₹22 हजार करोड़ के कर्ज पर ₹6.25 करोड़ के रीपेमेंट प्लान पर NCLT की रोक
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने एस्सेल और जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा से जुड़े ₹22,000 करोड़ के कर्ज पर ₹6.25 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को मिली मंजूरी पर रोक लगा दी है।

द क्लिफ न्यूज़ | नई दिल्ली | 2 सितंबर 2026
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की एक पांच सदस्यीय पीठ ने एस्सेल और जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा से संबंधित लगभग ₹22,000 करोड़ के कर्ज दावों के मामले में ₹6.25 करोड़ के पुनर्भुगतान योजना को मिली मंजूरी पर तत्काल रोक लगा दी है। इस निर्णय के परिणामस्वरूप, सुभाष चंद्रा की संपत्तियों से संबंधित किसी भी प्रकार के लेन-देन पर भी फिलहाल स्थगन लगा दिया गया है।
इस मामले में कई वित्तीय संस्थानों और ऋणदाताओं ने पूर्व में दिए गए आदेश पर अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए एक बड़ी पीठ के समक्ष इसे चुनौती दी थी। उनका प्रमुख तर्क यह है कि हजारों करोड़ रुपये के दावों के मुकाबले केवल ₹6.25 करोड़ के भुगतान की योजना को मंजूरी देना गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
25 अगस्त के आदेश पर लगी रोक
NCLT की पांच सदस्यीय पीठ ने 25 अगस्त को दिए गए उस आदेश पर रोक का निर्णय लिया है, जिसके तहत ₹22,000 करोड़ से अधिक के कुल दावों के मुकाबले ₹6.25 करोड़ के पुनर्भुगतान की योजना को मंजूरी प्रदान की गई थी। इस निर्णय के विरुद्ध एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, कैनरा बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया सहित कई वित्तीय संस्थानों और अन्य ऋणदाताओं ने अपील दायर की है।
ऋणदाताओं की ओर से इस मामले में प्रस्तुत दावों की तुलना में प्रस्तावित भुगतान की अत्यंत कम राशि को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। अब बड़ी पीठ इन आपत्तियों तथा पूर्व में दिए गए आदेश से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श करेगी।
सुभाष चंद्रा की संपत्तियों पर भी रोक
मामले की सुनवाई के दौरान, ट्रिब्यूनल ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा है। इसके साथ ही, एक अंतरिम व्यवस्था के तहत सुभाष चंद्रा को अपनी निजी या व्यावसायिक संपत्तियों को बेचने या उनका हस्तांतरण करने से प्रतिबंधित कर दिया गया है।
इस रोक का मुख्य उद्देश्य मामले की सुनवाई पूरी होने तक संबंधित संपत्तियों की यथास्थिति को सुरक्षित रखना है, ताकि विवाद के दौरान ऐसी कोई भी कार्रवाई न हो सके जिससे ऋणदाताओं के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
बैंकों और वित्तीय संस्थानों की आपत्तियां महत्वपूर्ण
इस पूरे मामले में बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा उठाई गई आपत्तियों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए दावे प्रस्तावित भुगतान राशि से कई गुना अधिक हैं। ऋणदाताओं का पक्ष यह है कि इतनी बड़ी देनदारी के मुकाबले अत्यंत अल्प राशि के भुगतान की योजना को स्वीकार किए जाने से उनके वित्तीय हित बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।
अब पांच सदस्यीय पीठ संबंधित पक्षों से प्राप्त होने वाले जवाबों और वित्तीय संस्थानों की दलीलों पर विस्तार से विचार करेगी। जब तक अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक पूर्व में दी गई मंजूरी पर लगी रोक प्रभावी बनी रहेगी।
आगे की सुनवाई पर टिकी निगाहें
NCLT के इस नवीनतम आदेश से एस्सेल ग्रुप से जुड़े पुराने ऋण विवाद में एक नया कानूनी मोड़ आ गया है। अब यह मामला केवल प्रस्तावित ₹6.25 करोड़ के भुगतान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ट्रिब्यूनल यह भी जांच करेगा कि इतने बड़े दावों के मुकाबले प्रस्तावित समाधान को किस आधार पर मंजूरी दी गई थी।
मामले की अगली सुनवाई में संबंधित पक्षों से प्राप्त होने वाले जवाबों और वित्तीय संस्थानों की आपत्तियों पर आगे विचार-विमर्श किया जाएगा। तब तक सुभाष चंद्रा की संपत्तियों के संबंध में लगाई गई पाबंदी जारी रहेगी।
