भोपाल में नशे का नया चेहरा: महिलाएँ बच्चों को बना रहीं ‘म्यूल’, 8 से 14 साल के मासूमों से करवा रहीं गांजा तस्करी
भोपाल में नशे का बढ़ता जाल भोपाल क्राइम ब्रांच ने हाल ही में एक 14 वर्षीय बालक को 4 किलो से अधिक गांजे के साथ...

भोपाल में नशे का बढ़ता जाल
भोपाल क्राइम ब्रांच ने हाल ही में एक 14 वर्षीय बालक को 4 किलो से अधिक गांजे के साथ पकड़ा, जिससे यह खुलासा हुआ कि शहर में नशा कारोबारियों ने अब बच्चों को भी इस गंदे धंधे में झोंकना शुरू कर दिया है। जांच के दौरान बालक ने बताया कि उसकी माँ, भारती कुचबुंदिया, ने ही उसे इस अवैध कारोबार में उतारा था और नियमित रूप से उससे गांजे की डिलीवरी करवाती थी।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, भारती न केवल शहर में गांजे की बिक्री करवाती थी बल्कि अपने बेटे को साथ लेकर ओडिशा तक गांजे की खेप लेने जाती थी। फिलहाल वह फरार है और उसकी तलाश जारी है।
नशे के कारोबार में “मातृत्व का मुखौटा”
क्राइम ब्रांच अधिकारियों का कहना है कि यह कोई एकल मामला नहीं है। पिछले कुछ महीनों में कई ऐसे केस सामने आए हैं जिनमें महिलाएँ अपने बच्चों के साथ पकड़ी गई हैं। अधिकारी बताते हैं कि तस्कर अब मातृत्व को एक “सुरक्षा कवच” की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं — महिलाएँ अपने बच्चों या शिशुओं को साथ लेकर यात्रा करती हैं, ताकि वे सामान्य परिवार की तरह लगें और पुलिस की नज़र से बच सकें।
अतिरिक्त डीसीपी शैलेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि “कई मामलों में महिलाएँ दूधमुंहे बच्चों के साथ बसों या ट्रेनों से ओडिशा और अन्य राज्यों से गांजा लाती थीं। उन्हें देखकर संदेह करना मुश्किल होता था।”
बच्चों को बनाया जा रहा ‘म्यूल’
जांच में खुलासा हुआ है कि 8 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों को अक्सर छोटे बैग या स्कूल बैग में गांजा रखकर बस या ट्रेन से भेजा जाता है। पुलिस का कहना है कि इन बच्चों की शक्ल-सूरत और व्यवहार सामान्य यात्रियों जैसा होता है, जिससे वे चेकिंग के दौरान आसानी से बच निकलते हैं।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “तस्कर जानते हैं कि न तो किसी माँ को शंका के घेरे में लाया जाएगा, न ही बच्चों को। इसी वजह से वे बच्चों को ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।”
जेलों में माताएँ, अनाथालयों में बच्चे
पुलिस के अनुसार, जिन मामलों में महिलाएँ पकड़ी जाती हैं, वहाँ उनके साथ मौजूद शिशु जेल में ही रहते हैं, जबकि बड़े बच्चों को या तो रिश्तेदारों के हवाले किया जाता है या फिर बाल कल्याण समिति की निगरानी में रखा जाता है। बाल अधिकार कार्यकर्ता इस प्रवृत्ति को “खतरनाक सामाजिक संकट” बता रहे हैं।
भोपाल स्थित समाजसेवी संस्था नवचेतना फाउंडेशन की प्रमुख, रश्मि दीक्षित, का कहना है, “जब बच्चे खुद अवैध गतिविधियों के उपकरण बन जाते हैं, तो यह केवल कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा की भी असफलता है। इन बच्चों को काउंसलिंग और संरक्षण की तत्काल ज़रूरत है।”
बढ़ती चुनौती और पुलिस की रणनीति
पुलिस का मानना है कि ओडिशा और मध्य प्रदेश के बीच नशे की तस्करी की एक सुदृढ़ सप्लाई चेन बन चुकी है, जिसमें महिलाएँ महत्वपूर्ण कड़ी बन चुकी हैं। पुलिस अब रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंडों और सीमाई क्षेत्रों पर विशेष निगरानी रख रही है।
डीसीपी चौहान के अनुसार, “हम अब महिलाओं और बच्चों के साथ यात्रा करने वाले संदिग्ध यात्रियों की प्रोफाइलिंग कर रहे हैं। एनडीपीएस एक्ट के तहत कड़े प्रावधानों का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि ऐसे नेटवर्क को तोड़ा जा सके।”
सामाजिक असर: बच्चों का बचपन खतरे में
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रवृत्ति न केवल कानून-व्यवस्था के लिए खतरा है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के भविष्य को भी अंधकार में धकेल सकती है। गरीब और हाशिए पर रह रही महिलाएँ, जिन्हें नशा माफिया आसान पैसे का लालच देते हैं, अक्सर अपने ही बच्चों को जोखिम में डाल देती हैं।
बाल संरक्षण आयोग के एक अधिकारी ने कहा, “अगर समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो यह प्रवृत्ति समाज के लिए विस्फोटक रूप ले सकती है। कानून के साथ-साथ सामुदायिक जागरूकता भी उतनी ही ज़रूरी है।”
निष्कर्ष:
भोपाल का यह मामला सिर्फ एक अपराध कथा नहीं, बल्कि सामाजिक विफलता का आईना है। जब माताएँ अपने बच्चों को तस्करी में ढाल बना रही हों, तो यह संकेत है कि गरीबी, नशे की निर्भरता और अपराध के बीच की रेखा कितनी धुंधली हो चुकी है। पुलिस की सख्ती के साथ-साथ अब समाज को भी इन बच्चों के भविष्य की ज़िम्मेदारी लेनी होगी।
