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स्वच्छ हवा:योगी की प्रशासनिक सख्ती बनाम मोहन की कार्यशैली

भोपाल में PM10 प्रदूषण के स्रोतों को देखें तो सड़क और अन्य प्रकार की धूल सबसे बड़ी चुनौती है।

Few hours ago
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स्वच्छ हवा:योगी की प्रशासनिक सख्ती बनाम मोहन की कार्यशैली

राजीव त्रिपाठी , संपादक 

भोपाल को देश के सबसे खूबसूरत और हरित शहरों में गिना जाता है। झीलों, पहाड़ियों और अपेक्षाकृत बेहतर प्राकृतिक वातावरण के कारण यहां की भौगोलिक परिस्थितियां कई बड़े महानगरों की तुलना में अनुकूल हैं। इसके बावजूद वायु प्रदूषण की चुनौती खत्म नहीं हुई है। स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में लखनऊ 198 अंकों के साथ देश में पहले स्थान पर रहा, जबकि इंदौर 197, जबलपुर 195 और भोपाल 192 अंकों के साथ चौथे स्थान पर रहा। अंतर महज छह अंकों का है, लेकिन इसके पीछे प्रशासनिक प्राथमिकताओं, योजनाओं के क्रियान्वयन और राजनीतिक इच्छाशक्ति से जुड़े कई सवाल छिपे हैं।

 

भोपाल की स्थिति इसलिए भी चर्चा का विषय है क्योंकि शहर को प्रकृति का बड़ा लाभ मिला हुआ है। यहां बड़ी झीलें, पहाड़ी क्षेत्र और हरित क्षेत्र मौजूद हैं। इसके बावजूद शहर की हवा में धूल, वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण गतिविधियां और खुले में कचरा जलाने जैसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं। सवाल यह नहीं है कि भोपाल की रैंकिंग खराब है, बल्कि यह है कि बेहतर प्राकृतिक परिस्थितियों के बावजूद शहर वायु गुणवत्ता में वह गति क्यों नहीं पकड़ पा रहा, जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है।

 

भोपाल में PM10 प्रदूषण के स्रोतों को देखें तो सड़क और अन्य प्रकार की धूल सबसे बड़ी चुनौती है। उपलब्ध आकलन के अनुसार PM10 में धूल की हिस्सेदारी करीब 62 प्रतिशत है। परिवहन का योगदान लगभग 13 प्रतिशत और निर्माण गतिविधियों का करीब 12 प्रतिशत है। PM2.5 में परिवहन की हिस्सेदारी लगभग 29 प्रतिशत और धूल की करीब 38 प्रतिशत बताई गई है। इसका सीधा अर्थ है कि यदि भोपाल को वास्तव में स्वच्छ हवा वाला शहर बनाना है तो सबसे पहले सड़कों की धूल और वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना होगा।

 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भोपाल में PM10 का वार्षिक औसत स्तर 2023-24 में करीब 113 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर था, जो 2024-25 में घटकर लगभग 110 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर हुआ। सुधार जरूर हुआ, लेकिन यह गिरावट करीब तीन प्रतिशत की रही। यह आंकड़ा बताता है कि योजनाएं चलने के बावजूद प्रदूषण कम करने की गति अभी अपेक्षाकृत धीमी है।

 

इसके विपरीत लखनऊ का उदाहरण मध्यप्रदेश के लिए महत्वपूर्ण है। लखनऊ में 2017-18 के दौरान PM10 का वार्षिक औसत स्तर करीब 250 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर बताया गया था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 137 माइक्रोग्राम तक पहुंच गया। यह कमी काफी बड़ी है। हालांकि 137 माइक्रोग्राम अभी भी राष्ट्रीय मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से काफी अधिक है, लेकिन इतने बड़े स्तर पर गिरावट यह दिखाती है कि लगातार और लक्ष्य आधारित प्रशासनिक हस्तक्षेप से प्रदूषण में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

 

