ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन: नई दिल्ली में वैश्विक शक्ति संतुलन पर मंथन
भारत की मेजबानी में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में 11 सदस्य देशों के नेता वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार और भू-राजनीति पर चर्चा करेंगे।

संवाददाता: राजीव त्रिपाठी
द क्लिफ न्यूज़ | नई दिल्ली | 11 सितंबर 2026
भारत की अध्यक्षता में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नई दिल्ली के भारत मंडपम में 11 सितंबर से शुरू हो रहा है। यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे हैं। इस बहुप्रतीक्षित आयोजन में ब्रिक्स के 11 सदस्य देशों के नेता, साझेदार देशों के प्रतिनिधि और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अधिकारी भाग ले रहे हैं। सम्मेलन को लेकर राजधानी में उच्चस्तरीय बैठकों, कूटनीतिक गतिविधियों और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था का माहौल है। भारत के लिए यह आयोजन वैश्विक मंच पर अपनी कूटनीतिक और आर्थिक भूमिका को और मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।
भारत ने 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता ग्रहण करते हुए लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता को अपनी प्राथमिकताओं के रूप में रेखांकित किया है। इसका उद्देश्य ब्रिक्स को केवल एक राजनीतिक विमर्श मंच तक सीमित न रखकर, बल्कि आर्थिक विकास, तकनीकी सहयोग, आपूर्ति शृंखला, ऊर्जा, स्वास्थ्य, कृषि, डिजिटल अर्थव्यवस्था और आपदा प्रबंधन जैसे व्यावहारिक क्षेत्रों में सहयोग का एक प्रभावी माध्यम बनाना है। भारत की मंशा है कि सम्मेलन में ऐसे एजेंडों पर सहमति बने, जिनका सीधा संबंध विकासशील देशों की आर्थिक और सामाजिक आवश्यकताओं से है।
ब्रिक्स का बढ़ता दायरा और सदस्य देशों की विविधता
इस शिखर सम्मेलन की एक प्रमुख विशेषता ब्रिक्स का अपने प्रारंभिक सीमित स्वरूप से आगे बढ़कर अब 11 सदस्य देशों का एक व्यापक समूह बन जाना है। वर्तमान में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ-साथ मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया और सऊदी अरब भी इस समूह का हिस्सा हैं। साझेदार देशों और आमंत्रित प्रतिनिधियों की भागीदारी ने सम्मेलन के दायरे को और अधिक विस्तृत किया है। ब्रिक्स का यह विस्तार स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में अपनी उपस्थिति और प्रभाव को बढ़ाना चाहती हैं।
प्रमुख द्विपक्षीय वार्ताएं और भू-राजनीतिक मायने
सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ होने वाली द्विपक्षीय वार्ताएं विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। इन मुलाकातों का महत्व केवल ब्रिक्स के दायरे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भारत-चीन संबंधों, भारत-रूस की रणनीतिक साझेदारी और व्यापक एशियाई भू-राजनीति पर भी गहरा प्रभाव डाल सकता है। चीन के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयासों के बीच दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच किसी भी संवाद को रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है। संभावित चर्चाओं में सीमा संबंधी मुद्दों के अतिरिक्त व्यापार, निवेश, क्षेत्रीय स्थिरता और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग जैसे विषय शामिल हो सकते हैं।
भारत और चीन के बीच आर्थिक संबंध महत्वपूर्ण हैं, किंतु सीमा विवाद और रणनीतिक मतभेद भी बने हुए हैं। ऐसे में भारत के लिए चीन के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखना एक प्रमुख विदेश नीति का उद्देश्य है। ब्रिक्स मंच ऐसे संवाद को आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है, जहाँ दोनों देश एक साझा बहुपक्षीय व्यवस्था के भीतर समान आर्थिक और विकासात्मक हितों पर चर्चा कर सकते हैं।
रूस के साथ भारत के गहरे और लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक संबंधों को देखते हुए, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच होने वाली बातचीत को भी अत्यधिक महत्व दिया जा रहा है। ऊर्जा, रक्षा, व्यापार, भुगतान प्रणालियों में समन्वय और बदलती वैश्विक परिस्थितियों में रणनीतिक सहयोग जैसे प्रमुख मुद्दे चर्चा का हिस्सा बन सकते हैं। यूक्रेन संघर्ष के बाद वैश्विक राजनीति में आए तीव्र बदलावों के बावजूद, भारत ने रूस के साथ अपने संबंधों को बनाए रखा है, साथ ही अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ भी अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को सुदृढ़ किया है। इस संतुलन को बनाए रखना भारत की विदेश नीति की एक प्रमुख विशेषता रही है।
