डिजिटल बचपन की छाया से परे, जनरेशन अल्फा को अपना भविष्य लिखने की आजादी मिलनी चाहिए
बच्चों के बचपन का डिजिटल रिकॉर्ड उनके भविष्य को कैसे प्रभावित कर सकता है, इस पर एक विश्लेषण।

बचपन: संभावनाओं का आकाश
डॉ. भूपेंद्र कुमार सुल्लेर के अनुसार, "बचपन एक ऐसा समय होता है जब भविष्य की कोई एक, पूर्वनिर्धारित तस्वीर नहीं होती; यह संभावनाओं का एक आकाश होता है जिसमें बच्चा अपनी दिशा स्वयं चुनने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए।" पिछली पीढ़ियों के लिए, बचपन काफी हद तक एक निजी दुनिया थी, जो वयस्कों के रूप में विकसित होने पर यादों में विलीन हो जाती थी।
जनरेशन अल्फा का बदलता बचपन
जनरेशन अल्फा के लिए, बचपन मौलिक रूप से भिन्न है। उनका जीवन न केवल पारिवारिक एल्बम और व्यक्तिगत यादों में, बल्कि सर्वर, एप्लिकेशन, सर्च इंजन, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, डिजिटल कक्षाओं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों में भी दर्ज हो रहा है। यह परिवर्तन एक नए 'एआई शैडो' (AI Shadow) को जन्म दे रहा है।
एआई शैडो: मशीनी अनुमान का जाल
एआई शैडो में केवल वह जानकारी शामिल नहीं होती जिसे बच्चा ऑनलाइन साझा करता है, बल्कि मशीनों द्वारा बच्चे के डिजिटल व्यवहार से उत्पन्न निष्कर्ष और भविष्यवाणियां भी शामिल हो सकती हैं। जैसे कि वे क्या पसंद करते हैं, किन विषयों में संघर्ष करते हैं, या सिस्टम का मानना है कि वे भविष्य में क्या बन सकते हैं।
भारत में डिजिटल जुड़ाव और असमानता
भारत में, डिजिटल तकनीक बच्चों की शिक्षा, मनोरंजन, संचार और सामाजिक संपर्क का अभिन्न अंग बन गई है। आंकड़ों के अनुसार, 14-16 वर्ष के 89.1% किशोरों के घर में स्मार्टफोन उपलब्ध है। हालांकि, केवल लगभग 63.5% स्कूलों के पास इंटरनेट की सुविधा है, जो भारत की डिजिटल यात्रा में असमानता को दर्शाती है।
एआई के लाभ और जोखिम
एआई बच्चों के लिए जबरदस्त लाभ प्रदान कर सकता है, जैसे व्यक्तिगत शिक्षा को अधिक सुलभ और प्रभावी बनाना। हालाँकि, एआई वही अनुमान लगा सकता है जो बच्चे ने कभी सचेत रूप से व्यक्त नहीं किया हो। यह अवसर और जोखिम दोनों प्रस्तुत करता है।
डिजिटल पहचान का खतरा
आज के डिजिटल निष्कर्ष कल की सामाजिक पहचान बन सकते हैं। यदि इन अनुमानों का असर शैक्षिक अवसरों, विज्ञापनों या भविष्य के एल्गोरिथम निर्णयों पर पड़ता है, तो यह 'एआई शैडो' का सबसे बड़ा खतरा है। बचपन की परिभाषित विशेषता परिवर्तन है, जिसे एआई सिस्टम भूल सकता है।
डिजिटल रूप से बदलने का अधिकार
बच्चों को केवल डिजिटल गोपनीयता का अधिकार नहीं, बल्कि व्यापक अर्थों में, 'डिजिटली बदलने का अधिकार' मिलना चाहिए। उन्हें उन लोगों के रूप में विकसित होने की स्वतंत्रता होनी चाहिए जिनकी संभावनाओं को बचपन में किसी मशीन द्वारा स्थायी रूप से भविष्यवाणी नहीं की गई हो।
तीसरा डिजिटल विभाजन: एआई की समझ
एआई ने एक तीसरा डिजिटल विभाजन बनाया है: कौन एआई को समझता है, और कौन केवल उस पर निर्भर है? माता-पिता, अभिभावकों और शिक्षकों को भी एआई साक्षरता की आवश्यकता है ताकि वे बच्चों को प्रभावी मार्गदर्शन दे सकें।
डेटा सुरक्षा में नए आयाम
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 बच्चों के डेटा के लिए विशेष सुरक्षा प्रदान करता है। लेकिन एआई के युग में, डेटा सुरक्षा को यह पूछना होगा, 'मशीन ने क्या अनुमान लगाया?' न कि केवल 'बच्चे ने क्या प्रकट किया?'
'विकासवादी डेटा न्यूनीकरण' का सिद्धांत
भारत को 'विकासवादी डेटा न्यूनीकरण' (developmental data minimisation) के सिद्धांत पर काम करना चाहिए, जहां केवल शिक्षा, सुरक्षा या वैध सेवाओं के लिए आवश्यक डेटा एकत्र किया जाए और अनावश्यक डेटा को सुरक्षित रूप से हटा दिया जाए।
बालपन की गलतियों को स्थायी प्रोफाइल न बनाएं
बचपन का व्यवहार किसी व्यक्ति का स्थायी डिजिटल प्रोफाइल नहीं बनना चाहिए। दस साल के बच्चे की गलती तीस साल के व्यक्ति की पहचान नहीं बननी चाहिए। मशीनों की पैटर्न याद रखने की क्षमता को देखते हुए, 'एल्गोरिथम भूलने' (algorithmic forgetting) का सिद्धांत महत्वपूर्ण हो जाता है।
डिजिटल नागरिकता और भावनात्मक जुड़ाव
एक बच्चा डिजिटल नागरिक के रूप में अपने अतीत से स्थायी रूप से कैद नहीं होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, बच्चों द्वारा एआई के साथ विकसित किए जाने वाले भावनात्मक संबंध भी एक उभरती हुई चिंता का विषय हैं।
