भोपाल में ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर फ्रॉड का बड़ा मामला: बैंक मैनेजर दंपती से 67.5 लाख की ठगी, पुलिस अफसर बनकर दी आतंकवादी लिंक की झूठी कहानी
भोपाल में एक 67 वर्षीय सेवानिवृत्त राष्ट्रीयकृत बैंक मैनेजर और उनकी पत्नी ‘डिजिटल अरेस्ट’ नामक नए तरह के साइबर अपराध का शिकार बन गए। खुद...

भोपाल में एक 67 वर्षीय सेवानिवृत्त राष्ट्रीयकृत बैंक मैनेजर और उनकी पत्नी ‘डिजिटल अरेस्ट’ नामक नए तरह के साइबर अपराध का शिकार बन गए। खुद को भोपाल पुलिस अधिकारी बताने वाले ठगों ने दंपती को आतंकियों से जोड़ने का झूठा आरोप लगाकर उन्हें 24 घंटे तक मानसिक रूप से बंधक बनाए रखा और उनकी आजीवन जमा पूंजी—करीब 67.5 लाख रुपये—एक फर्जी खाते में ट्रांसफर करा लिए। बेटे की सतर्कता से 5 लाख रुपये की राशि को समय रहते फ्रीज कराया जा सका।
कैसे शुरू हुआ ‘डिजिटल अरेस्ट’ का जाल
शाहपुरा के बावड़िया कलां क्षेत्र में रहने वाली 64 वर्षीय महिला की शिकायत के अनुसार, 17 नवंबर को ठगी की शुरुआत हुई। सुबह एक व्यक्ति ने उनके पति के मोबाइल पर कॉल किया और खुद को “पुलिस अधिकारी रंजीत कुमार” बताया।
कॉलर ने दावा किया कि दिल्ली में हुई हालिया विस्फोट जांच में उनके पति के बैंक खाते का लिंक आतंकवादियों के खातों से मिला है। उसने यह भी कहा कि 7 करोड़ रुपये आतंकी फंडिंग में इस्तेमाल किए गए, जिनमें से 70 लाख रुपये कथित रूप से उनके खाते में ट्रांसफर हुए हैं।
कॉलर ने एक फर्जी केस नंबर भी भेजा, जिससे दंपती को विश्वास हो गया कि मामला गंभीर है। भयभीत महिला ने पति के खिलाफ कार्रवाई का डर दिखाए जाने पर उनकी पूरी फिक्स्ड डिपॉजिट—68.26 लाख रुपये—तोड़कर निर्दिष्ट खाते में भेज दी।
24 घंटे का ‘डिजिटल कैदखाना’
ठग दंपती को लगातार फोन पर “निगरानी” में रखते रहे।
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हर 5 मिनट में कॉल,
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पूछते—“कोई संदिग्ध घर तो नहीं आया?”,
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“आप सुरक्षित हैं ना?”,
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“जब तक केस क्लियर न हो, घर से बाहर मत जाइए।”
इस तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि वे वास्तव में पुलिस जांच के तहत हैं।
17 से 19 नवंबर के बीच दंपती ने डर के माहौल में कुल 67.5 लाख रुपये ठगों के खाते में भेज दिए।
बेटे ने बचाई कुछ रकम, बैंक पर भी उठाए सवाल
जब बेटे को घटना का पता चला तो उसने तुरंत स्टेट साइबर क्राइम हेडक्वार्टर से संपर्क किया।
टीम ने त्वरित कार्रवाई कर ठगों के बैंक खाते से 5 लाख रुपये फ्रीज करा लिए।
बेटे ने बैंक की सतर्कता पर भी सवाल उठाए:
“पूरी FD टूट गई, इतने बड़े ट्रांजेक्शन हुए, लेकिन बैंक की ओर से कोई अलर्ट नहीं आया। अगर बैंक समय पर रुकावट डालती, तो इतना बड़ा नुकसान नहीं होता।”
साइबर क्राइम ब्रांच ने दर्ज किया केस
महिला की शिकायत पर FIR दर्ज की गई और मामला साइबर क्राइम ब्रांच, भोपाल को स्थानांतरित कर दिया गया है। पुलिस अब
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कॉल डिटेल्स,
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बैंक खातों,
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और ट्रांजेक्शन चैन
की जांच कर रही है। अधिकारियों के अनुसार, यह मामला साइबर अपराधियों द्वारा नई तकनीकों के प्रयोग का ताज़ा उदाहरण है, जिसमें अपराधी पीड़ितों को मानसिक रूप से दबाव में लाकर डिजिटल माध्यम से “कैद” कर लेते हैं।
यह क्यों चिंता का विषय है?
विशेषज्ञों के अनुसार "डिजिटल अरेस्ट" भारत में तेजी से उभर रही साइबर ठगी की सबसे खतरनाक विधि है क्योंकि:
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यह डर और भ्रम पर आधारित है,
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पीड़ित को निरंतर मानसिक दबाव में रखा जाता है,
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और असली पुलिस से संपर्क करने का कोई मौका नहीं दिया जाता।
दिल्ली, मुंबई, भोपाल और बेंगलुरु में पिछले महीनों में ऐसे कई केस सामने आए हैं, जिनमें पीड़ितों से करोड़ों रुपये की ठगी की गई।
कैसे बचें ‘डिजिटल अरेस्ट’ फ्रॉड से? (विशेषज्ञ सलाह)
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पुलिस, CBI या कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल, व्हाट्सऐप या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जांच नहीं करती।
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किसी भी अनजान कॉल पर बैंक डिटेल, OTP, या ट्रांजेक्शन न करें।
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बड़े वित्तीय ट्रांजेक्शन से पहले परिवार और बैंक मैनेजर से बात करें।
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डर पैदा करने वाली कॉल तुरंत 100 या 1930 पर रिपोर्ट करें।
