बाल साहित्य की महत्ता पर बल: 'एक पेड़ की कथा' के विमोचन पर जुटे साहित्यकार
भोपाल में 'एक पेड़ की कथा' पुस्तक के विमोचन के अवसर पर बाल साहित्य के महत्व और बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में इसकी भूमिका पर चर्चा हुई। साहित्यकारों ने बाल साहित्य को मुख्यधारा में अधिक सम्मान देने की वकालत की।

द क्लिफ न्यूज़ | भोपाल | 26 अगस्त 2026
भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान, लेखक संजय मेहता की पुस्तक 'एक पेड़ की कथा' का विमोचन किया गया, जिसने बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण और प्रासंगिक साहित्य की आवश्यकता को पुनः रेखांकित किया। इस अवसर पर साहित्यकारों, विचारकों और शिक्षाविदों ने बच्चों के व्यक्तित्व विकास, संस्कार निर्माण और पर्यावरणीय चेतना जागृत करने में बाल साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। यह आयोजन बाल साहित्य को समाज की मुख्यधारा में अधिक सम्मान और पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, मानस प्रतिष्ठान के कार्यकारी अध्यक्ष एवं विचारक रघुनंदन शर्मा ने कहा कि आज के डिजिटल युग में बच्चों के लिए विपुल, गुणवत्तापूर्ण और समयानुकूल साहित्य का सृजन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बाल साहित्य केवल मनोरंजन का साधन न होकर, बच्चों के भीतर संवेदनशीलता, कल्पनाशीलता और संस्कार विकसित करने का एक सशक्त माध्यम है। श्री शर्मा ने 'एक पेड़ की कथा' की सराहना करते हुए कहा कि यह पुस्तक न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है, बल्कि किसान और उसकी व्यथा को भी प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है, जिससे बच्चों का प्रकृति और पर्यावरण से भावनात्मक जुड़ाव स्थापित होता है।
लेखक की लेखन यात्रा और भावी संकल्प
इस अवसर पर, पुस्तक के लेखक संजय मेहता ने अपनी लेखन यात्रा के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि 'एक पेड़ की कथा' उनकी छठी पुस्तक है और बाल साहित्य सृजन की यह यात्रा वे निरंतर जारी रखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए लिखना एक चुनौतीपूर्ण पर आनंददायक कार्य है, जिसमें बाल मनोविज्ञान को समझते हुए ऐसी भाषा और कथानक का चयन करना होता है जो उन्हें आकर्षित करे और जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों से भी परिचित कराए। श्री मेहता ने भविष्य में बाल पाठकों के लिए और अधिक साहित्य रचने का संकल्प व्यक्त किया।
बाल साहित्यकारों को अपेक्षित सम्मान की मांग
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. संजय द्विवेदी ने हिंदी में बाल साहित्य रचने वाले लेखकों को साहित्यिक जगत में मिलने वाले अपर्याप्त सम्मान और पहचान पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अन्य भारतीय भाषाओं में अक्सर बाल साहित्य से साहित्यिक लेखन की शुरुआत होती है, किंतु हिंदी में इस विधा के प्रति अभी भी व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। प्रो. द्विवेदी ने रेखांकित किया कि आज का बचपन स्वयं अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिसमें तकनीक का अत्यधिक प्रभाव, बदलती पारिवारिक संरचनाएं, सामाजिक दबाव और तीव्र जीवनशैली शामिल हैं। ऐसे में, बाल साहित्य बच्चों को संवेदनशीलता, कल्पना, संवाद और मानवीय मूल्यों से जोड़ने का कार्य कर सकता है।
कहानियों का रूपांतरण और रंगमंच की महत्ता
विशिष्ट अतिथि, साहित्यकार एवं शिक्षाविद् डॉ. संतोष चौबे ने साहित्यिक कहानियों के रूपांतरण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अच्छी कहानियों को नाटक और अन्य मंचीय माध्यमों में प्रस्तुत करने से उनकी पहुंच व्यापक होती है। डॉ. चौबे ने रंगमंच को सामाजिक सरोकारों को प्रभावी ढंग से संप्रेषित करने का एक सशक्त माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं को रंगमंच से जोड़कर उनमें अभिव्यक्ति, आत्मविश्वास और सामाजिक संवेदनशीलता जैसे गुणों का विकास किया जा सकता है।
पर्यावरण संरक्षण में बच्चों की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता एवं विशिष्ट अतिथि गुंजन चौकसे ने पर्यावरण संरक्षण को आज की एक गंभीर चिंता बताया। उन्होंने कहा कि जब बच्चे प्रकृति और पर्यावरण की चिंता से जुड़ते हैं, तो इसका प्रभाव न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित रहता है, बल्कि पूरे समाज और भविष्य की पीढ़ियों पर भी पड़ता है। सुश्री चौकसे ने जोर दिया कि बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने के लिए पुस्तकों और कहानियों का सहारा लेना अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने 'एक पेड़ की कथा' जैसी रचनाओं को बच्चों में प्रकृति के प्रति अपनापन और जिम्मेदारी का भाव विकसित करने में सहायक बताया।
'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' विशेषांक का विमोचन
कार्यक्रम के दौरान, अनुसंधान पत्रिका 'समागम' के विशेषांक 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' का भी विमोचन किया गया। इस अवसर पर साहित्य और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया। साथ ही, 'समागम गुरुकुल' का पोस्टर भी जारी किया गया। कार्यक्रम का संचालन 'समागम' के संपादक प्रो. मनोज कुमार ने किया। इस आयोजन में मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे सहित साहित्य, रंगमंच और पत्रकारिता जगत से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित रचनाकार, शिक्षाविद् और साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
समग्रतः, इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर गहरा जोर दिया कि बाल साहित्य को साहित्य की मुख्यधारा में अधिक सम्मान और स्थान मिलना चाहिए। बच्चों के लिए लिखी गई सार्थक कहानियां न केवल उनके मनोरंजन का माध्यम बन सकती हैं, बल्कि वे प्रकृति, पर्यावरण, संवेदना, संस्कृति और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति उनकी समझ को भी सुदृढ़ कर सकती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, बाल साहित्य का विस्तार केवल एक साहित्यिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक बेहतर और अधिक संवेदनशील समाज के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण और आवश्यक कदम है।
