भारत में विटामिन डी की कमी: अध्ययनों के आंकड़े चिंताजनक, हड्डियों के स्वास्थ्य पर संकट
बदलती जीवनशैली और धूप से दूरी के कारण भारत में बड़ी संख्या में लोग विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं। विभिन्न अध्ययनों के...

द क्लिफ न्यूज़ | 1 सितंबर 2026
भारत में विटामिन डी की कमी एक गंभीर पोषण संबंधी समस्या के रूप में उभर रही है, जिसका सीधा असर हड्डियों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। आधुनिक जीवनशैली, जिसमें लंबे समय तक घर और कार्यालयों के भीतर रहना और सूर्य के प्रकाश से दूरी शामिल है, इस कमी के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। विभिन्न अध्ययनों से प्राप्त आंकड़े इस समस्या की व्यापकता को दर्शाते हैं और चिंता बढ़ा रहे हैं।
उत्तर भारत में किए गए एक अध्ययन में स्वस्थ वयस्कों के एक समूह में 65.4 प्रतिशत लोगों में 25-hydroxy vitamin D (25(OH)D) का स्तर 20 ng/mL से कम पाया गया। यह दर्शाता है कि आधे से अधिक आबादी इस महत्वपूर्ण पोषक तत्व की कमी से ग्रसित है। विटामिन डी शरीर में कैल्शियम के अवशोषण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो हड्डियों के निर्माण, मजबूती और उनके रखरखाव के लिए एक अनिवार्य खनिज है। इसके बिना, कैल्शियम का प्रभावी उपयोग संभव नहीं हो पाता।
विभिन्न अध्ययनों से सामने आए आंकड़े
भारत में विटामिन डी की कमी की स्थिति का जायजा लेने के लिए कई व्यापक अध्ययन किए गए हैं। 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, करीब 10,000 लोगों के परीक्षण में 60 प्रतिशत लोगों में 25(OH)D का स्तर 20 ng/mL से कम पाया गया। इसमें 24.1 प्रतिशत लोगों में यह स्तर 20 से 29 ng/mL के बीच और केवल 15.9 प्रतिशत लोगों में 30 ng/mL या उससे अधिक था। इस अध्ययन में पुरुषों में 56 प्रतिशत और महिलाओं में 63 प्रतिशत लोगों को विटामिन डी की कमी की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया।
एक अन्य बड़े भारतीय अध्ययन, जिसमें 26,346 लोगों के स्वास्थ्य परीक्षण के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, ने भी चिंताजनक तस्वीर पेश की। इस अध्ययन में 59 प्रतिशत लोगों में विटामिन डी का स्तर 20 ng/mL से नीचे पाया गया, जबकि लगभग 34 प्रतिशत लोगों में यह स्तर अपर्याप्त था। केवल करीब 7 प्रतिशत लोगों में ही विटामिन डी का पर्याप्त स्तर दर्ज किया गया। हालांकि, यह स्पष्ट किया गया है कि इन आंकड़ों को पूरे देश की आबादी का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह स्वास्थ्य जांच के लिए आए लोगों के रिकॉर्ड पर आधारित थे। तमिलनाडु में ग्रामीण वयस्कों पर किए गए एक अध्ययन में भी 424 प्रतिभागियों में से 13.9 प्रतिशत का 25(OH)D स्तर 12 ng/mL से कम और 41.3 प्रतिशत का स्तर 12 से 20 ng/mL के बीच पाया गया।
जीवनशैली और आहार की भूमिका
आधुनिक जीवनशैली में विटामिन डी की कमी का मुख्य कारण पर्याप्त मात्रा में सूर्य की रोशनी का न मिलना है। कार्यालयों में लंबे समय तक काम करना, घरों के भीतर अधिक समय बिताना और बाहरी गतिविधियों में कमी इसके जोखिम को बढ़ाती है। हमारे शरीर की त्वचा सूर्य की पराबैंगनी-बी (UV-B) किरणों के संपर्क में आने पर विटामिन डी का संश्लेषण करती है। हालांकि, विटामिन डी के निर्माण की मात्रा त्वचा के रंग, व्यक्ति की उम्र, मौसम, भौगोलिक स्थिति, शरीर के ढके हुए हिस्से और सूर्य के संपर्क में बिताए समय जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है।
