भोपाल में फीस पारदर्शिता पर संकट — 8 महीने बीतने के बाद भी 800 निजी स्कूलों ने पोर्टल पर नहीं डाली जानकारी
भोपाल की 800 निजी स्कूलों पर ‘फीस पारदर्शिता’ का संकट गहराया, सरकार की कार्रवाई पर सवाल भोपाल | शिक्षा डेस्कमध्य प्रदेश में शिक्षा शुल्क नियमन...

भोपाल की 800 निजी स्कूलों पर ‘फीस पारदर्शिता’ का संकट गहराया, सरकार की कार्रवाई पर सवाल
भोपाल | शिक्षा डेस्क
मध्य प्रदेश में शिक्षा शुल्क नियमन को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राजधानी भोपाल के 1,717 निजी स्कूलों में से लगभग 800 संस्थानों ने 2025-26 शैक्षणिक सत्र शुरू होने के आठ महीने बाद भी अपनी फीस संरचना राज्य शासन के पोर्टल पर अपलोड नहीं की है। यह वही प्रक्रिया है जिसे स्कूलों को सत्र शुरू होने से तीन महीने पहले—यानी 1 जनवरी 2025 तक पूरा करना था।
डेडलाइन तीन बार बढ़ी, लेकिन स्कूलों का रवैया नहीं बदला
शासन ने बार-बार ढिलाई दिखाते हुए अंतिम तिथि को तीन बार आगे बढ़ाया और अंततः 8 अगस्त 2025 को अंतिम डेट तय की। इसके बावजूद बड़ी संख्या में स्कूलों ने अनुपालन नहीं किया।
राज्य सरकार ने नोटिस जारी किए हैं, परंतु किसी भी स्कूल को ना तो डीरिकॉग्नाइज़ किया गया है और ना ही जुर्माना लगाया गया, जबकि कानून इस पर स्पष्ट प्रावधान देता है।
कानून क्या कहता है? — जानिए ‘फीस नियमन अधिनियम 2017’ के मायने
मध्य प्रदेश निजी विद्यालय (फीस एवं अन्य विषयों का नियमन) अधिनियम 2017 के तहत—
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निजी स्कूलों को अपनी ऑडिटेड बैलेंस शीट जिला शुल्क नियमन समिति में जमा करनी होती है।
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यदि किसी स्कूल की आय व्यय से 15% से अधिक है, तो फीस बढ़ाने की अनुमति नहीं होती।
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वार्षिक फीस वृद्धि की सीमा अधिकतम 15% तय की गई है।
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सभी स्कूलों को कक्षा-वार फीस संरचना डीपीआई पोर्टल पर अनिवार्य रूप से अपलोड करनी होती है।
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नियमों के उल्लंघन पर विद्यालयों पर 2 लाख रुपये तक का जुर्माना, फीस वृद्धि निरस्त करने और मान्यता रद्द करने जैसी कार्रवाई की जा सकती है।
ये प्रावधान अभिभावकों को अनावश्यक आर्थिक बोझ से बचाने और स्कूलों को लाभ-प्रधान संस्थानों में बदलने से रोकने के लिए बनाए गए थे।
25,000 रुपये से कम वार्षिक फीस वाले स्कूलों को छूट
15 जुलाई 2025 को निदेशालय ने सभी जिलों को निर्देश दिया कि जिन स्कूलों की वार्षिक फीस 25,000 रुपये से कम है, वे इस अधिनियम से मुक्त रहेंगे। इसके बावजूद भोपाल में 833 स्कूल अभी भी पोर्टल पर डेटा अपलोड नहीं कर पाए हैं—जो कुल संख्या का लगभग आधा हिस्सा है।
प्रशासन का बयान—“नोटिस जारी किए हैं”
भोपाल जिला शिक्षा अधिकारी एन.के. अहिरवार ने बताया कि विभाग ने सभी गैर-अनुपालन करने वाले स्कूलों को नोटिस भेजे हैं।
उन्होंने कहा, “कितने स्कूलों ने अब तक जानकारी अपलोड की है, इसका सटीक आंकड़ा तुरंत नहीं बता सकता, पर प्रक्रिया जारी है।”
अभिभावकों का संगठन नाराज़—“सरकार अनावश्यक नरमी दिखा रही है”
एमपी पालक महासंघ के महासचिव प्रबोध पंड्या ने सरकार की निष्क्रियता पर सख्त रुख अपनाया।
उनके अनुसार,
“जब कानून में स्पष्ट कार्रवाई का प्रावधान है, तो सरकार इतनी नरमी क्यों बरत रही है? यदि नियम लागू नहीं किए जाएंगे, तो निजी स्कूल फीस मनमानी से कैसे रुकेंगे?”
मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
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शिक्षा में पारदर्शिता—फीस जानकारी अपलोड न होने से अभिभावक यह नहीं समझ पाते कि स्कूल किस आधार पर शुल्क बढ़ा रहा है।
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नियामक असंतुलन—सरकार द्वारा बार-बार डेडलाइन बढ़ाने से स्कूलों में जवाबदेही घटती दिख रही है।
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आर्थिक बोझ—फीस नियंत्रण के अभाव में निजी शिक्षा मध्यवर्गीय परिवारों के लिए लगातार महंगी होती जा रही है।
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शहरी शिक्षा प्रणाली का ढांचा—भोपाल जैसे बड़े शहर में इतनी बड़ी संख्या में स्कूल नियमों का पालन न करें, यह व्यापक नीति-कार्यक्षमता पर सवाल उठाता है।
आगे क्या?
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार अब भी सख्त कदम नहीं उठाती, तो अधिनियम की उपयोगिता कम होती जाएगी और निजी स्कूल मनमाने ढंग से फीस तय करते रहेंगे।
विभाग के भीतर भी यह चर्चा तेज है कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए डीरिकॉग्निशन और जुर्माने जैसी कार्रवाई अनिवार्य हो सकती है।