लखनऊ की सफलता का अर्थ यह नहीं है कि वहां प्रदूषण की समस्या खत्म हो गई है। बल्कि वहां की कार्यशैली यह बताती है कि प्रदूषण के स्रोतों को चिन्हित कर उन पर लगातार कार्रवाई करने से परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। सड़क की धूल को नियंत्रित करने, मैकेनाइज्ड रोड स्वीपिंग बढ़ाने, खुले में कचरा जलाने पर रोक, निर्माण स्थलों की निगरानी, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने और स्थानीय स्तर पर जनभागीदारी बढ़ाने जैसे उपायों को प्राथमिकता दी गई।

 

यहीं पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की प्रशासनिक शैली की तुलना स्वाभाविक रूप से सामने आती है। योगी सरकार की कार्यशैली में किसी समस्या को मिशन मोड में लेकर विभागों के बीच समन्वय स्थापित करने और लक्ष्य आधारित निगरानी पर जोर दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश ने वायु प्रदूषण को केवल नगर निकाय या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जिम्मेदारी मानने के बजाय परिवहन, उद्योग, कृषि, कचरा प्रबंधन और अन्य क्षेत्रों को भी इससे जोड़ने की दिशा में कदम उठाए हैं।

 

उत्तर प्रदेश में एयर क्वालिटी मैनेजमेंट के लिए व्यापक परियोजना पर काम किया जा रहा है। इसके तहत इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने, प्रदूषणकारी वाहनों को धीरे-धीरे हटाने और विभिन्न प्रदूषण स्रोतों पर एक साथ कार्रवाई करने की योजना बनाई गई है। सरकार ने इसके लिए बजट में भी प्रावधान किया है। यह मॉडल इस बात पर जोर देता है कि प्रदूषण किसी एक विभाग की समस्या नहीं है और इसके समाधान के लिए सरकार के कई विभागों को एक साझा लक्ष्य के साथ काम करना होगा।

 

मध्यप्रदेश में भी वायु गुणवत्ता सुधार के लिए योजनाएं और संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद हैं। भोपाल में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत धनराशि उपलब्ध कराई जाती है। लेकिन असली चुनौती योजना बनाने से ज्यादा उसे जमीन पर उतारने की है। यदि सड़क निर्माण के बाद महीनों तक मिट्टी और मलबा पड़ा रहे, निर्माण सामग्री खुले में रखी जाए, सड़क किनारे कच्चे हिस्से धूल उड़ाते रहें और वाहनों का दबाव बढ़ता जाए तो केवल पौधारोपण या जागरूकता अभियान से वायु गुणवत्ता में बड़ा बदलाव संभव नहीं है।

 

भोपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रशासनिक जवाबदेही की है। किस विभाग को किस प्रदूषण स्रोत पर कार्रवाई करनी है, उसकी समयसीमा क्या होगी और कार्रवाई के बाद प्रदूषण में कितनी कमी आई, इसका नियमित सार्वजनिक आकलन होना चाहिए। केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि इतने पौधे लगाए गए, इतनी सड़कें साफ की गईं या इतने जागरूकता कार्यक्रम हुए। असली सवाल यह होना चाहिए कि PM10 और PM2.5 कितना कम हुआ।

 

राजनीतिक इच्छाशक्ति का अर्थ भी केवल बड़े अभियान शुरू करना नहीं है। यदि सरकार वास्तव में भोपाल को स्वच्छ हवा वाला शहर बनाना चाहती है तो उसे सड़क की धूल को सबसे बड़ी प्राथमिकता देनी होगी। निर्माण स्थलों पर नियमों का कठोर पालन, मलबे के परिवहन के दौरान कवर की अनिवार्यता, सड़कों की नियमित मैकेनाइज्ड सफाई, खुले में कचरा जलाने पर तत्काल कार्रवाई और यातायात प्रबंधन जैसे उपायों को अभियान की तरह लागू करना होगा।

 

भोपाल में सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना भी जरूरी है। शहर का विस्तार बढ़ रहा है और निजी वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यदि सार्वजनिक परिवहन सुविधाजनक, तेज और भरोसेमंद नहीं होगा तो निजी वाहनों पर निर्भरता बढ़ती जाएगी। इससे न केवल ट्रैफिक बल्कि PM2.5 और अन्य प्रदूषकों का स्तर भी प्रभावित होगा।

