धार की वाग्देवी प्रतिमा: ब्रिक्स मंच पर उठी लंदन से वापसी की मांग
धार की 11वीं शताब्दी की प्रतिमा को ब्रिटिश म्यूजियम से भारत लाने की मांग अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का हिस्सा बनी। भोपाल में ब्रिक्स बैठक में सांस्कृतिक विरासत की वापसी पर जोर दिया गया।

द क्लिफ न्यूज़ | भोपाल | 9 अगस्त 2026
मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला से संबंधित 11वीं शताब्दी की एक दुर्लभ प्रतिमा को लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम से भारत वापस लाने का मुद्दा अब राष्ट्रीय कूटनीति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी गूंजने लगा है। भारत सरकार औपनिवेशिक काल में देश से बाहर ले जाई गई सांस्कृतिक संपदा की वापसी के लिए अपने राजनयिक प्रयासों को तेज कर रही है। इसी क्रम में, भोपाल में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) संस्कृति मंत्रियों की बैठक में सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और ऐतिहासिक कलाकृतियों की वापसी का विषय प्रमुखता से उभरा।
यह प्रतिमा, जिसे धार की भोजशाला से जुड़ी वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा के रूप में पहचाना जाता है, लंबे समय से भारत वापसी की मांग का केंद्र रही है। इस वर्ष मई 2026 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर से संबंधित मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था, जिसमें परिसर को देवी वाग्देवी से संबंधित मंदिर के रूप में मान्यता दी गई थी। अदालत में प्रतिमा को ब्रिटिश म्यूजियम से भारत वापस लाने का मुद्दा भी उठाया गया था, जिसने इस मांग को नई दिशा दी।
प्रतिमा की पहचान पर ऐतिहासिक मतभेद
हालांकि, इस ऐतिहासिक प्रतिमा की पहचान को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद मौजूद हैं। ब्रिटिश म्यूजियम के अभिलेखों में इस 11वीं शताब्दी की प्रतिमा को धार से प्राप्त बताया गया है और इसकी पहचान संभवतः जैन परंपरा की देवी अंबिका से की गई है। वहीं, भारत में व्यापक रूप से इसे वाग्देवी या मां सरस्वती की प्रतिमा मानते हुए इसे वापस लाने की पुरजोर मांग की जा रही है। प्रतिमा पर उत्कीर्ण शिलालेखों और उसके ऐतिहासिक संदर्भों की व्याख्या को लेकर भी विभिन्न विद्वानों की राय अलग-अलग रही है, जो इस मुद्दे को और जटिल बनाती है।
ब्रिक्स मंच से सांस्कृतिक संपदा वापसी पर बल
भारत की अध्यक्षता में अगस्त 2026 में भोपाल में संपन्न ब्रिक्स संस्कृति मंत्रियों की बैठक में, औपनिवेशिक काल में विभिन्न देशों से बलपूर्वक या अनुचित माध्यमों से ले जाई गई सांस्कृतिक वस्तुओं की वापसी पर विशेष जोर दिया गया। इस बैठक में सदस्य देशों के बीच सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और इस क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने के उपायों पर गहन चर्चा हुई।
भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने ऐसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग तंत्र की आवश्यकता को रेखांकित किया, जो चोरी, तस्करी या औपनिवेशिक शासन के तहत अपने मूल स्थान से विस्थापित हुई मूर्तियों, कलाकृतियों और पुरावशेषों की पहचान करने और उन्हें उनके संबंधित देशों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को सुदृढ़ कर सके। धार की प्रतिमा का मामला, इसी व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रयास का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया है, जो न केवल मध्य प्रदेश की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा है, बल्कि भारत की उस नीति का भी प्रतिनिधित्व करता है जिसके तहत विदेशों में मौजूद प्राचीन भारतीय धरोहरों को स्वदेश वापस लाने के प्रयास निरंतर जारी हैं।
विगत वर्षों में स्वदेश लौटीं सैकड़ों प्राचीन कलाकृतियाँ
यह उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत सफलतापूर्वक बड़ी संख्या में प्राचीन मूर्तियों और पुरावशेषों को विदेशों से वापस लाने में कामयाब रहा है। वर्ष 2014 के बाद से, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन जैसे देशों से सैकड़ों मूल्यवान भारतीय कलाकृतियाँ, जिनमें विभिन्न कालखंडों की मूर्तियां, धार्मिक कला वस्तुएं और अन्य ऐतिहासिक महत्व की चीजें शामिल हैं, भारत लौट चुकी हैं। भारत का दृष्टिकोण अब केवल द्विपक्षीय स्तर पर पुरावशेषों की वापसी तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक संपदा के प्रत्यावर्तन के लिए एक व्यापक और प्रभावी सहयोग व्यवस्था विकसित करने पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है। ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंच इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की क्षमता रखते हैं।
ब्रिटेन के साथ मामला जटिल और चुनौतीपूर्ण
धार की वाग्देवी प्रतिमा की वापसी का मामला इसलिए भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण हो जाता है, क्योंकि ब्रिटेन में मौजूद ऐतिहासिक वस्तुओं की वापसी की प्रक्रिया अक्सर कई कानूनी, कूटनीतिक और ऐतिहासिक पहलुओं से जुड़ी होती है। इसमें प्रतिमा के मूल स्थान, उसके स्वामित्व के ऐतिहासिक प्रमाण, ब्रिटेन में उसके आगमन की परिस्थितियां, संबंधित काल के ऐतिहासिक दस्तावेज और वहां लागू होने वाले कानून जैसे कई कारकों की गहन जांच की आवश्यकता होगी।
इस प्रकार, प्रतिमा की वापसी की प्रक्रिया केवल एक प्रशासनिक अनुरोध या राजनयिक आग्रह मात्र नहीं होगी। भारत को ब्रिटिश अधिकारियों और संबंधित सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ मिलकर, ऐतिहासिक साक्ष्यों और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर, एक सुविचारित राजनयिक और कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा। यह प्रक्रिया लंबी और जटिल हो सकती है, जिसके लिए गहन शोध और निरंतर कूटनीतिक प्रयासों की आवश्यकता होगी।
विरासत का सवाल भोजशाला से लंदन तक
धार की भोजशाला, जो स्वयं ऐतिहासिक, धार्मिक और कानूनी बहसों का एक महत्वपूर्ण केंद्र रही है, अब अपनी उस कथित मूल प्रतिमा के भारत लौटने की उम्मीद कर रही है, जो कभी इसकी पहचान का अहम हिस्सा मानी जाती थी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के हालिया फैसले के बाद, वाग्देवी की मूल प्रतिमा को वापस लाने की मांग ने पुनः बल पकड़ा है। अब भोपाल में ब्रिक्स देशों के सांस्कृतिक मंच पर हुई चर्चाओं ने इस मांग को एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्रदान कर दिया है, जो भारत की सांस्कृतिक कूटनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।
यदि ब्रिक्स देशों के बीच सांस्कृतिक संपदा की पहचान, उसका उचित दस्तावेजीकरण, संरक्षण और अंततः प्रत्यावर्तन के लिए एक प्रभावी सहयोग तंत्र स्थापित होता है, तो यह न केवल धार की प्रतिमा की वापसी के प्रयासों को गति देगा, बल्कि दुनिया भर में फैले अन्य भारतीय पुरावशेषों की स्वदेश वापसी के मार्ग को भी प्रशस्त करेगा। यह भारत की अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को पुनः प्राप्त करने की व्यापक मुहिम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है, जो भारत की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करेगा।