ब्रिक्स के समक्ष साझा सहमति की चुनौती
ब्रिक्स समूह के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक विभिन्न सदस्य देशों के भिन्न राजनीतिक हितों के बीच एक साझा सहमति का निर्माण करना है। समूह के सदस्य देशों की विदेश नीति प्राथमिकताएं अक्सर एक-दूसरे से भिन्न होती हैं। भारत और चीन के बीच प्रत्यक्ष रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है, रूस और पश्चिमी देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं, और पश्चिम एशिया की जटिलताओं को लेकर भी सदस्य देशों की चिंताएं अलग-अलग हैं। ईरान और खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव तथा यूक्रेन संघर्ष जैसे मुद्दे भी समूह के भीतर एक समान रुख अपनाने की चुनौती पेश करते हैं। इसलिए, सम्मेलन के अंत में जारी होने वाली संयुक्त घोषणा में ऐसी भाषा का प्रयोग करना महत्वपूर्ण होगा, जिसे सभी सदस्य देश स्वीकार कर सकें।
भारत का दृष्टिकोण यह है कि ब्रिक्स को किसी एक राष्ट्र या किसी एक राजनीतिक गुट के विरोधी मंच के रूप में स्थापित न किया जाए। इसके बजाय, इसे वैश्विक दक्षिण के आर्थिक, विकासात्मक और राजनीतिक हितों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने वाले एक मंच के रूप में विकसित किया जाए। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित विभिन्न बहुपक्षीय संस्थानों में विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाने की वकालत करता रहा है, और यह मुद्दा भी व्यापक विमर्श का हिस्सा है।
सम्मेलन का आर्थिक एजेंडा: नवाचार, आपूर्ति शृंखला और डिजिटल अर्थव्यवस्था
सम्मेलन के आर्थिक एजेंडे में स्टार्टअप, नवाचार, आपूर्ति शृंखला का सुदृढ़ीकरण और डिजिटल अर्थव्यवस्था को विशेष महत्व दिया जा रहा है। BRICS Startup Innovation Fund और BRICS Incubator Network जैसे प्रस्तावों पर चर्चा होने की उम्मीद है। इनका प्राथमिक उद्देश्य सदस्य देशों के स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को आपस में जोड़ना, नए उद्यमों को सहयोग प्रदान करना और नवाचार के क्षेत्र में सीमा-पार अवसरों को बढ़ावा देना है। भारत के लिए यह क्षेत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश ने हाल के वर्षों में स्टार्टअप और डिजिटल अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व प्रगति देखी है।
वैश्विक आपूर्ति शृंखला का सहयोग भी सम्मेलन के प्रमुख आर्थिक विषयों में से एक है। कोरोना महामारी, वैश्विक संघर्षों और क्षेत्रीय तनावों ने मौजूदा सप्लाई चेन की कमजोरियों को उजागर किया है। ऐसे में, ब्रिक्स देश परिवहन, लॉजिस्टिक्स, वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग और व्यापारिक लचीलेपन को मजबूत करने के लिए आपसी सहयोग बढ़ा सकते हैं। यदि सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश और लॉजिस्टिक्स से संबंधित नियमों में अधिक सामंजस्य स्थापित होता है, तो यह उद्योगों और निर्यातकों के लिए नए व्यावसायिक अवसर खोल सकता है।
डिजिटल अर्थव्यवस्था और सीमा-पार भुगतान प्रणालियों पर सहयोग बढ़ाना भी ब्रिक्स देशों के बीच एक महत्वपूर्ण संभावना है। भारत अपनी डिजिटल भुगतान अवसंरचना और वित्तीय प्रौद्योगिकी (फिनटेक) के अनुभवों को साझा करने में सक्षम होगा। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने पर चर्चा ब्रिक्स के आर्थिक एजेंडे में लंबे समय से शामिल रही है, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में किसी एक प्रमुख मुद्रा पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है। हालांकि, विनिमय दर, भुगतान प्रणाली, पूंजी नियंत्रण और वित्तीय स्थिरता से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों को देखते हुए इस दिशा में प्रगति क्रमिक होने की संभावना है।
ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था
ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा भी भारत के लिए इस शिखर सम्मेलन के प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ी है, जिसका प्रभाव देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहा है। बड़ी आबादी वाले देशों के समूह के रूप में, ब्रिक्स में ऊर्जा आपूर्ति, नवीकरणीय ऊर्जा, हरित प्रौद्योगिकियों और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्रों में व्यापक सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं। भारत विकासशील देशों की ऊर्जा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए स्थिर और किफायती ऊर्जा उपलब्धता पर बल दे सकता है।
