भारत में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी: उम्र और लिंग के अनुसार बदलता जोखिम
भारत में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, जो उम्र, लिंग और जीवनशैली के आधार पर अलग-अलग समूहों को प्रभावित करती है।...

द क्लिफ न्यूज़ | 8 सितंबर 2026
भारत में सूक्ष्म पोषक तत्वों (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) की कमी एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। यह कमी न केवल बच्चों के विकास को प्रभावित करती है, बल्कि विभिन्न आयु वर्गों और लिंगों के व्यक्तियों में शारीरिक और तंत्रिका संबंधी जटिलताओं का कारण भी बनती है। आयरन, विटामिन D, कैल्शियम, विटामिन B12, फोलेट, जिंक, विटामिन A और आयोडीन जैसे आवश्यक पोषक तत्वों की कमी शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली, हड्डियों की मजबूती, रक्त निर्माण, मांसपेशियों के स्वास्थ्य, तंत्रिका तंत्र की कार्यक्षमता और प्रतिरक्षा प्रणाली को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। चिंताजनक बात यह है कि एक व्यक्ति में एक साथ कई पोषक तत्वों की कमी हो सकती है, जिसके लक्षण अक्सर शुरुआत में स्पष्ट नहीं होते।
राष्ट्रीय व्यापक पोषण सर्वेक्षण (Comprehensive National Nutrition Survey - CNNS) के आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को दर्शाते हैं। इन आंकड़ों के अनुसार, 10 से 14 वर्ष की आयु के लगभग 24 प्रतिशत किशोरों में आयरन, 26 प्रतिशत में विटामिन B12, 36 प्रतिशत में फोलेट, 19 प्रतिशत में विटामिन A, 35 प्रतिशत में विटामिन D और 27 प्रतिशत में जिंक की कमी पाई गई है। यह स्पष्ट करता है कि केवल पर्याप्त कैलोरी का सेवन ही स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त नहीं है, बल्कि भोजन में आवश्यक विटामिन और खनिजों की संतुलित मात्रा का होना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आयु के अनुसार पोषण संबंधी जोखिम में भिन्नता
जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है, उसके पोषण संबंधी जोखिमों में भी बदलाव आता है। पांच वर्ष से कम उम्र के शिशुओं में तीव्र शारीरिक वृद्धि और पूरक आहार की गुणवत्ता पर निर्भरता के कारण आयरन, विटामिन A, D, जिंक, B12 और फोलेट की कमी का खतरा अधिक होता है। पांच से नौ वर्ष के स्कूली बच्चों में, अक्सर खाने की आदतों में बदलाव और असंतुलित आहार के कारण आयरन, विटामिन D, B12, फोलेट, जिंक और विटामिन A जैसे पोषक तत्वों की कमी देखी जाती है।
किशोरावस्था, विशेषकर 10 से 19 वर्ष की आयु, शारीरिक विकास का एक महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें पोषण की आवश्यकताएं काफी बढ़ जाती हैं। इस दौरान, तेजी से हो रहे शारीरिक परिवर्तन के लिए पर्याप्त मात्रा में विभिन्न पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। किशोरियों में, मासिक धर्म के दौरान होने वाले रक्तस्राव के कारण आयरन की कमी का जोखिम काफी अधिक हो जाता है। वहीं, किशोर लड़कों में भी तीव्र शारीरिक विकास के कारण पर्याप्त पोषण का महत्व बढ़ जाता है।
युवा वयस्कों और मध्य आयु में चुनौतियाँ
युवा वयस्कों में विटामिन D, B12, आयरन, फोलेट और कैल्शियम की कमी का जोखिम बना रह सकता है। विशेष रूप से, शाकाहारी या वीगन आहार का पालन करने वाले लोगों में विटामिन B12 की कमी का खतरा अधिक होता है, क्योंकि यह मुख्य रूप से पशु-आधारित उत्पादों में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त, जो व्यक्ति अपना अधिकांश समय घर के अंदर बिताते हैं और धूप के संपर्क में कम आते हैं, उनमें विटामिन D की कमी की समस्या अधिक देखी जा सकती है।
मध्य आयु में, विटामिन D, B12, कैल्शियम और फोलेट की कमी अक्सर सामने आती है। महिलाओं में, विशेषकर प्रजनन आयु की महिलाओं में, मासिक धर्म के कारण आयरन की कमी का जोखिम लंबे समय तक बना रहता है। गर्भावस्था के दौरान, मां और भ्रूण दोनों के स्वास्थ्य के लिए फोलेट और विटामिन B12 का पर्याप्त स्तर बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। विटामिन D और कैल्शियम की दीर्घकालिक कमी से हड्डियों का स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याएं उत्पन्न होने का खतरा बढ़ जाता है।