खानपान भी विटामिन डी के स्तर को प्रभावित करता है। दूध, कुछ डेयरी उत्पाद, अंडे की जर्दी और वसायुक्त मछलियां विटामिन डी के प्राकृतिक स्रोत हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ खाद्य पदार्थों को विटामिन डी से फोर्टिफाइड (समृद्ध) भी किया जाता है। अध्ययन में धूप में बिताए गए समय और शरीर के कितने हिस्से के धूप के संपर्क में आने का संबंध भी विटामिन डी स्तर से पाया गया है।
स्वास्थ्य पर प्रभाव और बचाव
विटामिन डी की कमी के कारण कई स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। बच्चों में, यह हड्डियों के सामान्य विकास को बाधित कर सकता है, जिससे रिकेट्स जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। वयस्कों में, लंबे समय तक कमी से हड्डियां कमजोर हो सकती हैं, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, मांसपेशियों में कमजोरी, शरीर और हड्डियों में दर्द, और अत्यधिक थकान भी इसके लक्षण हो सकते हैं। हालांकि, ये लक्षण अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भी हो सकते हैं, इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर विटामिन डी की कमी की पुष्टि करना संभव नहीं है।
चिकित्सक रक्त में 25-hydroxy vitamin D (25(OH)D) के स्तर की जांच कराने की सलाह दे सकते हैं, ताकि इसकी कमी का सही निदान किया जा सके। भारतीय स्वास्थ्य अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा जारी दिशा-निर्देशों में भी हड्डियों से संबंधित समस्याओं के मूल्यांकन में 25(OH)D की जांच को शामिल किया गया है।
चिकित्सकीय सलाह और संपूर्ण स्वास्थ्य
विशेषज्ञों का मानना है कि विटामिन डी की गोलियां या सप्लीमेंट केवल डॉक्टर की सलाह पर ही लेने चाहिए। आवश्यकता से अधिक या बिना चिकित्सकीय मार्गदर्शन के लंबे समय तक सप्लीमेंट का सेवन हानिकारक हो सकता है। चिकित्सक रोगी की जांच रिपोर्ट, उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और अन्य पोषण संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उचित खुराक और अवधि निर्धारित करते हैं।
हड्डियों को मजबूत बनाए रखने के लिए केवल विटामिन डी ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम, प्रोटीन, संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि का होना भी अत्यंत आवश्यक है। दूध, दही, अन्य डेयरी उत्पाद और हरी पत्तेदार सब्जियां कैल्शियम के अच्छे स्रोत हैं। नियमित पैदल चलना, योग और अपनी क्षमता के अनुसार वजन वहन करने वाले व्यायाम हड्डियों और मांसपेशियों को सक्रिय रखने में मदद करते हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने भी अपने दिशानिर्देशों में हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए कैल्शियम और विटामिन डी के महत्व को रेखांकित किया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हड्डियों की सेहत को बनाए रखने के लिए संतुलित आहार, सुरक्षित मात्रा में धूप का सेवन, नियमित व्यायाम और आवश्यकतानुसार चिकित्सकीय जांच को जीवनशैली का अभिन्न अंग बनाना चाहिए। भारतीय अध्ययनों से मिले आंकड़े स्पष्ट रूप से विटामिन डी की कमी की व्यापकता को दर्शाते हैं। हालांकि, इस समस्या का समाधान केवल विटामिन डी सप्लीमेंट तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए कैल्शियम, प्रोटीन और शारीरिक गतिविधियों का उचित संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
