छिंदवाड़ा में खांसी की सिरप से 11 बच्चों की मौत: डॉक्टर और दवा निर्माता पर मामला दर्ज, जांच के लिए तमिलनाडु जाएगी पुलिस टीम
मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में खांसी की सिरप के सेवन से कम से कम 11 बच्चों की मौत के मामले ने सनसनी फैला दी है।...

मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में खांसी की सिरप के सेवन से कम से कम 11 बच्चों की मौत के मामले ने सनसनी फैला दी है। इस प्रकरण में जिस डॉक्टर ने कथित रूप से बच्चों को यह दवा लिखी थी, उसे पुलिस ने पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि डॉक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।
मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी ने पुष्टि की कि मृतकों की संख्या बढ़कर 11 हो गई है। इनमें एक दो वर्षीय बच्ची की नागपुर में और एक अन्य बच्चे की मौत पड़ोसी पांढुर्णा जिले में हुई है। एफआईआर में यह भी उल्लेख किया गया है कि छह बच्चे वर्तमान में नागपुर में उपचाराधीन हैं।
एफआईआर के अनुसार, मृत अधिकांश बच्चे और उपचाराधीन बच्चे डॉक्टर सोनी द्वारा लिखी गई दवाओं का सेवन कर रहे थे। छिंदवाड़ा एसपी अजय पांडे ने द हिंदू को बताया कि सरकारी शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीन सोनी, जो निजी प्रैक्टिस भी करते हैं, को शनिवार (4 अक्टूबर 2025) देर रात हिरासत में लिया गया। उन पर प्रतिबंधित कोल्ड्रिफ (Coldrif) सिरप लिखने का आरोप है, जिससे एक माह में कई बच्चों की मौत हुई।
पुलिस ने बताया कि डॉ. सोनी और सिरप निर्माता कंपनी Sresan Pharmaceuticals (कांचीपुरम, तमिलनाडु) के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105 और 276 तथा Drugs and Cosmetics Act की धारा 27 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
एसपी पांडे ने कहा, “हम डॉक्टर से विस्तृत पूछताछ करेंगे और उसके बाद तमिलनाडु पुलिस से भी जांच में सहयोग मांगा जाएगा।” उन्होंने बताया कि डीएसपी स्तर के अधिकारी के नेतृत्व में एक टीम जल्द ही तमिलनाडु भेजी जाएगी।
इस बीच, मुख्यमंत्री मोहन यादव के निर्देश पर डॉ. सोनी को निलंबित कर दिया गया है। सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा आयुक्त तरुण राठी द्वारा जारी आदेश में कहा गया कि डॉ. प्रवीन सोनी को बच्चों के इलाज में लापरवाही बरतने के कारण निलंबित कर जबलपुर क्षेत्रीय कार्यालय से संबद्ध किया गया है।
आदेश में यह भी कहा गया कि डॉ. सोनी ने अपने निजी क्लिनिक पर बच्चों को कोल्ड्रिफ सिरप दी थी, जिससे उन्हें तेज बुखार, गुर्दे की समस्या और पेशाब में कठिनाई होने लगी। आदेश में लिखा गया है — “यदि डॉक्टर ने बच्चों की बीमारी का सही निदान कर उचित इलाज किया होता, तो संभव है कि उनकी जान बचाई जा सकती थी।”
