BREAKING
Revolutionary climate technology breakthrough announced • Championship finals draw record 150M+ viewers • Global markets surge following policy changes • New discovery in quantum computing promises faster processors
The Cliff News
National

मध्यप्रदेश में साँप के काटने के बढ़ते मामले और एएसवी की कमी

मानसून के मौसम में मध्यप्रदेश में साँप के काटने के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। इससे निपटने के लिए राज्य में एंटी-स्नेक वेनम...

Oct 3
3 मिनट में पढ़ें
मध्यप्रदेश में साँप के काटने के बढ़ते मामले और एएसवी की कमी

मानसून के मौसम में मध्यप्रदेश में साँप के काटने के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। इससे निपटने के लिए राज्य में एंटी-स्नेक वेनम (ASV) पॉलिवैलेंट की उपलब्धता पर सवाल खड़े हो गए हैं। हालाँकि सरकार ने दवा उपलब्ध कराने के प्रयास किए हैं, लेकिन ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में वितरण व्यवस्था में गंभीर खामियाँ साफ दिख रही हैं।

जनवरी 2022 से दिसंबर 2024 के बीच मध्यप्रदेश में कुल 3,334 साँप के काटने के मामले दर्ज हुए हैं, जिनमें 12 लोगों की मौत हुई है। यह आँकड़े इंटीग्रेटेड हेल्थ इन्फॉर्मेशन प्लेटफॉर्म (IHIP) और इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (IDSP) से सामने आए हैं। वहीं, मध्यप्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड के अनुसार, जिला औषधि केन्द्रों (DDCs) में एएसवी का वितरण बेहद असमान है।

राज्य के 1,727 औषधि केन्द्रों में से 1,660 केन्द्रों पर एएसवी का कोई स्टॉक नहीं है, जबकि केवल 67 केन्द्रों पर कुल 617 यूनिट उपलब्ध हैं। 20 या उससे अधिक यूनिट का स्टॉक सिर्फ आठ केन्द्रों में है, जो छह जिलों तक सीमित है। जबलपुर और रीवा जैसे मध्य जिलों में कुछ मात्रा में स्टॉक मौजूद है, लेकिन उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों में भारी कमी देखी जा रही है।

साँप काटने के मामलों में 2022 के 1,208 से बढ़कर 2024 में 3,334 मामले हो गए। हालाँकि मौतों की संख्या 12-12 पर स्थिर रही, लेकिन यह स्थिति बेहतर और संतुलित इलाज की व्यवस्था की माँग करती है।

संजೀವनी क्लीनिकों में भी असमानता दिखती है। कुल 604 क्लीनिकों में से केवल 71 के पास एएसवी स्टॉक है। भोपाल में 84 यूनिट, इंदौर में 54 और देवास में 41 यूनिट उपलब्ध हैं, जबकि 533 क्लीनिकों में शून्य स्टॉक है।

सिविल सर्जन कार्यालयों के पास कुल 6,280 एएसवी यूनिट हैं, लेकिन इनमें से 5,300 से अधिक यूनिट सिर्फ 19 कार्यालयों में केंद्रित हैं। दमो, कटनी, मंडला और सतना जैसे संवेदनशील जिलों में एक या कोई भी यूनिट उपलब्ध नहीं है। इसी तरह, 52 जिलों के सीएमएचओ (मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी) के पास कुल 4,679 यूनिट हैं, जिनमें से 17 जिलों में 100 से अधिक यूनिट हैं, जबकि 10 जिलों में 10 या उससे कम और अशोकनगर में एक भी यूनिट उपलब्ध नहीं है।

कम्युनिटी हेल्थ सेंटर (CHCs) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHCs) में भी यही असमानता है। 342 सीएचसी में से 20 के पास कोई स्टॉक नहीं है, जबकि सिर्फ 40 केन्द्रों में आधे से ज्यादा 16,934 यूनिट रखे गए हैं। 1,227 पीएचसी में से 587 के पास कोई स्टॉक नहीं, 334 केन्द्रों में 10 से 99 यूनिट हैं और केवल 6 पीएचसी में ही 1,000 से ज्यादा यूनिट हैं, जो मुख्य रूप से बड़वानी, धार और अलीराजपुर जिलों में केंद्रित हैं।

सब हेल्थ सेंटर, जो ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अहम हैं, वहाँ स्थिति बेहद चिंताजनक है। कुल 12,438 केन्द्रों में सिर्फ 17 केन्द्रों के पास 57 यूनिट हैं। शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र (UPHCs) थोड़ी बेहतर स्थिति में हैं, जहाँ 223 केन्द्रों में से 66 केन्द्रों के पास 213 यूनिट उपलब्ध हैं।

यह तस्वीर साफ करती है कि एएसवी के वितरण में भारी असमानता है। ग्रामीण और कमजोर वर्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी है कि पूरे प्रदेश में एएसवी की समान और त्वरित उपलब्धता की व्यवस्था की जाए।