सम्मेलन के मद्देनजर दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत कड़ी कर दी गई है। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस, केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों और अर्धसैनिक बलों के बीच गहन समन्वय स्थापित किया गया है। प्रमुख सड़कों, सम्मेलन स्थल, होटलों और हवाई अड्डे तक के मार्गों पर निगरानी बढ़ा दी गई है। संवेदनशील क्षेत्रों में बैरिकेडिंग, सीसीटीवी कैमरों की निगरानी और यातायात नियंत्रण की विशेष व्यवस्था की गई है। सुरक्षा एजेंसियों की सर्वोच्च प्राथमिकता मेहमानों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है, साथ ही आम जनता को कम से कम असुविधा हो, इसका भी ध्यान रखा जा रहा है।
सम्मेलन के कारण दिल्ली की यातायात व्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ा है। कई मुख्य मार्गों पर यातायात मार्ग बदला गया है और आवाजाही को नियंत्रित किया गया है। यात्रियों को यात्रा से पहले यातायात संबंधी दिशा-निर्देशों की जानकारी लेने और आवश्यकतानुसार वैकल्पिक मार्गों का उपयोग करने की सलाह दी जा रही है। विदेशी नेताओं के काफिलों की आवाजाही के दौरान कुछ मार्गों पर अस्थायी यातायात प्रतिबंध लागू किए जा सकते हैं। राजधानी के लिए यह सुरक्षा व्यवस्था और सामान्य जनजीवन के बीच संतुलन बनाए रखने की एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है।
नई दिल्ली घोषणा और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता
सम्मेलन के मुख्य सत्रों में वैश्विक शासन प्रणाली में सुधार, बहुपक्षीय संस्थानों को मजबूत करना, समावेशी आर्थिक विकास और सतत विकास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहन विचार-विमर्श होगा। भारत अपनी नवाचार क्षमताओं और तकनीकी उपलब्धियों को भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के समक्ष प्रदर्शित करेगा। सम्मेलन के समापन पर 'नई दिल्ली घोषणा' जारी किए जाने की संभावना है, जिसमें सदस्य देशों के बीच सहमति वाले प्रमुख मुद्दों और भविष्य की सहयोग प्राथमिकताओं को रेखांकित किया जाएगा।
भारत के लिए इस शिखर सम्मेलन की असली परीक्षा कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की क्षमता पर टिकी होगी। एक ओर रूस और चीन जैसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक साझेदार हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ भारत के आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। भारत किसी एक शक्ति-गुट के साथ पूरी तरह से खड़े होने के बजाय, अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए विभिन्न देशों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने की विदेश नीति पर काम कर रहा है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस रणनीतिक स्वायत्तता को प्रदर्शित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।
नई दिल्ली में आयोजित यह ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए केवल मेजबानी का अवसर नहीं है, बल्कि यह बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका को प्रदर्शित करने का एक मंच भी है। यदि सम्मेलन से स्टार्टअप, डिजिटल भुगतान, आपूर्ति शृंखला, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्रों में ठोस और व्यावहारिक पहलें सामने आती हैं, तो ब्रिक्स की प्रासंगिकता और सार्थकता और अधिक मजबूत होगी। इसके साथ ही, यदि भारत रूस, चीन, ईरान और अन्य सदस्य देशों के भिन्न-भिन्न हितों के बीच एक कुशल संतुलन बनाते हुए एक सर्वसम्मति से जारी होने वाली घोषणा तैयार कराने में सफल होता है, तो यह उसकी कूटनीतिक क्षमता की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।
दिल्ली का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत की वैश्विक भूमिका के विस्तार में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है। इसकी सफलता केवल बड़े नेताओं की मौजूदगी या भव्य आयोजन से निर्धारित नहीं होगी, बल्कि इस बात से तय होगी कि भारत अपने विविध हितों वाले सदस्य देशों को कितनी प्रभावी ढंग से एक साझा आर्थिक और विकासात्मक एजेंडे पर एक साथ ला पाता है। यदि नई दिल्ली वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करते हुए व्यावहारिक आर्थिक सहयोग का एक नया ढांचा प्रस्तुत करने में सफल रहती है, तो यह सम्मेलन भारत की कूटनीतिक प्रतिष्ठा को बढ़ाने के साथ-साथ ब्रिक्स के भविष्य की दिशा तय करने में भी निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
