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भोपाल में 150 नेत्रदान, फिर भी 405 मरीज रोशनी का इंतजार कर रहे

भोपाल में पिछले तीन वर्षों में 150 नेत्रदान हुए, लेकिन 405 कॉर्नियल अंधत्व के मरीज अभी भी कॉर्निया मिलने का इंतजार कर रहे हैं। यह आंकड़े नेत्रदान जागरूकता की आवश्यकता को दर्शाते हैं।

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भोपाल में 150 नेत्रदान, फिर भी 405 मरीज रोशनी का इंतजार कर रहे

द क्लिफ न्यूज़ | भोपाल | 2 सितंबर 2026

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में पिछले तीन वर्षों में 150 नेत्रदान दर्ज किए गए हैं, जो निश्चित रूप से सराहनीय है। हालांकि, यह महत्वपूर्ण उपलब्धि कॉर्नियल अंधत्व से पीड़ित 405 मरीजों की लंबी प्रतीक्षा सूची को कम करने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुई है। यह आंकड़े देश में नेत्रदान की आवश्यकता और उपलब्धता के बीच मौजूद बड़े अंतर को उजागर करते हैं, और मृत्यु के बाद अंगदान के प्रति सामाजिक जागरूकता बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता पर जोर देते हैं।

नेत्रदान को अक्सर 'महादान' की संज्ञा दी जाती है, क्योंकि यह किसी व्यक्ति को मृत्यु के उपरांत दृष्टि का अमूल्य उपहार देने का माध्यम बनता है। इसके बावजूद, कॉर्नियल बीमारी के कारण दृष्टिहीन हुए लोगों की संख्या उपलब्ध कॉर्निया की तुलना में कहीं अधिक है। भोपाल की स्थिति इस राष्ट्रीय समस्या का एक छोटा सा प्रतिबिंब है, जहाँ प्राप्त दान के बावजूद जरूरतमंदों की तादाद कहीं अधिक है।

राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़े का उद्देश्य

देश भर में राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़े का आयोजन इसी जागरूकता की कमी को दूर करने और लोगों को नेत्रदान के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से किया जा रहा है। इस पखवाड़े का मुख्य लक्ष्य लोगों के मन में नेत्रदान को लेकर व्याप्त भ्रांतियों को दूर करना और उन्हें यह समझाना है कि एक व्यक्ति के मृत्युोपरांत उसके नेत्रदान से दो अलग-अलग जरूरतमंद व्यक्ति जीवन में नई रोशनी प्राप्त कर सकते हैं। यह प्रयास सुनिश्चित करता है कि नेत्रदान की प्रक्रिया सुचारू रूप से चले और जरूरतमंदों तक इसका लाभ पहुंचे।

प्रतीक्षा सूची का गंभीर अंतर

चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, एक नेत्रदाता के दोनों कॉर्निया दो अलग-अलग मरीजों के लिए उपयोग किए जा सकते हैं। इस आधार पर, 150 नेत्रदानों से सैद्धांतिक रूप से लगभग 300 कॉर्निया प्राप्त हो सकते थे। हालाँकि, प्रत्येक कॉर्निया की चिकित्सकीय जांच की जाती है और केवल उन्हीं को प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त माना जाता है। इस कारण, नेत्रदान की कुल संख्या और वास्तव में प्रत्यारोपण योग्य कॉर्निया की संख्या में अंतर आ सकता है। वहीं, दूसरी ओर, कॉर्नियल अंधत्व से प्रभावित मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो इस गंभीर समस्या की ओर इशारा करता है। 405 मरीजों की यह लंबी प्रतीक्षा सूची आवश्यकता और उपलब्धता के बीच के भारी अंतर को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

जागरूकता और पारिवारिक सहमति का महत्व

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मृत्यु के उपरांत यदि परिवार समय पर आई बैंक या संबंधित चिकित्सा संस्थान को सूचना दे और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करे, तो अधिक से अधिक दान किए गए कॉर्निया जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाए जा सकते हैं। नेत्रदान के लिए व्यक्तिगत संकल्प लेना अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी कहीं अधिक जरूरी है कि परिवार के सदस्य इस बारे में सूचित हों। मृत्यु के बाद, परिजन की सहमति और एक सुव्यवस्थित चिकित्सकीय प्रक्रिया के माध्यम से ही नेत्रदान संभव हो पाता है। इसलिए, व्यक्ति को अपने जीवनकाल में नेत्रदान का संकल्प लेने के साथ-साथ अपने परिवार को भी इस बारे में जानकारी देनी चाहिए, ताकि आवश्यकता पड़ने पर वे तत्काल संबंधित संस्थान से संपर्क कर सकें।

