भोपाल स्मार्ट सिटी मिशन में नया विवाद: नगर निगम ने सरकारी जमीन पर बनाए ‘कचरा कैफे’, बिना अनुमति के निर्माण का खुलासा
‘कचरा कैफे’ बने अवैध निर्माण का प्रतीक भोपाल नगर निगम (BMC), जो शहर में अवैध निर्माण हटाने की जिम्मेदारी निभाता है, अब खुद पर सरकारी...

‘कचरा कैफे’ बने अवैध निर्माण का प्रतीक
भोपाल नगर निगम (BMC), जो शहर में अवैध निर्माण हटाने की जिम्मेदारी निभाता है, अब खुद पर सरकारी जमीन पर कब्जे के आरोपों से घिर गया है।
स्वच्छ भारत मिशन (SBM) के तहत बनाए गए तीन “कचरा कैफे”—नंबर 10 मार्केट, बिट्टन मार्केट और बोट क्लब के पास—बिना किसी भूमि स्वामित्व, विभागीय अनुमति या आवंटन आदेश के खड़े कर दिए गए।
आधिकारिक रिकॉर्ड्स और आरटीआई दस्तावेजों ने यह चौंकाने वाला खुलासा किया है।
RTI से खुलासा: निगम ने खुद माना—‘Nil’
RTI कार्यकर्ता नितिन सक्सेना ने नगर निगम से कैफे की भूमि स्वामित्व, निर्माण अनुमति और विभागीय सहमति से जुड़ी जानकारी मांगी थी।
नगर निगम ने जवाब में सभी प्रश्नों पर “Nil” लिखा, यानी किसी भी प्रकार की स्वीकृति या रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
इससे पुष्टि होती है कि कैफे बिना वैधानिक अनुमति और विभागीय सहमति के बनाए गए हैं।
सरकारी भूमि पर मॉडल यूनिट
स्वच्छ भारत मिशन सेल के अधिकारियों के मुताबिक, ये कैफे सरकारी जमीन पर बनाए गए।
नंबर 10 मार्केट स्थित कैफे—जो मॉडल यूनिट के रूप में शुरू हुआ था—करीब 600 वर्गफुट भूमि पर बना है। यहां लोग कचरे के बदले खाने-पीने की वस्तुएं प्राप्त कर सकते थे।
अधिकारियों ने दावा किया कि पहले इस स्थान पर ग्रेवांस रीड्रेसल सेंटर (शिकायत निवारण केंद्र) था, लेकिन यह स्पष्ट नहीं कर सके कि भूमि किस विभाग की है।
SBM इंजीनियर ने मानी अनियमितताएं
स्वच्छ भारत मिशन इंजीनियर सौरव सूद ने भी इन निर्माणों में गड़बड़ी की पुष्टि की।
उनका कहना है—
“स्थल निरीक्षण में अतिरिक्त दुकानों जैसी अनधिकृत संरचनाएं मिली हैं। निगम की ओर से कैफे खोलने का कोई आदेश जारी नहीं हुआ था। हम रिपोर्ट तैयार कर कमिश्नर को सौंपेंगे।”
नगर निगम आयुक्त संस्कृति जैन ने भी स्वीकार किया कि उन्हें भूमि आवंटन की जानकारी नहीं थी। उन्होंने कहा,
“मामले की जांच की जाएगी और संबंधित अधिकारियों से चर्चा की जाएगी।”
महिलाओं के लिए कार्यशाला बनी व्यावसायिक दुकानें
जानकारी के अनुसार, इन स्थानों पर पहले महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए टिन शेड कार्यशालाएं स्वीकृत की गई थीं, जहां कपड़े के थैले और रीसायकल प्रोडक्ट्स बनाए जाने थे।
शिकायतों के मुताबिक, बाद में SBM अधिकारियों ने एक निजी कंसल्टेंट के साथ मिलकर इन शेड्स को व्यावसायिक कैफे और दुकानों में बदल दिया।
यह परिवर्तन बिना किसी विभागीय अनुमति या भूमि आवंटन प्रक्रिया के किया गया।
नाममात्र की आमदनी, करोड़ों की जमीन
तीनों कैफे एक NGO को संचालन के लिए सौंपे गए हैं।
नगर निगम को इसके बदले हर महीने कुल ₹20,000 रॉयल्टी मिलती है —
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नंबर 10 मार्केट यूनिट: ₹10,000 प्रतिमाह
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बिट्टन मार्केट और बोट क्लब यूनिट: ₹5,000-₹5,000 प्रतिमाह
यानी सालाना आय केवल ₹2.4 लाख, जबकि यह कैफे प्रमुख वाणिज्यिक क्षेत्रों की सरकारी जमीन पर संचालित हैं।
RTI कार्यकर्ताओं ने इसे “सार्वजनिक संपत्ति का दुरुपयोग” बताया है।
भूमि अनुमति पर सन्नाटा
RTI दस्तावेजों से यह भी पता चला कि किसी भी स्थल के लिए भूमि स्वामित्व, लीज़, ट्रांसफर या विभागीय अनुमति से संबंधित कोई फाइल मौजूद नहीं है।
निगम यह भी नहीं बता सका कि निर्माण कब, कैसे और किसके आदेश पर शुरू हुआ।
इससे प्रशासनिक जवाबदेही और निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
निष्कर्ष
स्वच्छता के नाम पर बनाए गए भोपाल के “कचरा कैफे” अब पारदर्शिता और शासन प्रणाली पर दाग बन चुके हैं।
जहां ये प्रोजेक्ट्स नागरिक भागीदारी और पर्यावरणीय जागरूकता का प्रतीक बनने थे, वहीं अब वे अवैध कब्जे और अनियमितताओं के प्रतीक बन गए हैं।
अगर प्रशासन जल्द कार्रवाई नहीं करता, तो यह मामला भोपाल नगर निगम की साख और विश्वसनीयता दोनों पर भारी पड़ सकता है।
