पीएम मोदी ने 1975 के आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ पर निंदा की, इसे 'सबसे काला अध्याय' बताया
पीएम मोदी ने 1975 के आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ पर इसे 'सबसे काला अध्याय' बताया, लोकतंत्र पर हमले की निंदा की। यह दिन संविधान हत्या...

- क्या हुआ: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य भाजपा नेताओं ने 1975 के आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ मनाई, इसे लोकतंत्र पर सीधा हमला बताया।
- यह क्यों महत्वपूर्ण है: आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के लिए "सबसे काला अध्याय" के रूप में याद किया जाता है, जो संवैधानिक मूल्यों और नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा के महत्व पर जोर देता है।
- क्या बदला: 25 जून को "संविधान हत्या दिवस" के रूप में वार्षिक पालन का उद्देश्य युवाओं को ऐतिहासिक घटनाओं और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के बारे में शिक्षित करना है।
- कौन प्रभावित हैं: सभी नागरिक, विशेषकर युवा, इस अवधि से सीखने के लिए प्रोत्साहित किए जाते हैं। सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक बहस हर साल फिर से तेज होती है।
पीएम मोदी का कड़ा विरोध
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को 1975 के आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ मनाते हुए उसकी कड़ी निंदा की। एक सोशल मीडिया पोस्ट में, उन्होंने इस अवधि को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का "सबसे काला अध्याय" करार दिया। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि आपातकाल सिर्फ एक राजनीतिक निर्णय से कहीं बढ़कर था। उन्होंने इसे देश के संविधान और लोकतांत्रिक ढांचे पर सीधा हमला बताया, जिसने नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
अंधेरे दौर को याद करते हुए
मोदी ने याद किया कि कैसे उन 21 महीनों के दौरान न्यायपालिका की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता और आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों को दबा दिया गया था। उन्होंने देश के लिए इस ऐतिहासिक घटना से सीखने और सतर्क रहने की महत्वपूर्ण आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह सतर्कता भविष्य में किसी भी संकट को लोकतांत्रिक संस्थाओं को खतरे में डालने से रोकने के लिए आवश्यक है। प्रधानमंत्री ने उन सभी व्यक्तियों को भी श्रद्धांजलि अर्पित की जिन्होंने आपातकाल के खिलाफ बहादुरी से आवाज़ उठाई और लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
"उनका योगदान भारतीय लोकतंत्र की ताकत का आधार बनता है, और आने वाली पीढ़ियों को उनके बलिदान से प्रेरणा लेनी चाहिए," पीएम मोदी ने कहा।
भाजपा नेताओं ने भी व्यक्त किए विचार
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस बात को दोहराया, उन्होंने आपातकाल को लोकतंत्र पर एक "काला धब्बा" बताया। उन्होंने इस अवधि को संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने के प्रयासों का समय बताया। सिंह ने जोर दिया कि भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में ऐसी घटनाओं को हमेशा एक चेतावनी के रूप में याद रखा जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आपातकाल की अवधि को "लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर हमला" करार दिया। आदित्यनाथ ने उल्लेख किया कि कई राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया था, और जनता की आवाज़ों को दबा दिया गया था। विभिन्न स्थानों पर अन्य भाजपा नेताओं ने भी आपातकाल के खिलाफ अपने विचार व्यक्त किए और लोकतंत्र की रक्षा करने वालों को सम्मानित किया।
"संविधान हत्या दिवस" और राजनीतिक विमर्श
केंद्र ने जुलाई 2024 में 25 जून को "संविधान हत्या दिवस" घोषित किया था। तब से, आपातकाल की वर्षगांठ पर सालाना देशभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों का उद्देश्य युवाओं को आपातकाल के ऐतिहासिक संदर्भ के बारे में शिक्षित करना और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे वार्षिक बयानों का महत्वपूर्ण राजनीतिक महत्व होता है। वे न केवल इतिहास को याद दिलाने का काम करते हैं बल्कि वर्तमान राजनीतिक विमर्श को भी प्रभावित करते हैं। हालांकि, विपक्षी दल इन बयानों को अक्सर अलग तरह से देखते हैं, उन्हें चल रहे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा मानते हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ और अनवरत बहस
आपातकाल 25 जून, 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा लगाया गया था, जो लगभग 21 महीनों तक चला। इस विवादास्पद अवधि के दौरान कठोर उपाय लागू किए गए थे। इनमें प्रेस सेंसरशिप, बड़े पैमाने पर राजनीतिक गिरफ्तारियाँ और नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर प्रतिबंध शामिल थे। इन कार्रवाइयों को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण और विभाजनकारी अध्याय के रूप में व्यापक रूप से देखा जाता है। 51 साल बाद भी, आपातकाल राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का एक स्थिर विषय बना हुआ है। इसकी वर्षगांठ सालाना सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के बीच वैचारिक बहसों को तेज करती है।
आगे क्या देखना है
आपातकाल की वर्षगांठ का वार्षिक पालन राजनीतिक विमर्श का एक केंद्र बिंदु बना रहने की संभावना है। भविष्य के स्मरणोत्सव सार्वजनिक स्मृति को आकार देना जारी रखेंगे और भारत में लोकतांत्रिक सिद्धांतों और नागरिक स्वतंत्रताओं पर चल रही बहसों को प्रभावित करेंगे।
