स्मरण आर्ट एग्ज़िबिशन 25’: देशभर के 23 कलाकारों की कृतियों से सजा ध्रुपद संस्थान
राजधानी भोपाल के ध्रुपद संस्थान में रविवार से शुरू हुई स्मरण आर्ट एग्ज़िबिशन 25’ ने भारतीय ध्रुपद परंपरा को समकालीन कला के माध्यम से नई...

राजधानी भोपाल के ध्रुपद संस्थान में रविवार से शुरू हुई स्मरण आर्ट एग्ज़िबिशन 25’ ने भारतीय ध्रुपद परंपरा को समकालीन कला के माध्यम से नई संवेदनाओं से जोड़ा। तीन दिवसीय प्रदर्शनी में देशभर के 23 चुनिंदा कलाकारों ने अपनी कृतियाँ प्रस्तुत कीं, जिनमें से 11 भोपाल से थे। यह आयोजन द्रुपद के अग्रणी उस्तादों और गुरुओं की स्मृति को समर्पित है।
ध्रुपद गुरुओं को समर्पित कला उत्सव
रमाकांत आर्ट गैलरी और मैत्री आर्ट गैलरी द्वारा आयोजित यह प्रदर्शनी पंडित रमाकांत गुंदेचा, उस्ताद जिया मोहिउद्दीन दागर, उस्ताद जिया फरीदुद्दीन दागर और प्रोफेसर चाँदमल गुंदेचा जैसे द्रुपद परंपरा के स्तंभों के योगदान का सम्मान है। आयोजकों का कहना है कि इस मंच का उद्देश्य कला और शास्त्रीय संगीत के बीच एक रचनात्मक संवाद स्थापित करना है।
प्रदर्शनी में विविध विषयों की झलक
प्रदर्शनी में प्रदर्शित कृतियों में प्रकृति, भारतीय रागों की संरचना, स्त्री सशक्तिकरण और आध्यात्मिकता जैसे विषय प्रमुख रहे।
कला प्रस्तुत करने वाले प्रमुख कलाकारों में पंकज अग्रवाल, पद्मश्री भूरी बाई, रेखा भटनागर, एल.एन. भावसार, एस.डी. शुक्ला, शोभा घेरे, अखिलेश, यूसुफ, हिमांशु जोशी, राजेश शर्मा, अजय शुक्ला, पद्मश्री भालू मोंधे, देवीलाल पटीदार, वीणा जैन, बंधना कुमारी, स्मिता भांडारी और नितेश पंचाल शामिल रहे।
भोपाल के कला समुदाय ने इसे शहर की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने वाला आयोजन बताया।
जापानी कलाकारों का ध्रुपद वादन: कला का वैश्विक सेतु
सुबह के सत्र में जापान से आईं बहनें मोमोको मियूरा और अकीको निजो ने ध्रुपद युगल प्रस्तुत कर अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान–प्रदान को नया आयाम दिया। दोनों कलाकारों ने राग मलकोंस में आलाप–जोड़–झाला और चौताल में बंदिश पेश की।
संगीत विशेषज्ञों का कहना है कि द्रुपद जैसे प्राचीन भारतीय स्वर–शैली का जापानी कलाकारों द्वारा अभ्यास वैश्विक मंच पर इसकी बढ़ती प्रतिष्ठा का संकेत है।
पखावज और सरंगी की प्रस्तुतियों ने बढ़ाया रसिकों का उत्साह
मुंबई के प्रसिद्ध कलाकार पंडित मृणाल मोहन उपाध्याय (दर्भंगा घराना) ने पखावज पर चौताल में प्रस्तुति दी और पारंपरिक परने, रेले व दहेज परन सुनाकर श्रोताओं से सराहना पाई।
इसके बाद कोलकाता से आए सरवर हुसैन और अमन हुसैन (उस्ताद अब्दुल लतीफ खान के वंशज) ने सरंगी पर राग शुद्ध सारंग और राग चंद्रप्रभा प्रस्तुत किए।
शाम के सत्र में तरुण तलवार और धनी गुंदेचा की ध्रुपद प्रस्तुति ने वातावरण को पूरी तरह शास्त्रीय रंग में रंग दिया।
कला और ध्रुपद का सम्मिलन क्यों महत्वपूर्ण
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे आयोजन न केवल ध्रुपद जैसी प्राचीन परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाते हैं, बल्कि दृश्य कला और शास्त्रीय संगीत को एक साझा मंच पर लाकर भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की बहुस्तरीयता को भी उभारते हैं।
साथ ही, अंतरराष्ट्रीय कलाकारों की भागीदारी भारत की सांस्कृतिक कूटनीति और सौम्य शक्ति (Soft Power) को मजबूत करती है।