समयबद्धता और भ्रांतियों का निवारण

नेत्रदान की प्रक्रिया एक समय-सीमा के भीतर पूरी की जानी होती है। सामान्यतः, मृत्यु के बाद जितनी जल्दी संबंधित आई बैंक या अधिकृत चिकित्सा टीम को सूचना दी जाती है, कॉर्निया को सुरक्षित रखने के लिए उतनी ही बेहतर स्थिति होती है। कॉर्निया को संरक्षित रखने के लिए एक निश्चित समय-सीमा के भीतर ही प्रत्यारोपण योग्य बनाने की प्रक्रिया पूरी करनी आवश्यक है। यही कारण है कि परिवार को मृत्यु के तुरंत बाद देरी किए बिना संबंधित संस्था से संपर्क करने की सलाह दी जाती है।

समाज में नेत्रदान को लेकर कई तरह की भ्रांतियां आज भी व्याप्त हैं। एक प्रमुख भ्रांति यह है कि नेत्रदान करने से मृत व्यक्ति का चेहरा खराब हो जाता है। हालांकि, चिकित्सा प्रक्रिया में आंखों के उपयोगी ऊतकों को अत्यंत सावधानी से निकाला जाता है, और आमतौर पर चेहरे पर ऐसा कोई बदलाव नहीं होता जो अंतिम दर्शन को प्रभावित करे। नेत्रदान की पूरी प्रक्रिया प्रशिक्षित चिकित्सा टीमों द्वारा की जाती है, और इस दौरान परिवार की धार्मिक एवं सामाजिक भावनाओं का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। इसके अतिरिक्त, यह भी एक आम धारणा है कि केवल पूरी तरह स्वस्थ आंखों वाले व्यक्ति ही नेत्रदान कर सकते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि चश्मा पहनने वाले, मधुमेह या उच्च रक्तचाप जैसी सामान्य बीमारियों से पीड़ित व्यक्ति, तथा मोतियाबिंद का ऑपरेशन करा चुके लोग भी नेत्रदान के लिए पात्र हो सकते हैं। अंतिम निर्णय हमेशा चिकित्सा दल द्वारा जांच के बाद ही लिया जाता है।

प्रत्यारोपण प्रक्रिया

यह समझना महत्वपूर्ण है कि नेत्रदान में पूरी की पूरी आंख किसी दूसरे व्यक्ति की आंख में प्रत्यारोपित नहीं की जाती। वास्तव में, आंख के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से, कॉर्निया का उपयोग किया जाता है। कॉर्निया आंख की सामने की ओर स्थित एक पारदर्शी परत होती है, जिसके क्षतिग्रस्त होने से व्यक्ति की दृष्टि गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। जब किसी मरीज को उपयुक्त कॉर्निया मिल जाता है, तो कॉर्नियल ट्रांसप्लांट (कॉर्निया प्रत्यारोपण) सर्जरी के माध्यम से उसकी दृष्टि को सुधारा जा सकता है।

जागरूकता से घट सकती है प्रतीक्षा सूची

भोपाल में 150 नेत्रदान और 405 की प्रतीक्षा सूची का यह आंकड़ा दर्शाता है कि हमें अभी भी बहुत लंबा रास्ता तय करना है। इस अंतर को पाटने के लिए केवल नेत्रदान का संकल्प लेना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए परिवार को प्रक्रिया की पूरी जानकारी देना, मृत्यु के बाद समय पर सूचना देना और समाज में व्याप्त गलतफहमियों को दूर करना अत्यंत आवश्यक है। नेत्रदान के प्रति बढ़ती जागरूकता से कॉर्निया की उपलब्धता बढ़ेगी और लंबे समय से प्रकाश की आशा में बैठे मरीजों को एक नया जीवन मिल सकेगा। मृत्यु के बाद आंखों का दान किसी परिवार के लिए अंतिम विदाई हो सकता है, लेकिन यह किसी दूसरे परिवार के लिए रोशनी और खुशियों की नई शुरुआत साबित हो सकता है।