ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा का संकट: बांड भरने वाले सिर्फ 30% डॉक्टर ही जॉइन करते हैं सरकारी नौकरी
राज्य में ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए शुरुआत में बांड भरने वाले डॉक्टरों में से केवल लगभग 30 प्रतिशत ही वास्तविक रूप...

राज्य में ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए शुरुआत में बांड भरने वाले डॉक्टरों में से केवल लगभग 30 प्रतिशत ही वास्तविक रूप से सरकारी नौकरी जॉइन कर रहे हैं। वेतन संरचना ठीक होने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग को बांड डॉक्टरों की बेहद कमजोर प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ रहा है।
ग्रामीण सेवा के लिए बांड सिस्टम क्यों कमजोर पड़ रहा है?
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार सितंबर से लगातार नोटिस भेजे जाने के बावजूद बड़ी संख्या में डॉक्टर जॉइन करने नहीं आ रहे। विभाग ने हाल ही में 1200 पदों—अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट बांड डॉक्टरों सहित—के लिए विज्ञापन जारी किया था, लेकिन प्रतिक्रिया औसत से भी कम रही।
अधिकारियों का कहना है कि डेटा संकलन अभी जारी है, परंतु प्रारंभिक रिपोर्ट बताती है कि “ग्रामीण पोस्टिंग को लेकर डॉक्टरों की रुचि बेहद कम है।”
जमीनी हालात: कम संसाधन, देरी से वेतन और सीमित निगरानी
जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन (JUDA) ने स्पष्ट किया है कि ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में काम करने वाले डॉक्टरों को अक्सर
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पुराने या सीमित चिकित्सा संसाधनों,
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सीनियर पर्यवेक्षण की कमी,
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चार–चार महीने तक वेतन न मिलने,
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और सरकारी मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टरों की तुलना में कम मानदेय
जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
JUDA प्रतिनिधियों के अनुसार, प्रणाली प्रोत्साहन आधारित होने की बजाय “दबाव आधारित” है, जहां ग्रामीण भत्ता, अतिरिक्त वेटेज या पीजी प्रवेश में प्राथमिकता जैसे ठोस लाभ नहीं दिए जाते। इससे डॉक्टरों में असंतोष बढ़ता है और वे या तो जुर्माना भरकर बांड छोड़ देते हैं या निजी क्षेत्र में नौकरी चुन लेते हैं।
अधिकारियों का पक्ष: डॉक्टर PG को प्राथमिकता दे रहे, इसलिए जॉइन नहीं करते
संयुक्त निदेशक डॉ. राजू निदरिया का कहना है कि कई बांड डॉक्टर ग्रामीण सेवा करने की बजाय सीधे पीजी की तैयारी में लग जाते हैं।
उन्होंने बताया, “डॉक्टर सरकारी नौकरी जॉइन करने की बजाय 10 लाख रुपये का पेनल्टी देना पसंद कर रहे हैं। यही कारण है कि लगातार नोटिस देने के बावजूद जॉइनिंग नहीं हो रही।”
“सरकारी वेतन अधिक, पर फिर भी निजी क्षेत्र को प्राथमिकता”
उप निदेशक (स्वास्थ्य) डॉ. योगेश नीखरा ने कहा कि राज्य सरकार मेडिकल अधिकारियों को 60,000 रुपये प्रतिमाह तक वेतन देती है, जबकि निजी अस्पतालों में यही डॉक्टर 40,000 रुपये तक पर काम करते हैं।
उन्होंने कहा, “सुविधाओं की कमी की शिकायतें अक्सर जॉइनिंग के बाद दूर की जाती हैं। कई जगह पर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर होने के बावजूद बांड डॉक्टर जॉइन नहीं कर रहे।”
JUDA का आरोप: ‘चार महीने तक वेतन नहीं, तो युवा डॉक्टर क्यों टिकेंगे?’
राज्य JUDA अध्यक्ष डॉ. कुलदीप गुप्ता ने मुद्दों को और स्पष्ट करते हुए कहा:
“अपर्याप्त सुविधाएं, वेतन में देरी और संस्थागत सहयोग की कमी सबसे बड़ी समस्या है। डॉक्टरों को ग्रामीण पोस्टिंग में चार–चार महीने वेतन नहीं मिलता। ऐसे में निजी क्षेत्र में समय पर मिलने वाले 40,000 रुपये उन्हें ज्यादा भरोसेमंद लगते हैं।”
उनके अनुसार सिस्टम डॉक्टरों को सम्मानजनक वातावरण देने के बजाय मजबूरी में सेवा करने को बाध्य करता है, जिससे निराशा और असंतोष बढ़ता है।
क्या है समाधान? विशेषज्ञ क्या कहते हैं
स्वास्थ्य प्रबंधन विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को आकर्षक बनाने के लिए सरकार को—
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तत्काल वेतन भुगतान की गारंटी,
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ग्रामीण भत्ता,
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अतिरिक्त प्रोत्साहन,
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सुरक्षित कार्य वातावरण,
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और पीजी प्रवेश में प्राथमिकता जैसी नीतियां लागू करनी होंगी।
तभी बांड प्रणाली प्रभावी हो पाएगी और ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की स्थायी उपलब्धता सुनिश्चित होगी।