 

इसी तरह निर्माण गतिविधियों पर निगरानी को केवल कागजी प्रक्रिया नहीं बनाया जा सकता। शहर में चल रहे बड़े निर्माण कार्यों के लिए धूल नियंत्रण के स्पष्ट मानक होने चाहिए। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना और काम रोकने जैसी कार्रवाई वास्तविक रूप से दिखाई देनी चाहिए।

 

भोपाल के लिए एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उपलब्ध सरकारी धन का प्रभावी इस्तेमाल है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत मिलने वाली राशि का उद्देश्य केवल खर्च करना नहीं, बल्कि ऐसे स्थायी उपाय करना है जिनका असर हवा की गुणवत्ता पर दिखाई दे। यदि बजट उपलब्ध होने के बावजूद उसका पर्याप्त और समयबद्ध उपयोग नहीं होता है तो यह प्रशासनिक क्षमता पर सवाल खड़ा करता है।

 

भोपाल को लखनऊ से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय उससे सीखने की जरूरत है। लखनऊ जैसे भीड़भाड़ वाले शहर ने यदि अपने PM10 स्तर में इतनी बड़ी गिरावट हासिल की है तो भोपाल के लिए यह और बड़ी संभावना पैदा करता है। यहां प्राकृतिक वातावरण पहले से बेहतर है। इसलिए यदि प्रशासन स्रोत आधारित प्रदूषण नियंत्रण को प्राथमिकता दे, विभागों की जवाबदेही तय करे और राजनीतिक स्तर पर लगातार निगरानी रखे तो भोपाल राष्ट्रीय स्तर पर और बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।

 

स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में भोपाल का चौथा स्थान निश्चित रूप से उपलब्धि है, लेकिन इसे अंतिम सफलता मान लेना उचित नहीं होगा। छह अंकों का अंतर यह बताता है कि भोपाल शीर्ष स्थान से बहुत दूर नहीं है। लेकिन रैंकिंग से अधिक महत्वपूर्ण शहर के नागरिकों को मिलने वाली वास्तविक हवा है। यदि AQI खराब दिनों में नागरिकों को सांस लेने में परेशानी होती है तो केवल रैंकिंग का अच्छा होना पर्याप्त नहीं है।

 

भोपाल के पास देश के सबसे स्वच्छ और रहने योग्य शहरों में शामिल होने की क्षमता है। झीलों और हरित क्षेत्रों के कारण प्रकृति ने उसे मजबूत आधार दिया है। अब आवश्यकता प्रशासनिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक योजना और लगातार निगरानी की है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने चुनौती यही है कि वायु प्रदूषण को सामान्य नगर निकाय समस्या मानने के बजाय इसे मिशन मोड में लिया जाए।

 

योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली से मध्यप्रदेश यह सीख सकता है कि बड़े लक्ष्य तभी परिणाम देते हैं, जब विभागीय सीमाओं से ऊपर उठकर स्पष्ट लक्ष्य, समयसीमा और जवाबदेही तय की जाए। वहीं मध्यप्रदेश के पास अपनी भौगोलिक और प्राकृतिक परिस्थितियों का अतिरिक्त लाभ है। यदि इन दोनों चीजों को जोड़ा जाए तो भोपाल के लिए बेहतर परिणाम हासिल करना कठिन नहीं है।

 

भोपाल को अब केवल सर्वेक्षण की रैंकिंग सुधारने की नहीं, बल्कि हवा की वास्तविक गुणवत्ता सुधारने की जरूरत है। लक्ष्य लखनऊ से आगे निकलना नहीं, बल्कि ऐसा भोपाल बनाना होना चाहिए जहां विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हों। प्राकृतिक वातावरण ने भोपाल को जो बढ़त दी है, उसे प्रशासनिक सुस्ती के कारण गंवाना नहीं चाहिए। अब समय है कि सरकार कागजों की योजनाओं से आगे बढ़कर जमीन पर ऐसी कार्रवाई करे जिसका असर हर नागरिक की सांस में महसूस हो।