डॉ. लालित्य ललित के व्यंग्य संग्रह का उर्दू अनुवाद लोकार्पित
दिल्ली में डॉ. लालित्य ललित के निवास पर उनके व्यंग्य संग्रह 'किस्से विलायती राम पांडेय के' के उर्दू अनुवाद का आत्मीय लोकार्पण किया गया।

द क्लिफ न्यूज़ | 4 अगस्त 2026
प्रख्यात व्यंग्यकार डॉ. लालित्य ललित के व्यंग्य संग्रह 'किस्से विलायती राम पांडेय के' के उर्दू अनुवाद का हाल ही में दिल्ली में उनके निवास पर साहित्यकारों और मित्रों की उपस्थिति में एक आत्मीय समारोह में लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर साहित्य जगत की कई जानी-मानी हस्तियां मौजूद रहीं।
कार्यक्रम में व्यंग्य यात्रा के संस्थापक संपादक डॉ. प्रेम जन्मेजय, व्यंग्य समालोचक व पटकथा लेखक सुभाष चंदर (रजनी की बारात के लेखक), प्रो. राजेश कुमार, प्रवासी संसार पत्रिका के संपादक डॉ. राकेश पांडेय, शिक्षाविद श्री सूर्यकांत शर्मा, अमेरिका से पधारे वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ. हरीश नवल, वरिष्ठ लेखक डॉ. संजीव कुमार, युवा लेखक रणविजय राव, श्रीमती आशा कुंदरा, कथाकार राजेश्वरी मंडोरा, कवयित्री सोनी लक्ष्मी राव और समाज सेवी श्रीमती सूर्यकांत शर्मा सहित डॉ. मनोरमा भी उपस्थित थीं।
डॉ. ललित की लेखन क्षमता की प्रशंसा
डॉ. प्रेम जन्मेजय ने डॉ. लालित्य ललित को पिछले तीस वर्षों से जानने का ज़िक्र करते हुए उनकी सोच, कर्म और कहन शैली की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि ललित की अद्भुत लेखन क्षमता ने उन्हें प्रभावित और आश्चर्यचकित किया है, जिसके चलते उनके दर्जन भर पात्र सीधे पाठकों से संवाद करते हैं।
व्यंग्य समालोचक प्रो. राजेश कुमार ने डॉ. ललित की मेहनत को रेखांकित करते हुए कहा कि यही कारण है कि उनके व्यंग्य लेखन का अनुवाद भारतीय भाषाओं में निर्बाध रूप से हो रहा है और उन्हें पढ़ा जा रहा है। उन्होंने डॉ. ललित को बधाई और शुभकामनाएं दीं।
साफगोई और लेखन शैली को सराहा गया
वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ. हरीश नवल ने डॉ. ललित की साफगोई और लेखन के प्रति उनके समर्पण को याद किया। उन्होंने कहा कि डॉ. ललित ने बड़ी मेहनत से अपनी जगह बनाई है और वे उम्मीद करते हैं कि डॉ. ललित इसी तरह लिखते रहेंगे और पाठकों को आश्चर्यचकित करते रहेंगे।
'कल्लू मामा' के नाम से चर्चित व्यंग्यकार सुभाष चंदर ने डॉ. ललित के साथ अपनी समानता का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों की जिद्दी लेखक प्रवृत्ति उन्हें कुछ ठान लेने पर उसे पूरा करने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने डॉ. ललित के पहले व्यंग्य संग्रह 'ज़िंदगी तेरे नाम डार्लिंग' का स्मरण करते हुए कहा कि कुछ ही वर्षों में डॉ. ललित ने व्यंग्य की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना ली है, जिसे अब कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता।
अनिवार्य हस्ताक्षर के रूप में उभरे डॉ. ललित
शिक्षाविद सूर्यकांत शर्मा, राकेश पांडेय और रणविजय राव ने भी डॉ. ललित को बधाई दी। डॉ. संजीव कुमार ने कहा कि डॉ. लालित्य ललित आज एक अनिवार्य हस्ताक्षर बन गए हैं, जिनके व्यंग्य कई भाषाओं में अनूदित हो चुके हैं और कई विश्वविद्यालयों में उन पर शोध कार्य आरंभ हो चुका है। उन्होंने कहा कि उनका निरंतर लेखन नई आशाएं जगाता है।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. मनोरमा जी का जन्मदिन भी मनाया गया, साथ ही डॉ. संजीव कुमार की नई पुस्तक 'ओम' का भी लोकार्पण हुआ। इस पुस्तक को पाठकों द्वारा सराहे जाने की उम्मीद जताई गई।
