शुरुआती हफ्ते में ही जमीनी हकीकत से टकराई भोपाल मेट्रो, अधूरी पहुंच व्यवस्था बनी चुनौती
भोपाल में भव्य उद्घाटन के एक सप्ताह बाद ही भोपाल मेट्रो की चमक जमीनी हकीकत से टकराती नजर आ रही है। शुरुआती दिनों में यात्रियों...

भोपाल में भव्य उद्घाटन के एक सप्ताह बाद ही भोपाल मेट्रो की चमक जमीनी हकीकत से टकराती नजर आ रही है। शुरुआती दिनों में यात्रियों की संख्या अपेक्षाकृत कम बनी हुई है, हालांकि मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड (MPMRCL) का कहना है कि सभी स्टेशनों की पूर्ण पहुंच व्यवस्था तैयार होने के बाद यात्रियों की संख्या में धीरे-धीरे बढ़ोतरी होगी।
लेकिन मौजूदा स्थिति में, मेट्रो के ऊपर से गुजरने वाले आठ एलिवेटेड स्टेशनों के नीचे का शहरी ढांचा कई जगह अधूरा दिख रहा है। MPMRCL से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इन स्टेशनों के नीचे सिर्फ 10 से 20 प्रतिशत अप्रोच रोड और पैदल यात्री क्षेत्र ही पूरी तरह तैयार हैं।
अधूरी सड़कें, जोखिम भरा सफर
ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि कई स्थानों पर यात्रियों को टूटी-फूटी सड़कों, अधूरे फुटपाथ, अस्थायी मोड़ों और बिना चिह्नित रास्तों से होकर स्टेशन तक पहुंचना पड़ रहा है। जहां आधुनिक मेट्रो परियोजनाओं में स्टेशन प्लाजा, समतल पैदल रास्ते और सुरक्षित क्रॉसिंग की अपेक्षा होती है, वहां फिलहाल असुविधा और जोखिम हावी है।
विशेष रूप से एमपी नगर स्टेशन जैसे व्यस्त कॉरिडोर पर यह समस्या अधिक गंभीर है। यहां एंट्री और एग्जिट दोनों ओर से चालू होनी चाहिए, ताकि यात्रियों का दबाव समान रूप से बंट सके। लेकिन फिलहाल सिर्फ एक ओर से प्रवेश-निकास की सुविधा उपलब्ध है, जिससे यात्रियों को तेज रफ्तार ट्रैफिक के बीच सड़क पार करने का जोखिम उठाना पड़ रहा है।
सुरक्षा और उपयोगिता पर सवाल
शहरी परिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी मेट्रो परियोजना की सफलता केवल ट्रेनों के संचालन से नहीं, बल्कि स्टेशन तक सुरक्षित और सहज पहुंच से तय होती है। अधूरी सड़क बहाली, ज़ेब्रा क्रॉसिंग की कमी, स्पीड कंट्रोल उपायों का अभाव और स्पष्ट साइनबोर्ड न होना यात्रियों को मेट्रो इस्तेमाल करने से हतोत्साहित कर सकता है।
एक नियमित यात्री ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “ट्रेन तो आधुनिक है, लेकिन स्टेशन तक पहुंचना अपने आप में एक चुनौती है। खासकर बुजुर्गों और महिलाओं के लिए सड़क पार करना खतरनाक लगता है।”
निर्णायक साबित हो सकता है शुरुआती दौर
अधिकारियों का मानना है कि यह शुरुआती चरण है और आने वाले हफ्तों में सड़क बहाली, पैदल यात्री सुविधाएं और साइनज सिस्टम को दुरुस्त किया जाएगा। हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यही शुरुआती समय निर्णायक होता है। यदि जल्द ही ज़ेब्रा क्रॉसिंग, ट्रैफिक शांत करने के उपाय (स्पीड ब्रेकर, संकेतक) और साफ-सुथरी पैदल पहुंच सुनिश्चित नहीं की गई, तो करोड़ों रुपये की लागत से बनी यह मेट्रो परियोजना एक अधूरे और असुरक्षित शहरी माहौल के ऊपर दौड़ती हुई नजर आ सकती है।
आगे की राह
MPMRCL का कहना है कि सभी संबंधित विभागों के साथ समन्वय कर अधूरे कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जा रहा है। लेकिन फिलहाल, भोपाल मेट्रो की असली परीक्षा केवल ट्रैक और कोच नहीं, बल्कि नीचे की सड़कों और ऊपर की उम्मीदों को जोड़ने की है।
