भोपाल जिला एवं सत्र न्यायालय का फैसला: सहकारी बैंक के तीन पूर्व अधिकारियों सहित चार दोषी, किसान की जमीन की अवैध नीलामी का मामला
भोपाल | जिला एवं सत्र न्यायालय, भोपाल की विशेष लोकायुक्त अदालत ने सहकारी बैंक में भ्रष्टाचार और साजिश के एक पुराने मामले में तीन पूर्व...

भोपाल | जिला एवं सत्र न्यायालय, भोपाल की विशेष लोकायुक्त अदालत ने सहकारी बैंक में भ्रष्टाचार और साजिश के एक पुराने मामले में तीन पूर्व बैंक अधिकारियों सहित चार लोगों को दोषी करार दिया है। न्यायाधीश मनोज कुमार सिंह ने लोकायुक्त पुलिस की विस्तृत जांच रिपोर्ट पर सुनवाई पूरी करने के बाद यह फैसला सुनाया।
मामले की जड़: 1989 का कर्ज और 2000 में किसान की जमीन की नीलामी
मामले में शिकायतकर्ता नारायण सिंह, गाँव बरई (तहसील हुजूर) के एक आदिवासी किसान हैं। उन्होंने वर्ष 1989 में पानी का पंप और थ्रेशर खरीदने के लिए 18,000 रुपये का ऋण लिया था और इसके बदले अपनी कृषि भूमि गिरवी रखी थी।
लोकायुक्त जांच के अनुसार, बैंक अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी करते हुए 29 मार्च 2000 को उनकी 4.50 एकड़ जमीन की नीलामी कर दी। यह जमीन केवल 1.10 लाख रुपये में राजेंद्र प्रसाद पाटीदार को बेच दी गई—जो न केवल बाज़ार मूल्य से बेहद कम थी, बल्कि कलेक्टर गाइडलाइन से भी नीचे थी।
जांच में यह भी सामने आया कि नीलामी की प्रक्रिया में कई गंभीर अनियमितताएँ हुईं—दस्तावेज़ों में हेरफेर, मनमानी नोटशीट तैयार करना, और इन्हें सहकारी समितियों के संयुक्त पंजीयक को भेजकर अवैध नीलामी की ‘पुष्टि’ कराना।
कोर्ट ने किन-किन को दोषी ठहराया
लोकायुक्त की ओर से प्रकरण में अपील करने वाली एडीपीओ हेमलता कुशवाहा ने बताया कि अदालत ने जिन लोगों को दोषी पाया, उनमें शामिल हैं—
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हरिहर प्रसाद मिश्रा – तत्कालीन सेल्स ऑफिसर
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आर.एस. गर्ग – अधिकारी
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हुकुमचंद सिंगई – पूर्व महाप्रबंधक
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राजेंद्र प्रसाद पाटीदार – खरीदार
इन सभी को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) और 120-B (आपराधिक साजिश) के साथ-साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं 13(1)(d) और 13(2) के तहत दोषी पाया गया। अदालत ने सभी को आईपीसी और पीसी एक्ट दोनों के तहत तीन-तीन साल की सख्त कैद की सजा सुनाई।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला
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यह केस सहकारी बैंकिंग प्रणाली में जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर गहरे सवाल उठाता है।
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आदिवासी और छोटे किसानों की जमीनों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में यह फैसला भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
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भूमि नीलामी से जुड़े नियमों और उन पर प्रशासनिक निगरानी को मजबूत करने की जरूरत इस मामले ने फिर उजागर की है।
वरिष्ठ विधि विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत का यह निर्णय उन मामलों के लिए भी संकेत है जहाँ सरकारी पद का दुरुपयोग कर कमजोर वर्गों को निशाना बनाया गया।
प्रभावित किसान की स्थिति
नारायण सिंह ने जांच के दौरान बताया था कि नीलामी के समय उन्हें न तो सूचना दी गई और न ही कोई वैकल्पिक विकल्प। जमीन मूल्य को कम आँकने से उनकी कृषि आजीविका को भारी नुकसान हुआ।
हालाँकि अदालत का फैसला अब उनके लिए न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
लोकायुक्त की भूमिका
लोकायुक्त पुलिस ने इस मामले में लंबी अवधि तक दस्तावेज़ जुटाए, वित्तीय रिकॉर्ड का सत्यापन किया और अधिकारियों के बीच हुई साजिश की परतें खोलीं। जांच एजेंसी के अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के मामलों में मजबूत अभियोजन और साक्ष्यों की एकरूपता जरूरी होती है, जिसका प्रभाव इस निर्णय में दिखाई देता है।
