सुप्रीम कोर्ट ने 10 साल की सजा रद्द की, सहमति और गलतफहमी को माना निर्णायक
सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार से जुड़े एक संवेदनशील मामले में असाधारण संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक व्यक्ति की दोषसिद्धि और 10 साल की...

सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार से जुड़े एक संवेदनशील मामले में असाधारण संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक व्यक्ति की दोषसिद्धि और 10 साल की सजा को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि मामला जबरन यौन अपराध का नहीं, बल्कि सहमति से बने रिश्ते का था, जिसे बाद में परिस्थितियों और आपसी असुरक्षा के चलते आपराधिक रूप दे दिया गया। यह फैसला न केवल संबंधित पक्षों के जीवन को प्रभावित करता है, बल्कि सहमति, विवाह-प्रलोभन और आपराधिक कानून की व्याख्या पर एक नई बहस भी खड़ी करता है।
संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग
यह निर्णय न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सुनाया। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने की अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल करते हुए न सिर्फ सजा, बल्कि एफआईआर और पूरी आपराधिक कार्यवाही को भी समाप्त कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यह एक असाधारण मामला है, जहां न्यायिक हस्तक्षेप से दोनों पक्षों के भविष्य को स्थिरता मिली।
कैसे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
मामले की शुरुआत तब हुई जब ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 376(2)(n) के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। आरोपी ने इस फैसले को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां उसकी सजा निलंबन (बेल) की याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
मार्च में नोटिस जारी होने के बाद करीब नौ महीनों तक शीर्ष अदालत ने इस मामले की निगरानी की। इस दौरान कोर्ट ने एक असामान्य कदम उठाते हुए आरोपी और शिकायतकर्ता को उनके माता-पिता के साथ व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया।
‘सिक्स सेंस’ और चेंबर में बातचीत
अपने आदेश में पीठ ने उल्लेख किया कि तथ्यों का अध्ययन करते समय न्यायाधीशों को यह आभास हुआ कि दोनों पक्षों के बीच संबंध की प्रकृति को सीधे संवाद के जरिए समझना जरूरी है। इसी क्रम में, न्यायाधीशों ने चेंबर में दोनों और उनके परिजनों से अलग-अलग बातचीत की।
अदालत के अनुसार, बातचीत से यह स्पष्ट हुआ कि दोनों के बीच विवाह का इरादा पहले से था और रिश्ते सहमति पर आधारित थे। विवाह में देरी के कारण उत्पन्न असुरक्षा ने शिकायत को आपराधिक शिकायत में बदल दिया।
विवाह और अंतिम फैसला
बातचीत के दौरान दोनों ने विवाह की इच्छा जताई, जिसे उनके परिवारों की सहमति भी मिली। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को सीमित अवधि की जमानत दी ताकि विवाह संपन्न हो सके। जुलाई में दोनों का विवाह हुआ।
अदालत ने मामले को कुछ समय के लिए स्थगित रखा और दिसंबर में पुनः सुनवाई की। कोर्ट को बताया गया कि दोनों पति-पत्नी के रूप में साथ रह रहे हैं और उनका वैवाहिक जीवन स्थिर है। इस रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा को औपचारिक रूप से रद्द कर दिया।
क्या था मूल विवाद
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों की पहचान 2015 में सोशल मीडिया के माध्यम से हुई थी। दोस्ती आगे बढ़ी और सहमति से संबंध बने। वर्ष 2021 में विवाह न हो पाने पर महिला ने शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड से यह सिद्ध नहीं होता कि विवाह का झूठा प्रलोभन देकर संबंध बनाए गए थे, बल्कि दोनों का इरादा विवाह का ही था।
नौकरी बहाली का आदेश
अदालत ने एक और महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए मध्य प्रदेश के सागर स्थित सरकारी अस्पताल में आरोपी की नौकरी बहाल करने का आदेश दिया। दोषसिद्धि के बाद उसे निलंबित कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने निलंबन समाप्त करने के साथ-साथ बकाया वेतन का भुगतान भी सुनिश्चित करने को कहा।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
वरिष्ठ आपराधिक कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि सहमति और आपराधिक मंशा के बीच फर्क को समझना बेहद जरूरी है। हालांकि, वे यह भी रेखांकित करते हैं कि ऐसे मामलों में अदालतों को अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए ताकि वास्तविक पीड़ितों के अधिकार कमजोर न हों।
क्यों है यह फैसला अहम
यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में अनुच्छेद 142 के दायरे, सहमति की व्याख्या और विवाह-प्रलोभन से जुड़े मामलों में न्यायिक विवेक की सीमाओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह भविष्य में समान मामलों की सुनवाई में एक संदर्भ बिंदु के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
