भोपाल में मच्छरों का कहर: सर्दी के आगमन से पहले बढ़ा डेंगू-चिकनगुनिया का प्रकोप, वैज्ञानिक बोले – “पृथ्वी को मनुष्यों से बेहतर जानते हैं मच्छर
मौसम बदला, लेकिन राहत नहीं भोपाल में नवंबर की शुरुआत हमेशा मौसम के बदलने का संकेत होती है। मॉनथ चक्रवात की वजह से अक्टूबर के...

मौसम बदला, लेकिन राहत नहीं
भोपाल में नवंबर की शुरुआत हमेशा मौसम के बदलने का संकेत होती है। मॉनथ चक्रवात की वजह से अक्टूबर के आख़िरी हफ्ते तक शहर के आसमान में बादल छाए रहे, पर अब हल्की ठंड ने दस्तक दे दी है।
सुबह-शाम की हवा में सिहरन घुल चुकी है, और दोपहर में हल्की उमस बनी रहती है। लोगों ने गर्म कपड़े निकाल लिए हैं, लेकिन ठंड के साथ ही एक और “पुराना मेहमान” लौट आया है — मच्छर।
मच्छरों की ‘निष्ठुर फौज’ और बढ़ती बीमारियाँ
हर साल जुलाई से नवंबर तक भोपाल में मच्छरों की तादाद अनियंत्रित हो जाती है। इसी अवधि में डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया के मामले अपने चरम पर पहुँचते हैं।
इस साल अब तक 78 चिकनगुनिया, 114 डेंगू और 19 मलेरिया के मामले दर्ज किए गए हैं। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि यह संख्या वास्तविक मामलों से कहीं कम है, क्योंकि अनेक रोगी निजी इलाज कराते हैं और रिपोर्ट दर्ज नहीं कराते।
नगर निगम की एंटी-लार्वा अभियान चलाने की कोशिशें अक्सर विफल रहती हैं। हर बार जब कोई नया रिपेलेंट या केमिकल बाजार में आता है, मच्छर कुछ ही महीनों में उसके प्रति प्रतिरोधक बन जाते हैं।
नींद हराम करने वाले परजीवी
मच्छरों का आतंक सिर्फ बीमारियाँ नहीं फैलाता — यह मनुष्यों की नींद और सुकून पर भी हमला करता है। जब यह काट नहीं पाते, तब भी इंसान को सताने का रास्ता ढूंढ लेते हैं — कभी कानों के पास भनभनाकर, तो कभी नाक के आसपास मंडराकर।
शहर के निवासी कहते हैं कि साफ-सुथरे मोहल्लों से लेकर मलिन बस्तियों तक, कहीं भी इनसे छुटकारा नहीं है। मच्छर हर जगह पनपने की क्षमता रखते हैं — चाहे वह ठंडी हवा हो या गर्म उमस।
वैश्विक खतरा: आइसलैंड से लेकर भोपाल तक
हाल ही में वैज्ञानिकों ने आइसलैंड में भी मच्छरों की मौजूदगी दर्ज की है — यह वह देश था जहाँ अब तक मच्छर नहीं पाए जाते थे। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण अब अंटार्कटिका जैसे ध्रुवीय क्षेत्रों में भी मच्छरों के जीवित रहने की संभावना बढ़ी है।
पृथ्वी के तापमान में हो रहे परिवर्तन ने इस प्रजाति को और अधिक सहनशील बना दिया है। आइसलैंड में बढ़ती गर्मी और पिघलते ग्लेशियरों के कारण अब वहां की पारिस्थितिकी में भी दक्षिणी क्षेत्रों की मछलियाँ और कीट पहुँच रहे हैं।
करोड़ों साल पुराना ‘दुश्मन’
वैज्ञानिकों के अनुसार, मच्छरों की उत्पत्ति लगभग 21.7 करोड़ वर्ष पहले — ट्रायसिक युग में — हुई थी, जबकि आधुनिक मनुष्य पृथ्वी पर मात्र 3 लाख वर्ष से हैं। यानी, मच्छर इंसानों से 200 मिलियन वर्ष पुराने हैं और पृथ्वी को उनसे कहीं बेहतर समझते हैं।
इतिहास में इनके जीवाश्म 12.5 करोड़ वर्ष पुराने पाए गए हैं। इतनी लंबी अवधि में यह कीट हर मौसम, हर वातावरण और हर दवा के अनुकूल बन चुका है।
भोपाल के लिए चेतावनी
विशेषज्ञों का कहना है कि भोपाल जैसी झीलों और नालों से घिरी नगरी मच्छरों के लिए स्वर्ग समान है। स्वच्छता के अभाव, जलभराव और अव्यवस्थित अपशिष्ट निपटान ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. आर.पी. दुबे का कहना है, “जब तक नागरिक अपने घरों और आसपास के क्षेत्रों को मच्छर-रोधी नहीं बनाएँगे, कोई भी सरकारी अभियान प्रभावी नहीं हो सकता। यह युद्ध केवल दवाओं से नहीं, जागरूकता से जीता जाएगा।”
