आज़ादी की लड़ाई: गांधी के अहिंसक सत्याग्रह और क्रांतिकारियों के बलिदान का अवमूल्यन?
लेखक नितिन भारद्वाज ने स्वतंत्रता संग्राम के दो प्रमुख ध्रुवों - महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन और क्रांतिकारियों के बलिदान - पर हो रही आलोचनाओं को राष्ट्रहित के लिए घातक बताया है।

संवाददाता: नितिन भारद्वाज
द क्लिफ न्यूज़ | 13 अगस्त 2026
स्वतंत्रता संग्राम के दो प्रमुख स्तंभों, महात्मा गांधी के अहिंसक सत्याग्रह और क्रांतिकारियों के बलिदान, पर निरंतर हो रही आलोचनाओं और तर्कों को एक वरिष्ठ अधिवक्ता और स्वतंत्र विचारक ने राष्ट्रहित के लिए घातक बताया है। उनका मानना है कि ये आलोचनाएँ स्वतंत्रता सेनानियों के मंतव्य और राष्ट्र के प्रति उनके योगदान को समझने में विफलता का परिणाम हैं, जिससे नई पीढ़ी भ्रमित हो रही है।
लेखक नितिन भारद्वाज के अनुसार, स्वतंत्रता दिलाने की प्रक्रिया में विभिन्न व्यक्तियों और विचारधाराओं ने अपने-अपने तरीकों से योगदान दिया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रत्येक सुधारक या व्यक्ति की कार्यशैली विशिष्ट होती है, और सभी उससे संतुष्ट हों, यह आवश्यक नहीं है। जब तक व्यक्ति किसी के प्रयासों की सार्थकता को पूरी तरह समझे बिना उस पर अनुचित समीक्षा करता है, तब तक वह स्वयं कुछ करने में अक्षम रहते हुए दूसरों को भी हतोत्साहित करता है। यह प्रवृत्ति ठीक वैसी है जैसे डूबते बिच्छू को बचाने के प्रयास में संत को वह बार-बार काटता है, लेकिन संत अपना दयाभाव नहीं छोड़ता। इसी तरह, सुधारक भी आलोचनाओं को सहते हुए अपना कार्य करते रहते हैं।
योग्यता आधारित उपयोगिता का सिद्धांत
भारद्वाज ने इस बात पर प्रकाश डाला कि हम किसी वस्तु या व्यक्ति से क्या प्राप्त कर सकते हैं, यह हमारी अपनी योग्यता और सोच पर निर्भर करता है। उदाहरण के तौर पर, दूध से दही, पनीर, मावा या घी बनाना उपयोगकर्ता की सकारात्मक सोच और क्षमता का परिणाम है, जिससे उसका मूल्य बढ़ता है। वहीं, जो व्यक्ति केवल बुराइयाँ खोजता है, वह दूध से छाछ बनाकर उसके मूल्य को कम कर देता है। इसी सिद्धांत को स्वतंत्रता संग्राम के नायकों के कार्यों पर लागू करते हुए उन्होंने कहा कि आलोचक अक्सर उनके मंतव्य को समझे बिना ही कमियाँ निकालते हैं, जिससे राष्ट्रीयता की भावना कमजोर होती है।
स्वतंत्रता आंदोलन के दो प्रमुख मार्ग
लेखक ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान दो प्रमुख विचारधाराएँ सक्रिय थीं। एक ओर महात्मा गांधी का अहिंसक सत्याग्रह, जिसने अपार जनसमूह को इकट्ठा किया, लोगों की दबी-कुचली मानसिकता को बदला और आम से आम व्यक्ति को आज़ादी की लड़ाई से जोड़ा। दूसरी ओर, क्रांति का मार्ग अपनाने वाले वर्ग ने बलिदान की विरासत को पुनः सूत्रपात किया। भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, लाल-बाल-पाल जैसे नेताओं के बलिदान ने युवा वर्ग में जोश भरा और आंदोलन को एक मजबूत आधार प्रदान किया। भारद्वाज का मानना है कि नियति ने इन दोनों माध्यमों को सुनिश्चित किया था, ताकि समाज के सामने दो सुदृढ़ विकल्प रहें।
आलोचनाओं का राष्ट्र पर दुष्परिणाम
नितिन भारद्वाज ने खेद व्यक्त किया कि आज़ादी मिलने के इतने वर्षों बाद भी, इन राष्ट्रभक्तों को धन्यवाद देने के बजाय, उनके कार्य करने के तरीकों में कमियाँ निकाली जा रही हैं। उन्होंने कहा कि "गांधी घराना" और "क्रांतिकारी घराना" जैसे विभाजन नए सिरे से पैदा किए गए हैं, जिससे नई पीढ़ी भ्रमित हो रही है। कुछ लोग गांधीजी को क्रांतिकारियों के विरुद्ध खड़ा करते हैं, तो कुछ क्रांतिकारियों को गांधीजी के विरुद्ध, बिना उनके विचारों और परिस्थितियों को समझे। यह स्थिति देश को वैसे राष्ट्रभक्त पैदा करने से रोक रही है, जिनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था।
लेखक ने प्रश्न उठाया कि क्या कोई जानता था कि स्वतंत्रता कब मिलेगी या युवावस्था में ब्रिटिश साम्राज्य से बगावत करने वाले नेताओं को सत्ता सौंपी जाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रत्येक राष्ट्रवादी ने तात्कालिक परिस्थितियों में जो उचित समझा, वह किया और उनके प्रयास सार्थक रहे। आज के आलोचक, जो स्वयं कुछ करने में असमर्थ हैं, उन नायकों के बलिदानों का अवमूल्यन कर रहे हैं जिन्होंने राष्ट्र को स्वतंत्र कराने में अपनी भूमिका निभाई।
सद्भावना और राष्ट्रहित की अपेक्षा
भारद्वाज ने सुझाव दिया कि एक जिम्मेदार नागरिक के नाते, यदि हम किसी राष्ट्रहितकारी कार्य में सुधार आवश्यक समझते हैं, तो हमें उस सुधार संबंधी विचार को सीधे संबंधित व्यक्ति या समूह के समक्ष रखना चाहिए, न कि सार्वजनिक मंचों पर शेखी बघारनी चाहिए। इससे वैमनस्यता की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी और नासमझ विरोधी तैयार नहीं होंगे, जो राष्ट्र के लिए घातक है। यदि सुधारक टूट गया, तो उसका प्रयास रुक जाएगा और राष्ट्र को लाभ नहीं मिलेगा।
उन्होंने आशा व्यक्त की कि यदि लोग स्वतंत्रता सेनानियों के मर्म को समझ पाते, उनके संवादों, पत्रों और भाषणों का सही अर्थ समझते, तो प्रत्येक घर एक राष्ट्रप्रेमी तैयार होता। ऐसा राष्ट्रप्रेमी, जो गांधी जी के विचारों का धनुष और क्रांतिकारियों के बलिदानों से अभिमंत्रित तीर लेकर राष्ट्रधर्म का प्रण ले, देशद्रोहियों को लक्ष्य बनाता। तब शायद यह विवाद ही जन्म न लेता कि "आज़ादी किसने दिलाई?"
