कैयासोत डैम के पास ‘व्हिस्परिंग पाम्स’ कॉलोनी में अवैध निर्माण पर MP हाईकोर्ट सख्त, शीर्ष IAS अफसरों और बिल्डर समेत कई को नोटिस
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बुधवार को भोपाल की पॉश कॉलोनी ‘व्हिस्परिंग पाम्स’ (Whispering Palms) में कथित अवैध निर्माण को लेकर राज्य के दो सेवानिवृत्त वरिष्ठ IAS...

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बुधवार को भोपाल की पॉश कॉलोनी ‘व्हिस्परिंग पाम्स’ (Whispering Palms) में कथित अवैध निर्माण को लेकर राज्य के दो सेवानिवृत्त वरिष्ठ IAS अधिकारियों, एक व्यवसायी, शहरी प्रशासन आयुक्त, नगर निगम आयुक्त, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग निदेशक और कॉलोनी के बिल्डर को नोटिस जारी किया है। अदालत ने यह कदम क्षेत्र में मास्टर प्लान-2005 के नियमों के उल्लंघन के आरोपों पर प्रारंभिक सुनवाई के बाद उठाया।
मास्टर प्लान-2005 का उल्लंघन, पर्यावरणीय जोन में अतिक्रमण का आरोप
याचिकाकर्ता महेश सिंह परमार और राजबहादुर प्रसाद की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि ‘व्हिस्परिंग लेआउट’ परियोजना को भोपाल मास्टर प्लान-2005 के तहत लो-डेंसिटी (कम घनत्व) क्षेत्र के रूप में स्वीकृति दी गई थी। इसके अनुसार, क्षेत्र में निर्माण घनत्व बहुत सीमित रखा गया है ताकि कैयासोत डैम के आसपास की पर्यावरणीय संवेदनशीलता बरकरार रहे।
लो-डेंसिटी जोन में अनुमत फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) 1:0.06 तय है, यानी किसी 10,000 वर्गफीट के प्लॉट पर अधिकतम 600 वर्गफीट तक निर्माण की अनुमति है।
हालांकि, याचिका में दावा किया गया है कि कई निवासियों ने नियमों की अनदेखी करते हुए प्लॉट के 50% से अधिक (5,000 वर्गफीट से ऊपर) निर्माण कर लिया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान हुआ है बल्कि शहर के दीर्घकालिक विकास नियोजन की भावना को भी ठेस पहुँची है।
“पर्यावरणीय संतुलन और शहरी योजना पर गंभीर असर”
याचिकाकर्ताओं के वकील राहुल दिवाकर और हर्षवर्धन तिवारी ने अदालत में तर्क दिया कि क्षेत्र की ज़ोनिंग का उद्देश्य डैम और उसके जलग्रहण क्षेत्र की सुरक्षा था। इस तरह के अतिक्रमण से न सिर्फ शहरी नियोजन व्यवस्था कमजोर होती है, बल्कि जल संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित विभागों की मौन स्वीकृति या लापरवाही ने इन अवैध निर्माणों को बढ़ावा दिया है।
अदालत का संज्ञान और आगे की सुनवाई
न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 24 नवंबर को निर्धारित की है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि याचिका में लगाए गए आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो यह मामला न केवल मास्टर प्लान के उल्लंघन का बल्कि पर्यावरणीय नियमों की अवमानना का भी गंभीर उदाहरण माना जाएगा।
विशेषज्ञों की राय
शहरी नियोजन विशेषज्ञ प्रो. एस.के. चौधरी का कहना है, “भोपाल के जलस्रोतों के पास लो-डेंसिटी जोन इसलिए बनाए गए हैं ताकि अति-निर्माण और प्रदूषण से बचाव हो सके। यदि इन नियमों की अनदेखी की गई तो भविष्य में शहर की जल सुरक्षा पर गहरा संकट आ सकता है।”
