दिव्यांगता कोटे में गड़बड़ी, प्राथमिक शिक्षक की नौकरी खत्म: MP सरकार पर उठ रहे सवाल
मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग में दिव्यांगता प्रतिशत की अनदेखी के कारण एक प्राथमिक शिक्षक की नौकरी तीन साल बाद चली गई, जिससे सिस्टम पर...

मुख्य सारांश
क्या हुआ: मध्य प्रदेश में एक दिव्यांग प्राथमिक शिक्षक की नियुक्ति तीन साल बाद दिव्यांगता प्रतिशत कम होने के कारण समाप्त कर दी गई।
क्यों महत्वपूर्ण है: यह घटना स्कूली शिक्षा विभाग की प्रक्रिया में व्यवस्थित खामियों को उजागर करती है, जिससे दिव्यांगों के साथ अन्याय हुआ है और सरकार के लिए संभावित कानूनी चुनौतियां पैदा हो गई हैं।
क्या बदलाव: नियुक्ति समाप्ति का मतलब है कि अब स्कूल में एक पद खाली हो गया है, और शायद किसी अन्य योग्य दिव्यांग उम्मीदवार का अवसर छिन गया है।
कौन प्रभावित: सुरेंद्र पटेल, प्राथमिक शिक्षक, और संभावित रूप से एक अन्य योग्य दिव्यांग उम्मीदवार; मध्य प्रदेश का स्कूली शिक्षा विभाग।
व्यवस्थागत खामी से अन्यायपूर्ण समाप्ति
मध्य प्रदेश का स्कूली शिक्षा विभाग एक त्रुटिपूर्ण व्यवस्था के कारण एक बार फिर विवादों में घिर गया है, जिसके परिणामस्वरूप एक दिव्यांग व्यक्ति के साथ अन्याय हुआ है। विभाग की प्रक्रियाओं में हुई चूक के कारण एक योग्य दिव्यांग उम्मीदवार को नौकरी से वंचित कर दिया गया और एक अन्य की सेवा समाप्त कर दी गई।
समस्या की जड़ एक ऐसी व्यवस्था में निहित है, जिसके अनुसार रिपोर्टों में यह अपर्याप्त रूप से मजबूत बताई गई है। इस विफलता के कारण एक योग्य दिव्यांग व्यक्ति को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी, जबकि दूसरे को अवसर से वंचित होना पड़ा।
नियुक्ति और बाद में चिकित्सा मूल्यांकन
सुरेंद्र पटेल, जिनका रोल नंबर 22769673 है, को 30 मार्च 2023 को मध्य प्रदेश के _छतरपुर_ जिले में 'एचएच' (श्रवण बाधित) दिव्यांगता श्रेणी के तहत प्राथमिक शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। उनके नियुक्ति आदेश में एक चिकित्सा जांच का प्रावधान शामिल था। इसके बाद, पटेल को सागर में एक मंडल स्तरीय चिकित्सा बोर्ड मूल्यांकन के लिए भेजा गया।
दिव्यांगता प्रतिशत आवश्यकताओं से कम
सागर के मंडल चिकित्सा बोर्ड ने अपनी 18 जून 2026 की रिपोर्ट में, पटेल की श्रवण बाधित श्रेणी में दिव्यांगता को 23 प्रतिशत प्रमाणित किया। यह प्रतिशत सरकारी सेवा के लिए आवश्यक 40 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता की न्यूनतम सीमा से कम पाया गया। नियुक्ति समाप्ति के आदेश में दिव्यांगजन (समान अवसर, अधिकार संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 2016 का उल्लेख है, विशेष रूप से धारा 2(d) जो एक दिव्यांग व्यक्ति को परिभाषित करती है। अधिनियम पूर्ण और प्रभावी भागीदारी में बाधा डालने वाली दीर्घकालिक अक्षमताओं पर जोर देता है।
सुनवाई का अवसर और अपर्याप्त प्रतिक्रिया
चिकित्सा मूल्यांकन के बाद, पटेल को 29 जून 2026 को सुनवाई का अवसर दिया गया। इस सुनवाई के दौरान, उन्होंने अपना पक्ष रखा लेकिन अपने दिव्यांगता प्रतिशत के संबंध में अपनी पात्रता को पर्याप्त रूप से सही नहीं ठहरा सके। आधिकारिक प्रतिक्रिया में कहा गया कि पटेल के तर्क संतोषजनक नहीं थे और वे दिव्यांगता श्रेणी के तहत नियुक्ति के लिए आवश्यक मानदंडों को पूरा नहीं करते थे।
“प्रतिवादी ने 29.06.2026 को अपना प्रतिवाद प्रस्तुत किया, लेकिन श्री पटेल अपनी दिव्यांगता के संबंध में अपना मामला प्रस्तुत नहीं कर सके, और उत्तर संतोषजनक नहीं पाया गया।”
_छतरपुर_ के उप-समाहर्ता और जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा जारी नियुक्ति समाप्ति आदेश में कहा गया कि पटेल को पद पर बनाए रखना कानूनी रूप से संभव नहीं था। नतीजतन, उनकी नियुक्ति तत्काल प्रभाव से रद्द कर दी गई।
विभागीय प्रक्रियाओं पर उठाए गए सवाल
इस घटना ने स्कूली शिक्षा विभाग की प्रक्रियात्मक खामियों को लेकर कड़ी आलोचना को जन्म दिया है। यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि दस्तावेज़ सत्यापन चरण के दौरान दिव्यांगता प्रतिशत का पूरी तरह से सत्यापन क्यों नहीं किया गया। पुलिस जैसे कुछ अन्य सरकारी क्षेत्रों में भर्ती प्रक्रियाओं के विपरीत, जहां शारीरिक परीक्षण अलग से किए जाते हैं, दिव्यांग उम्मीदवारों को सामान्य उम्मीदवारों के साथ नियुक्त किया गया था।
यह अंतिम नियुक्ति से पहले दिव्यांग आवेदकों के लिए अलग, समर्पित चिकित्सा मूल्यांकन प्रोटोकॉल की कमी के बारे में चिंताएं पैदा करता है। यदि पहले एक अलग मूल्यांकन किया गया होता, तो पटेल की पात्रता पर नियुक्ति से पहले ही निर्णय लिया जा सकता था। यदि उन्हें 40% से कम दिव्यांग पाया जाता, तो प्रतीक्षा सूची से किसी अन्य योग्य उम्मीदवार को पद की पेशकश की जा सकती थी। वर्तमान स्थिति के कारण तीन साल बाद एक पद खाली हो गया है, एक योग्य दिव्यांग व्यक्ति ने अपनी नौकरी खो दी है, और सरकार संभवतः व्यवस्थागत त्रुटियों के कारण उच्च न्यायालय में मुकदमेबाजी का सामना कर सकती है।
आगे क्या देखें
मध्य प्रदेश का स्कूली शिक्षा विभाग दिव्यांग उम्मीदवारों की भर्ती और सत्यापन प्रक्रियाओं को लेकर जांच का सामना करने की संभावना है। इसी तरह के मामलों की आगे की जांच और भविष्य में होने वाले अन्याय को रोकने के लिए नीतिगत संशोधनों की उम्मीद है।
