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91 वर्ष की आयु में वयोवृद्ध रंग निर्देशक विजय मेहता का निधन

वयोवृद्ध रंग निर्देशक और समानांतर सिनेमा की दिग्गज विजय मेहता का मंगलवार रात 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

Jul 1
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91 वर्ष की आयु में वयोवृद्ध रंग निर्देशक विजय मेहता का निधन

शिखर सारांश

क्या हुआ: वयोवृद्ध रंग निर्देशक और समानांतर सिनेमा की प्रतिष्ठित हस्ती विजय मेहता का मंगलवार रात लंबी बीमारी के बाद 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

क्यों महत्वपूर्ण है: मेहता भारतीय रंगमंच का एक सशक्त स्तंभ थीं, जिन्हें छह दशकों के अपने करियर में नई रंग शैलियों की स्थापना करने और आधुनिक भारतीय नाटक को आकार देने का श्रेय दिया जाता है।

क्या बदलाव: उनके निधन से भारतीय प्रदर्शन कला में एक युग का अंत हो गया है, जिससे कलाकारों और दर्शकों दोनों के लिए एक खालीपन पैदा हो गया है।

कौन प्रभावित है: भारतीय रंगमंच जगत, समानांतर सिनेमा और व्यापक कला व सांस्कृतिक समुदाय एक दूरदर्शी कलाकार के खोने का शोक मना रहा है।

भारतीय रंगमंच के एक दिग्गज का प्रस्थान

मराठी रंगमंच और समानांतर सिनेमा की एक प्रमुख हस्ती विजय मेहता का मंगलवार रात मुंबई स्थित उनके आवास पर शांतिपूर्वक निधन हो गया। वह 91 वर्ष की थीं और लंबे समय से अस्वस्थ थीं। उनके निधन से भारतीय रंगमंच और कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

रंगमंच जगत में स्नेह से 'बाई' के नाम से पुकारी जाने वाली मेहता का करियर छह दशकों से अधिक समय तक फैला रहा। उन्होंने अभिनय, निर्देशन और भारतीय रंगमंच को पुनर्परिभाषित करने वाली नई शैलियों की शुरुआत के माध्यम से एक अमिट छाप छोड़ी।

एक आंदोलन की स्थापना: रंगायन

4 नवंबर, 1934 को गुजरात के बड़ौदा में जन्मीं विजय जयवंत बाद में विजय मेहता के नाम से जानी गईं। मुंबई विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद, उन्होंने इब्राहिम अल्काज़ी और आदि मारज़बान जैसी प्रतिष्ठित रंगमंच हस्तियों के मार्गदर्शन में अपने शिल्प को निखारा। 1960 के दशक में, विजय तेंदुलकर, डॉ. श्रीराम लागू और अरविंदDeshpande जैसे प्रमुख व्यक्तियों के साथ, मेहता ने मुंबई में प्रभावशाली थिएटर समूह 'रंगायन' की सह-स्थापना की। यह समूह आधुनिक भारतीय रंगमंच को एक नई दिशा देने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।

निर्देशकीय उत्कृष्ट कृतियाँ और वैश्विक पहुँच

मेहता ने कई ऐतिहासिक नाटकों का निर्देशन किया जो भारतीय रंगमंच के इतिहास में दर्ज हैं। सी.टी. खानोलकर के 'एक शून्य बाजिरो' का उनका मंचन एक मील का पत्थर माना जाता है। उन्होंने जर्मन नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त के कार्यों से मराठी दर्शकों को 'अजब न्याय वर्तुलाचा' (द कॉकेशियन चाक सर्कल) के माध्यम से परिचित कराया। उनके अन्य प्रशंसित निर्देशन कार्यों में 'बैरिस्टर', 'शकुंतला', 'हमीदाबाई ची कोठी' और 'मदर' शामिल हैं, जो सभी अपने अभिनव मंचन और कलात्मक दृष्टि के लिए प्रशंसित हुए। भारत और जर्मनी के बीच संयुक्त थिएटर परियोजनाओं के माध्यम से, मेहता ने सफलतापूर्वक भारतीय रंगमंच को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचाया।

समानांतर सिनेमा की विशिष्ट आवाज़

रंगमंच से परे, विजय मेहता ने समानांतर सिनेमा में अपने लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया। उन्होंने 'कलयुग' और 'पार्टी' जैसी फिल्मों में यादगार प्रदर्शन दिया, जिसमें 'पार्टी' में उनकी भूमिका विशेष रूप से प्रशंसित हुई। निर्देशक के रूप में, उन्होंने 'राव साहेब' (1986) और 'पेस्तोनजी' (1988) जैसी समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फिल्मों का निर्देशन किया, जिन्हें भारतीय समानांतर सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

प्रतिष्ठित सम्मान और विरासत

भारतीय कला और संस्कृति में उनके असाधारण योगदान को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1975 में, उन्हें निर्देशन के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। भारत सरकार ने उन्हें 1986 में पद्म श्री से सम्मानित किया। मेहता ने 'राव साहेब' के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और 'पार्टी' के लिए एशिया पैसिफिक फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार भी जीता। 2012 में संगीत नाटक अकादमी टैगोर रत्न और मेटा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड जैसे और भी सम्मान प्राप्त हुए।

विजय मेहता के निधन को भारतीय रंगमंच में एक स्वर्णिम अध्याय के समापन के रूप में देखा जा रहा है। कला को बढ़ावा देने में उनका समर्पण, रचनात्मकता और दूरदर्शिता भविष्य की पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। कला जगत से श्रद्धांजलि आ रही है, जो भारतीय रंगमंच के लिए उनके काम को एक अपूरणीय क्षति के रूप में स्वीकार कर रही है।

आगे क्या देखें

कला समुदाय संभवतः मेहता की निर्देशन तकनीकों और 'रंगायन' के प्रभाव को उजागर करने वाले रिट्रोस्पेक्टिव और चर्चाओं में शामिल होगा। आने वाले महीनों में उनके उल्लेखनीय फिल्मों और नाटकों के स्मारक कार्यक्रमों और पुन: प्रदर्शन की उम्मीद है।