डायबिटीज का हड्डियों और जोड़ों पर गंभीर प्रभाव: नियंत्रण क्यों है आवश्यक
अनियंत्रित डायबिटीज न केवल ब्लड शुगर को बढ़ाती है, बल्कि हड्डियों, जोड़ों, मांसपेशियों और टेंडन को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती है, जिससे फ्रैक्चर, गठिया और अन्य ऑर्थोपेडिक समस्याएं बढ़ जाती हैं।

द क्लिफ न्यूज़ | 27 जुलाई 2026
डायबिटीज मेलिटस, जिसे सामान्यतः रक्त शर्करा से जुड़ी बीमारी के रूप में जाना जाता है, के प्रभाव शरीर के कई अंगों तक फैलते हैं, जिनमें मस्कुलोस्केलेटल सिस्टम यानी हड्डियां, जोड़, मांसपेशियां, टेंडन और लिगामेंट्स प्रमुख हैं। लंबे समय तक रक्त शर्करा का उच्च स्तर रक्त संचार, तंत्रिका कार्य, कोलेजन की गुणवत्ता और शरीर की उपचार क्षमता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है, जिससे डायबिटीज से पीड़ित व्यक्तियों में विभिन्न ऑर्थोपेडिक समस्याओं का खतरा सामान्य आबादी की तुलना में काफी बढ़ जाता है।
अनियंत्रित डायबिटीज हड्डियों की गुणवत्ता को कमजोर कर सकती है, जिससे फ्रैक्चर होने की संभावना बढ़ जाती है। विशेष रूप से कूल्हे, रीढ़ और पैरों की हड्डियां अधिक भेद्य हो जाती हैं। हड्डी टूटने की स्थिति में, डायबिटीज रोगियों में उसके जुड़ने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है और नॉन-यूनियन (हड्डी का ठीक से न जुड़ना) जैसी जटिलताओं का जोखिम भी बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, प्रभावित रोग प्रतिरोधक क्षमता हड्डियों में संक्रमण (ऑस्टियोमाइलाइटिस) का खतरा भी बढ़ा सकती है। ऑर्थोपेडिक सर्जरी के बाद संक्रमण और अन्य जटिलताओं की आशंका भी अधिक रहती है, जिससे पुनर्प्राप्ति प्रक्रिया लम्बी हो सकती है।
जोड़ों पर डायबिटीज का प्रभाव
डायबिटीज का सीधा असर जोड़ों पर भी पड़ता है। लंबे समय तक उच्च रक्त शर्करा स्तर शरीर में सूजन को बढ़ावा देता है, जिससे जोड़ों की समस्याएं तीव्रता से बढ़ सकती हैं। ऐसे में ऑस्टियोआर्थराइटिस, जोड़ों में दर्द, अकड़न और गतिशीलता में कमी जैसी परेशानियां अधिक देखने को मिलती हैं। डायबिटीज से पीड़ित व्यक्तियों में फ्रोजन शोल्डर (एडहेसिव कैप्सुलिटिस) की समस्या भी आम है, जिसमें कंधे में दर्द के साथ-साथ उसकी गतिविधि भी सीमित हो जाती है। डायबिटिक न्यूरोपैथी (तंत्रिका कमजोरी) के कारण पैरों में चारकोट आर्थ्रोपैथी जैसी गंभीर स्थिति विकसित हो सकती है, जिसमें जोड़ विकृत हो जाते हैं।
मांसपेशियों की ताकत और कोलेजन पर असर
डायबिटीज के कारण मांसपेशियों की ताकत और गुणवत्ता में भी गिरावट आती है। अनियंत्रित रक्त शर्करा के लंबे समय तक बने रहने से मांसपेशियों का द्रव्यमान कम हो सकता है, जिसे डायबिटिक सारकोपेनिया कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप शरीर में कमजोरी, शीघ्र थकान और शारीरिक क्षमता में कमी महसूस होती है। कुछ मामलों में मांसपेशियों में ऐंठन और दुर्लभ रूप से डायबिटिक मसल इन्फार्क्शन जैसी स्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं। मांसपेशियों की कमजोरी से गिरने और चोट लगने का खतरा भी बढ़ जाता है, जो दैनिक जीवन में बाधा डाल सकता है।
कोलेजन में होने वाले बदलावों के कारण डायबिटीज के रोगियों में टेंडन मोटे, कठोर और कमजोर हो सकते हैं। इससे टेंडन और लिगामेंट से संबंधित समस्याओं की संभावना बढ़ जाती है। डायबिटीज से ग्रसित लोगों में अकिलीज टेंडिनोपैथी, रोटेटर कफ की बीमारी, ट्रिगर फिंगर, डी क्वेरवेन टेनोसिनोवाइटिस और प्लांटर फैसीसाइटिस जैसी समस्याएं अधिक देखी जा सकती हैं। टेंडन या लिगामेंट में चोट लगने के बाद ठीक होने की प्रक्रिया भी धीमी हो जाती है, जिससे जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
ऑर्थोपेडिक सर्जरी में अतिरिक्त जोखिम
ऑर्थोपेडिक सर्जरी कराने वाले डायबिटीज रोगियों को विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। उच्च रक्त शर्करा स्तर के कारण घाव में संक्रमण, घाव भरने में देरी, इम्प्लांट के आसपास संक्रमण और सर्जरी के बाद अकड़न का खतरा बढ़ जाता है। इन जटिलताओं के कारण सर्जरी के बाद पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) और ठीक होने की अवधि काफी बढ़ सकती है, जिससे मरीज की कार्यक्षमता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।
नियंत्रण और बचाव के उपाय
डायबिटीज से जुड़ी ऑर्थोपेडिक समस्याओं को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए रक्त शर्करा का संतुलन बनाए रखना सर्वोपरि है। चिकित्सकों की सलाह के अनुसार, HbA1c स्तर को निर्धारित सीमा के भीतर रखना आवश्यक है। नियमित रूप से वजन उठाने वाले व्यायाम, मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम और फिजियोथेरेपी शरीर की ताकत और लचीलापन बनाए रखने में सहायक होते हैं।
हड्डियों और मांसपेशियों के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए आहार में पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम, विटामिन डी और प्रोटीन का सेवन महत्वपूर्ण है। डायबिटीज मरीजों को अपने पैरों की नियमित रूप से जांच करनी चाहिए और किसी भी घाव या संक्रमण के संकेत दिखने पर तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, धूम्रपान छोड़ना और शराब का सेवन सीमित करना भी इन जटिलताओं को कम करने में लाभकारी सिद्ध होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डायबिटीज केवल एक चयापचय (मेटाबोलिक) विकार नहीं है, बल्कि यह हड्डियों, जोड़ों, मांसपेशियों और टेंडन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। उचित ग्लाइसेमिक नियंत्रण, नियमित व्यायाम, समय पर स्वास्थ्य जांच और सही ऑर्थोपेडिक देखभाल के माध्यम से इन जटिलताओं को न्यूनतम किया जा सकता है। इससे रोगी लंबे समय तक बेहतर गतिशीलता, शारीरिक क्षमता और जीवन की गुणवत्ता बनाए रख सकते हैं।
