भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून के आने में क्यों हो रही है देरी: मौसम की प्रमुख शर्तें अभी भी अधूरी
दक्षिण-पश्चिम मानसून की दस्तक में देरी हो रही है क्योंकि हवा और बारिश के जरूरी मानक अभी पूरे नहीं हुए हैं।

मुख्य सारांश
क्या हुआ: दक्षिण-पश्चिम मानसून के आने की आधिकारिक घोषणा रुक गई है क्योंकि हवा और बारिश से जुड़े प्रमुख मानक अभी तक पूरे नहीं हुए हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: मौसम के पूर्वानुमान के लिए मानसून के आगमन पर नजर रखना बेहद जरूरी है, लेकिन एक सक्रिय चक्रवाती परिसंचरण (साइक्लोनिक सर्कुलेशन) हवा के पैटर्न को प्रभावित कर रहा है।
क्या बदलाव होगा: मौसम वैज्ञानिकों को मानसून की पुष्टि करने से पहले 14 स्टेशनों पर लगातार पश्चिमी हवाओं और तय बारिश के आंकड़ों की निगरानी करनी होगी।
कौन प्रभावित है: केरल, कर्नाटक और लक्षद्वीप के कृषि क्षेत्र और आम लोग जो इस मौसमी बारिश का इंतजार कर रहे हैं।
मानसून के आगमन में मुख्य बाधाएं
भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून का आधिकारिक आगमन अभी भी अधर में लटका हुआ है। हालांकि, 26 मई की शुरुआती पूर्वानुमान तिथि बीत चुकी है, लेकिन मौसम संबंधी परिस्थितियां अभी तक आवश्यक मानकों को पूरा नहीं कर पाई हैं।
मानसून की दस्तक की आधिकारिक घोषणा करने के लिए, मौसम वैज्ञानिक दो महत्वपूर्ण मानकों की बारीकी से निगरानी करते हैं। इनमें लगातार पश्चिमी हवाओं का चलना और तय क्षेत्रीय स्टेशनों पर विशेष मात्रा में बारिश दर्ज किया जाना शामिल है।
वैसे तो मानसून के आने की सामान्य तारीख 1 जून है, लेकिन मौसम विज्ञानियों का कहना है कि इसमें सात दिनों का उतार-चढ़ाव सामान्य माना जाता है। फिलहाल, दोनों प्राथमिक शर्तें अधूरी हैं।
चक्रवाती परिसंचरण से हवाओं का पैटर्न प्रभावित
पहला मुख्य कारक मेडागास्कर से भारत की ओर चलने वाली स्थिर और नमी से भरपूर पश्चिमी हवाओं का स्थापित होना है। हालांकि, लक्षद्वीप के पास दक्षिण-पूर्वी अरब सागर के ऊपर बने एक ऊपरी वायु चक्रवाती परिसंचरण ने इस प्रक्रिया को बाधित कर दिया है।
इस वायुमंडलीय परिसंचरण के कारण हवा की दिशा लगातार बदल रही है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के एक अधिकारी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा:
"पश्चिमी हवाओं का लगातार और मजबूत होना जरूरी है। हालांकि, मौजूदा ऊपरी वायु चक्रवाती परिसंचरण के कारण हवाओं की दिशा बार-बार बदल रही है। हवाएं कभी पश्चिमी, कभी पूर्वी तो कभी अन्य दिशाओं में घूम रही हैं। इससे यह पता लगाना मुश्किल हो गया है कि स्थिर पश्चिमी हवाएं स्थापित हुई हैं या नहीं। परिसंचरण का यह पैटर्न समाप्त होने के बाद ही स्थिति साफ होगी।"
14 स्टेशनों पर बारिश का मानक अधूरा
मानसून की घोषणा के लिए दूसरी शर्त बारिश के खास वितरण पर निर्भर करती है। आईएमडी के दिशानिर्देशों के अनुसार, 10 मई के बाद लगातार दो दिनों तक 14 निर्धारित स्टेशनों में से कम से कम आठ या नौ स्टेशनों पर 2.5 मिमी या उससे अधिक बारिश दर्ज होनी चाहिए।
वर्तमान में, इन 14 स्टेशनों में से लगभग 60% स्टेशन बारिश के इस पैमाने को छूने में असमर्थ रहे हैं। निगरानी के लिए महत्वपूर्ण ये स्टेशन तीन क्षेत्रों में फैले हुए हैं:
- लक्षद्वीप: अमिनी और मिनिकॉय
- केरल: तिरुवनंतपुरम, पुनालुर, कोल्लम, कोट्टायम, अलाप्पुझा, कोच्चि, वेल्लानीक्करा, कोझिकोड, थलास्सेरी, कन्नूर और कासरगोड में कुडलू
- कर्नाटक: मंगलुरु
मौसम के पूर्वानुमान पर जलवायु परिवर्तन का असर
ऐतिहासिक रूप से, दक्षिण-पश्चिम मानसून के आने की घोषणा के लिए केवल बारिश को ही एकमात्र पैमाना माना जाता था। बाद में उपग्रह तकनीक की मदद से सटीकता बढ़ाने के लिए पश्चिमी हवाओं के पैटर्न को भी इस मानक में जोड़ा गया।
हालांकि, बदलते पर्यावरणीय कारकों के कारण इन मानकों में संशोधन की आवश्यकता हो सकती है। आईएमडी के एक अधिकारी ने इस बदलती स्थिति पर टिप्पणी की:
"14 स्टेशनों में से लगभग 60% ने अभी तक लगातार दो दिनों तक 2.5 मिमी या उससे अधिक बारिश दर्ज नहीं की है... जलवायु परिवर्तन को देखते हुए, हमें मौसम के पूर्वानुमान के मानकों में बदलाव करना होगा।"
आगे क्या होगा
मौसम वैज्ञानिक अरब सागर के ऊपर बने ऊपरी वायु चक्रवाती परिसंचरण पर पैनी नजर रखेंगे कि यह कब समाप्त होता है। आने वाले दिनों में लगातार बारिश के लिए निर्धारित 14 रेन गेज स्टेशनों की निगरानी करना बेहद महत्वपूर्ण होगा।
हवा का पैटर्न स्थिर होने और बारिश के निर्धारित मानक पूरे होने के बाद ही मानसून के आगमन की आधिकारिक घोषणा की जाएगी।
