अशोकनगर से आई लाचार प्रसूता को गुना के डॉक्टर ने बचाई जान
अशोकनगर से आई लाचार प्रसूता को गुना के जिला अस्पताल में डॉक्टर सतीश राजपूत ने नवजात शिशु सहित सुरक्षित बचाया। डॉक्टर ने ऑपरेशन कर न...

गुना | संवाददाता: राजा हतम वेग
द क्लिफ न्यूज़ | गुना | 9 सितंबर 2026
गुना जिला अस्पताल में एक अत्यंत संवेदनशील मामले में, एक प्रसूता को अशोकनगर के अस्पताल में कथित तौर पर इलाज से वंचित किए जाने के बाद, गुना पहुंचकर जीवनदान मिला। कोटा में मजदूरी करने वाली अनामिका जोगी, जो प्रसव पीड़ा से जूझ रही थी, को अशोकनगर जिला अस्पताल में भर्ती करने से मना कर दिया गया था। अनामिका के पति की इसी साल जनवरी में एक सड़क हादसे में मृत्यु हो गई थी, जिससे वह असहाय स्थिति में थी।
अपने पति को खोने के बाद अकेली पड़ी अनामिका, अपनी बहन के साथ अस्पताल से निराश लौट गई। भूखी-प्यासी भटकती रही और अंततः असहनीय पीड़ा के बीच ट्रेन से करीब 45 किलोमीटर दूर गुना पहुंची। यह घटना उन तमाम दावों पर सवालिया निशान लगाती है, जो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए किए जाते हैं। ऐसी स्थिति में, जब एक महिला को न केवल अपने पति के खोने का गम है, बल्कि उसे अपनी और अपने अजन्मे बच्चे की जान बचाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है, तो स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की विफलता और भी अधिक चिंताजनक हो जाती है।
अंधेरी रात में जीवनदायिनी बनी चिकित्सक की मानवता
रात करीब 2 बजे, जब अनामिका की स्थिति अत्यधिक गंभीर और हाई रिस्क वाली हो गई, तो स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. सतीश राजपूत को तत्काल बुलाया गया। प्रसूता की नाजुक स्थिति और उसकी पारिवारिक बेबसी को देखते हुए, डॉ. सतीश राजपूत ने न केवल अपनी पेशेवर जिम्मेदारी निभाई, बल्कि इंसानियत की एक अनूठी मिसाल भी पेश की। जब एक स्वास्थ्य प्रणाली अपनी सबसे कमजोर कड़ी को सहारा देने में विफल रहती है, तब व्यक्तिगत स्तर पर ऐसी मानवीय पहलें ही जीवन का आधार बनती हैं।
अस्पताल में मरीज के साथ कोई पुरुष संबंधी या रक्तदाता उपलब्ध न होने की स्थिति में, डॉ. राजपूत स्वयं आगे आए। उन्होंने न केवल रक्त की व्यवस्था सुनिश्चित की, बल्कि अपनी ओर से आर्थिक मदद भी प्रदान की। यह कदम न केवल उनके समर्पण को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि किस प्रकार एक जिम्मेदार चिकित्सक अपनी भूमिका से आगे बढ़कर भी समुदाय की सेवा कर सकता है। ऐसी परिस्थितियां अक्सर उन लोगों के सामने आती हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं और जिनके पास आपातकालीन स्थिति में सहायता के लिए कोई संपर्क या संसाधन नहीं होते।
इसके बाद, डॉ. राजपूत ने रात में ही ऑपरेशन कर डिलीवरी कराई। अनामिका ने एक स्वस्थ शिशु को जन्म दिया। वर्तमान में मां और नवजात शिशु दोनों पूरी तरह सुरक्षित हैं। डॉ. राजपूत के इस मानवीय दृष्टिकोण और तत्परता की चारों ओर सराहना हो रही है। उन्होंने एक असहाय महिला को समय पर उचित उपचार उपलब्ध कराकर, उसे और उसके नवजात शिशु को एक नई जिंदगी और उम्मीद दी है। इस घटना ने यह भी रेखांकित किया है कि कैसे व्यक्तिगत प्रयास समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं, खासकर जब वे उन लोगों की मदद करते हैं जिन्हें सबसे अधिक जरूरत होती है। यह घटना उन स्वास्थ्य कर्मियों के लिए भी प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी ड्यूटी निभाते हैं।