वृद्धावस्था में बढ़ता जोखिम और लिंग-आधारित अंतर
60 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी का खतरा काफी बढ़ जाता है। विटामिन D, B12, कैल्शियम, फोलेट, आयरन और जिंक की कमी इस आयु वर्ग में आम है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें भोजन की मात्रा कम लेना, सीमित सूर्य के प्रकाश का संपर्क, और उम्र के साथ शरीर द्वारा पोषक तत्वों के अवशोषण में आने वाली कमी शामिल हैं।
पुरुषों और महिलाओं में पोषण संबंधी जोखिमों में भी भिन्नता पाई जाती है। महिलाओं में, किशोरावस्था से लेकर प्रजनन आयु तक मासिक धर्म के कारण आयरन की आवश्यकता और कमी का जोखिम पुरुषों की तुलना में अधिक रहता है। पुरुषों में, यदि बिना किसी स्पष्ट कारण के आयरन की कमी का पता चलता है, तो केवल आयरन सप्लीमेंट देने के बजाय रक्तस्राव या अन्य अंतर्निहित कारणों की गहन चिकित्सकीय जांच आवश्यक हो जाती है। हालांकि, अपर्याप्त आहार का सेवन करने वाले पुरुषों में भी विटामिन D, B12, फोलेट और जिंक की कमी हो सकती है।
विशिष्ट स्वास्थ्य स्थितियों में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का महत्व
हड्डी रोग (Orthopedics) और निवारक चिकित्सा (Preventive Practice) के क्षेत्र में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हड्डियों और मांसपेशियों से संबंधित समस्याओं के निदान और उपचार के लिए विटामिन D, कैल्शियम, फॉस्फेट, मैग्नीशियम, पैराथायराइड हार्मोन (PTH) और अल्कलाइन फॉस्फेटेस जैसे तत्वों की जांच आवश्यक हो सकती है। इसी प्रकार, थकान, एनीमिया (रक्ताल्पता) या न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका संबंधी) लक्षणों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए कंप्लीट ब्लड काउंट (CBC), फेरिटिन, ट्रांसफेरिन सैचुरेशन, विटामिन B12 और फोलेट का स्तर जांचना उपयोगी होता है।
बच्चों में, यदि उनका विकास धीमा हो, वे बार-बार संक्रमण से ग्रसित हों, या उनके घाव देरी से भर रहे हों, तो जिंक, आयरन और विटामिन A के स्तर का चिकित्सकीय मूल्यांकन महत्वपूर्ण है। बुजुर्गों में, जो गिरने, कमजोरी या ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, उनके लिए विटामिन D, कैल्शियम, फॉस्फेट, B12, फोलेट, PTH और गुर्दे के कार्य (Kidney Function) की जांच प्रासंगिक हो सकती है।
जांच और समाधान: संतुलित दृष्टिकोण
यह समझना महत्वपूर्ण है कि हर व्यक्ति के लिए हर माइक्रोन्यूट्रिएंट की नियमित जांच आवश्यक नहीं है। जांच का निर्णय व्यक्ति की उम्र, आहार, मौजूदा लक्षण, किसी बीमारी की उपस्थिति, ली जा रही दवाएं और अन्य चिकित्सकीय जोखिम कारकों पर आधारित होना चाहिए। बिना किसी चिकित्सकीय सलाह या जांच के लंबे समय तक पोषक तत्वों के सप्लीमेंट का सेवन करना उचित नहीं है, क्योंकि इससे अन्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी का समाधान केवल दवाइयों या सप्लीमेंट्स तक सीमित नहीं है। एक संतुलित और विविध आहार, जिसमें विभिन्न प्रकार के फल, सब्जियां, अनाज, दालें और डेयरी उत्पाद (या उनके विकल्प) शामिल हों, पोषक तत्वों की पूर्ति का सबसे प्राकृतिक और प्रभावी तरीका है। इसके अलावा, पर्याप्त मात्रा में धूप का सेवन (विशेषकर विटामिन D के लिए) और एक स्वस्थ जीवनशैली भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। समय रहते इन पोषक तत्वों की कमी की पहचान और उसके निवारण से एनीमिया, हड्डियों की कमजोरी, मांसपेशियों की समस्याएं और तंत्रिका संबंधी जटिलताओं जैसे गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। स्वस्थ शरीर के लिए न केवल भोजन की मात्रा, बल्कि उसकी पोषण गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
