौरान मातृ एनीमिया का शिशु के मस्तिष्क के कुल आयतन और महत्वपूर्ण हिस्सों पर प्रभाव पड़ सकता है।

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गर्भावस्था में एनीमिया: शिशु के मस्तिष्क विकास पर असर, शोध में खुलासे

द क्लिफ न्यूज़ | 10 सितंबर 2026

गर्भावस्था के दौरान मां में एनीमिया का गंभीर प्रभाव न केवल मां के स्वास्थ्य पर पड़ता है, बल्कि यह गर्भ में पल रहे शिशु के मस्तिष्क के विकास को भी प्रभावित कर सकता है। लंदन स्थित किंग्स कॉलेज लंदन और दक्षिण अफ्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ केपटाउन के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में इस बात के पुख्ता संकेत मिले हैं कि मातृ एनीमिया का शिशु के मस्तिष्क के कुल आयतन और उसके कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों के आयतन में कमी से संबंध हो सकता है। यह शोध गर्भावस्था में आयरन की कमी को मात्र शारीरिक कमजोरी मानकर नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करता है।

यह व्यापक अध्ययन केपटाउन में 394 मां-बच्चों की जोड़ियों पर केंद्रित था। शोधकर्ताओं ने तीन महीने से लेकर दो वर्ष तक की आयु के बच्चों के मस्तिष्क का कई चरणों में एमआरआई (MRI) के माध्यम से विश्लेषण किया। प्राप्त निष्कर्षों के अनुसार, जिन माताओं को गर्भावस्था के दौरान एनीमिया था, उनके बच्चों में औसतन कुल मस्तिष्क आयतन लगभग 4 प्रतिशत कम पाया गया। यह अंतर बच्चों के लगभग 12 महीने की उम्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा था।

मस्तिष्क के प्रमुख हिस्सों में आयतन का अंतर

शोध में मस्तिष्क के कुछ विशिष्ट हिस्सों में भी उल्लेखनीय अंतर दर्ज किया गया। इन हिस्सों में कॉर्पस कॉलोसम (Corpus Callosum), कॉडेट न्यूक्लियस (Caudate Nucleus) और पुटामेन (Putamen) शामिल हैं। ये सभी संरचनाएं मानव मस्तिष्क में अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करती हैं, जैसे कि शारीरिक गतिविधियों का समन्वय, सीखने की क्षमता, भावनाओं का नियंत्रण, कार्यकारी कार्यों का प्रबंधन और मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धों के बीच संचार स्थापित करना। विश्लेषण में पाया गया कि 12 महीने की उम्र तक, एनीमिया से प्रभावित समूह के बच्चों में कॉर्पस कॉलोसम का आयतन लगभग 4 प्रतिशत कम था, और यह अंतर 24 महीने की उम्र तक बढ़कर लगभग 6 प्रतिशत हो गया।

हल्के एनीमिया का भी पड़ सकता है असर

इस शोध की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अध्ययन में शामिल अधिकांश माताओं में एनीमिया का स्तर हल्का था। इसके बावजूद, उनके बच्चों के मस्तिष्क की संरचना में यह अंतर स्पष्ट रूप से देखा गया। यह निष्कर्ष इस बात को रेखांकित करते हैं कि गर्भावस्था के दौरान एनीमिया, चाहे वह हल्के स्तर का ही क्यों न हो, शिशु के मस्तिष्क के विकास पर संभावित नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह परिणाम गर्भावस्था से पहले और गर्भावस्था के दौरान एनीमिया की रोकथाम और समय पर उपचार के महत्व को बहुत अधिक बढ़ा देते हैं। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह अध्ययन यह निश्चित रूप से नहीं कहता कि एनीमिया से पीड़ित हर मां के बच्चे का मस्तिष्क छोटा ही होगा, बल्कि यह मातृ एनीमिया और मस्तिष्क की संरचना में देखे गए बदलावों के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध स्थापित करता है।

पिछले अध्ययनों की कड़ी

यह नया शोध किंग्स कॉलेज लंदन और यूनिवर्सिटी ऑफ केपटाउन के संयुक्त प्रयासों से किए गए पिछले अध्ययनों की श्रृंखला को आगे बढ़ाता है। वर्ष 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में भी इन्हीं शोधकर्ताओं ने 6 से 7 वर्ष की आयु के बच्चों में गर्भावस्था के दौरान मातृ एनीमिया और मस्तिष्क के कुछ हिस्सों, विशेषकर कॉर्पस कॉलोसम और कॉडेट न्यूक्लियस के कम आयतन के बीच संबंध पाया था। यह वर्तमान अध्ययन इन निष्कर्षों की पुष्टि करता है और इसे प्रारंभिक शिशु अवस्था तक ले जाता है।

एनीमिया के कारण और बचाव

एनीमिया का सबसे प्रमुख कारण शरीर में आयरन की कमी है। आयरन हीमोग्लोबिन के निर्माण के लिए आवश्यक है, जो रक्त के माध्यम से पूरे शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने का कार्य करता है। गर्भावस्था के दौरान मां और भ्रूण दोनों की आयरन की आवश्यकताएं बढ़ जाती हैं, इसलिए पर्याप्त मात्रा में आयरन का सेवन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। यह समझना भी आवश्यक है कि एनीमिया केवल आयरन की कमी से ही नहीं होता। संक्रमण, पुरानी सूजन, फोलेट (Folate) या विटामिन बी12 (Vitamin B12) की कमी जैसे अन्य कारक भी एनीमिया के कारण बन सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि मातृ एनीमिया दुनिया भर में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। गर्भावस्था के दौरान एनीमिया की रोकथाम को केवल मां के व्यक्तिगत स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे शिशु के दीर्घकालिक स्वास्थ्य और विकास के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए। इसके लिए गर्भावस्था के दौरान नियमित हीमोग्लोबिन जांच, चिकित्सकों द्वारा निर्देशित आयरन और फोलिक एसिड सप्लीमेंट्स का सेवन, और एक संतुलित व पौष्टिक आहार मां और बच्चे दोनों के स्वस्थ विकास के लिए अनिवार्य हैं।