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मेट्रोलॉजी एक्ट में पेट्रोल पंप घोटाले के चारों आरोपी बरी — अदालत ने कहा, पुलिस के पास नहीं थी अधिकारिता

इंदौर की जिला एवं सत्र न्यायालय ने पेट्रोल पंप की मशीनों में हेराफेरी के आरोप में गिरफ्तार चार व्यक्तियों को बरी कर दिया है। अदालत...

Oct 19
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मेट्रोलॉजी एक्ट में पेट्रोल पंप घोटाले के चारों आरोपी बरी — अदालत ने कहा, पुलिस के पास नहीं थी अधिकारिता

इंदौर की जिला एवं सत्र न्यायालय ने पेट्रोल पंप की मशीनों में हेराफेरी के आरोप में गिरफ्तार चार व्यक्तियों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि पुलिस ने जिस कानून के तहत मामला दर्ज किया, उसमें कार्रवाई का अधिकार वजन एवं माप विभाग (Department of Weights and Measures) के पास है, न कि क्राइम ब्रांच के पास।


क्या था मामला

यह मामला वर्ष 2014 का है, जब क्राइम ब्रांच ने इंदौर और आसपास के जिलों में कई पेट्रोल पंपों पर ईंधन मापने वाली मशीनों से छेड़छाड़ की शिकायतों की जांच शुरू की थी। जांच में सामने आया कि प्रमोद कुमार प्रजापति उर्फ पिंटू (27) ने तकनीकी कौशल का उपयोग कर मशीनों में छिपे हुए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगाए थे।
इन उपकरणों की मदद से मशीनें लगभग 5% कम पेट्रोल या डीज़ल निकालती थीं, जिससे पेट्रोल पंप संचालकों को रोजाना ₹25,000 तक का अतिरिक्त लाभ होता था।


आरोपियों की पहचान और भूमिका

मामले में चार लोगों पर आरोप लगाए गए थे —

  1. प्रमोद कुमार प्रजापति (तकनीकी विशेषज्ञ, मशीनों में हेराफेरी का आरोप)

  2. राज कुमार कलावट (पंप कर्मचारी)

  3. विजय सक्सेना (बैंककर्मी, पंप संचालन संभालते थे)

  4. शांता मिन्ज़ (पेट्रोल पंप की अधिकृत स्वामिनी)

पेट्रोल पंप का लाइसेंस शांता मिन्ज़ के नाम था, लेकिन संचालन की जिम्मेदारी विजय सक्सेना संभाल रहे थे।


अभियोजन पक्ष के दावे

जांच एजेंसियों का दावा था कि प्रमोद ने मशीनों में रिमोट कंट्रोल सिस्टम फिट किया था, जिससे आवश्यकता पड़ने पर छेड़छाड़ को रोका या शुरू किया जा सकता था। छापों के दौरान ये डिवाइस बंद कर दिए जाते थे, जिससे अधिकारियों को गड़बड़ी पकड़ना मुश्किल हो जाता था।


अदालत में क्या कहा गया

आरोपियों की ओर से अधिवक्ता जगदीश गुप्ता ने तर्क दिया कि यह मामला मेट्रोलॉजी एक्ट के अंतर्गत आता है, जिसकी जांच और कार्रवाई का अधिकार वजन एवं माप विभाग के पास है। क्राइम ब्रांच को इस अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करने का कोई अधिकार नहीं था।
उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस धोखाधड़ी (IPC की धारा 420) के आरोप को साबित करने के लिए कोई ठोस दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी।


अदालत का निर्णय

सभी तर्कों को सुनने के बाद अदालत ने चारों आरोपियों — प्रमोद कुमार प्रजापति, राज कुमार कलावट, विजय सक्सेना और शांता मिन्ज़ — को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि आरोपियों ने जानबूझकर ईंधन मापने की मशीनों में छेड़छाड़ कर धोखाधड़ी की थी।


कानूनी दृष्टिकोण से मामला क्यों महत्वपूर्ण

यह फैसला मेट्रोलॉजी एक्ट के दायरे और जांच एजेंसियों की अधिकारिता से जुड़ा एक अहम उदाहरण है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों की भूमिका और प्रक्रिया को परिभाषित करेगा।