महाराष्ट्र के शहरी इलाकों में जन्म के समय लिंगानुपात तेजी से गिरा, हरियाणा के औसत के बराबर पहुंचा: SRS रिपोर्ट
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र के शहरी क्षेत्रों में जन्म के समय लिंगानुपात गिरकर 885 हो गया है, जो हरियाणा...

मुख्य बिंदु
- क्या हुआ: महाराष्ट्र के शहरी इलाकों में जन्म के समय लिंगानुपात (Sex Ratio at Birth) तेजी से गिरकर प्रति 1,000 लड़कों पर 885 लड़कियों पर आ गया है, जो हरियाणा के समग्र औसत के बराबर है।
- यह क्यों महत्वपूर्ण है: शहरी इलाकों में आई इस भारी गिरावट ने ग्रामीण क्षेत्रों में हुई प्रगति को पूरी तरह से बेअसर कर दिया है, जिससे राज्य का समग्र औसत 899 पर ही बना हुआ है, जो राष्ट्रीय औसत 918 से काफी कम है।
- क्या बदलाव आ रहे हैं: राज्य बढ़ती जनसांख्यिकीय चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिसमें तेजी से बढ़ती बुजुर्गों की आबादी और निजी स्वास्थ्य सुविधाओं पर अत्यधिक निर्भरता शामिल है।
- कौन प्रभावित हो रहा है: इससे शहरी समुदाय, स्वास्थ्य सेवा प्रशासक और शहरी क्षेत्रों में लैंगिक असंतुलन को दूर करने के प्रयास में जुटे नीति निर्माता सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।
महाराष्ट्र के जन्म दर सूचकांक में विरोधाभासी रुझान
हाल ही में जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) सांख्यिकीय रिपोर्ट 2024 के अनुसार, पिछले एक दशक में महाराष्ट्र में जन्म के समय समग्र लिंगानुपात लगभग स्थिर रहा है। राज्य में वर्ष 2022-24 की अवधि के दौरान प्रति 1,000 लड़कों पर औसतन 899 लड़कियां दर्ज की गईं, जो 2012-14 के 896 से मामूली रूप से अधिक है।
यह आंकड़ा अभी भी 918 के राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। हालांकि, ये आंकड़े एक बड़े शहरी-ग्रामीण अंतर को छिपाते हैं। जहां ग्रामीण क्षेत्रों में सुधार हुआ और यह 888 से बढ़कर 910 हो गया, वहीं शहरी क्षेत्रों में लिंगानुपात 908 से गिरकर 885 पर आ गया, जिसने ग्रामीण क्षेत्रों की प्रगति को पूरी तरह खत्म कर दिया।
देश की तुलना में विपरीत रुझान
शहरी इलाकों में आई इस गिरावट ने ग्रामीण क्षेत्रों के सुधारों को बेअसर कर दिया है, जिससे जन्म के समय राज्य का समग्र लैंगिक संतुलन राष्ट्रीय औसत से नीचे बना हुआ है। पूरे भारत में, आमतौर पर शहरों में जन्म के समय बेहतर लैंगिक समानता दर्ज की जाती है।
अखिल भारतीय स्तर पर शहरी क्षेत्रों का औसत प्रति 1,000 लड़कों पर 928 लड़कियां है, जो राष्ट्रीय ग्रामीण औसत 914 से काफी बेहतर है। लेकिन महाराष्ट्र में इसका बिल्कुल उल्टा रुझान देखने को मिल रहा है, जहां इसके शहरी केंद्र ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में बहुत खराब प्रदर्शन कर रहे हैं। राज्य का शहरी लिंगानुपात (885) अब हरियाणा के राज्य औसत (885) के बराबर है।
राष्ट्रीय स्तर पर महाराष्ट्र की स्थिति
लैंगिक समानता के मामले में महाराष्ट्र अग्रणी राज्यों से काफी पीछे है। देश में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल हैं:
- छत्तीसगढ़: प्रति 1,000 लड़कों पर 978 लड़कियां
- केरल: प्रति 1,000 लड़कों पर 974 लड़कियां
- हिमाचल प्रदेश: प्रति 1,000 लड़कों पर 956 लड़कियां
- आंध्र प्रदेश: प्रति 1,000 लड़कों पर 946 लड़कियां
- असम: प्रति 1,000 लड़कों पर 946 लड़कियां
वर्तमान में, महाराष्ट्र सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों से थोड़ा ही ऊपर है। यह केवल बिहार (896), हरियाणा (885), दिल्ली (876) और उत्तराखंड (872) से ही आगे है।
अन्य सामाजिक संकेतकों पर बेहतर प्रदर्शन
शहरी जन्म दर में गिरावट का यह रुख अन्य सामाजिक क्षेत्रों में महाराष्ट्र की सफलता के बिल्कुल विपरीत है। राज्य की कुल प्रजनन दर (TFR) प्रति महिला 1.4 बच्चे है, जो 1.9 के राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। केवल दिल्ली (1.2), केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल (प्रत्येक 1.3) में प्रजनन दर इससे कम है।
राज्य में बाल विवाह भी बहुत कम है, जो कुल विवाहों का केवल 1% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 2.1% है। इसके अतिरिक्त, महिलाओं के लिए विवाह की औसत आयु 23.4 वर्ष है, जो 23.1 वर्ष के राष्ट्रीय औसत से थोड़ी अधिक है।
निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक निर्भरता और बुजुर्गों की बढ़ती आबादी
राज्य में संस्थागत प्रसव (अस्पतालों में प्रसव) का स्तर काफी ऊंचा है, लेकिन इसके लिए निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भरता बहुत अधिक है। जहां राष्ट्रीय स्तर पर 72% प्रसव सरकारी अस्पतालों में होते हैं, वहीं महाराष्ट्र में 40.9% प्रसव निजी सुविधाओं में होते हैं।
आंकड़े यह भी बताते हैं कि महाराष्ट्र की आबादी तेजी से बुजुर्ग हो रही है। 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के नागरिक कुल आबादी का 10.4% हैं, जो 9.7% के राष्ट्रीय औसत से अधिक है। इस जनसांख्यिकीय बदलाव को दर्शाते हुए, राज्य में होने वाली कुल मौतों में वरिष्ठ नागरिकों की हिस्सेदारी 67.2% है, जबकि पूरे भारत में यह 60.8% है। यह बुजुर्गों और जराचिकित्सा (geriatric) देखभाल के बढ़ते महत्व को रेखांकित करता है।
आगे क्या होने की संभावना है?
विशेषज्ञ इस बात पर नजर रखेंगे कि क्या राज्य प्राधिकारी गिरते लिंगानुपात से निपटने के लिए शहरी नगर पालिकाओं में विशेष अभियान शुरू करते हैं। भविष्य के नीतिगत बदलावों में मुख्य रूप से निजी स्वास्थ्य केंद्रों में लिंग चयन विरोधी कानूनों को सख्ती से लागू करने पर ध्यान केंद्रित किए जाने की उम्मीद है। इसके साथ ही, तेजी से बदलते जनसांख्यिकीय रुझानों के कारण बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं पर राज्य के संसाधनों का आवंटन बढ़ाना होगा।
