BREAKING
Revolutionary climate technology breakthrough announced • Championship finals draw record 150M+ viewers • Global markets surge following policy changes • New discovery in quantum computing promises faster processors
Regional

माँ की धारा निर्मल रहे, यही तर्पण की सच्ची अंजलि

नदी संरक्षण की सफलता का सबसे बड़ा आधार केवल नदी की सतह से कचरा हटाना नहीं, बल्कि प्रदूषण को नदी तक पहुंचने से रोकना है।

Few hours ago
8 min read
माँ की धारा निर्मल रहे, यही तर्पण की सच्ची अंजलि

— एडवोकेट दिनेश सिकरवार

भारत में नदी केवल बहता हुआ जल नहीं है। वह जीवन है, आस्था है, संस्कृति है और पीढ़ियों को जोड़ने वाली निरंतर धारा है। गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा, सरयू, महानदी और देश की असंख्य नदियों को भारतीय समाज ने सदियों से श्रद्धा के साथ देखा है। उन्हें माँ, मैया और जीवनदायिनी कहकर पुकारा गया है। स्नान, आचमन, तर्पण, पूजा, पर्व और तीर्थ जैसे अनेक संस्कार नदियों से जुड़े हैं।

 

श्राद्ध-पक्ष में नदी और जल के प्रति यह भावना और गहरी हो जाती है। जब कोई व्यक्ति अपने पितरों को जल की अंजलि देता है, तब वह केवल एक धार्मिक परंपरा का पालन नहीं करता, बल्कि अपनी पिछली पीढ़ियों के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त करता है। ऐसे अवसर पर एक विचार स्वाभाविक रूप से सामने आता है—जिस जल को हम पवित्र मानकर पितरों को अर्पित करते हैं, उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए निर्मल रखना क्या हमारी जिम्मेदारी नहीं है?

 

आज इस प्रश्न का उत्तर निराशा में नहीं, बल्कि सकारात्मक संकल्प में तलाशने की जरूरत है। भारत में नदियों की स्थिति को लेकर चुनौतियां अवश्य हैं, लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष यह भी है कि नदी संरक्षण के क्षेत्र में लगातार काम हो रहा है और कई स्थानों पर सुधार के संकेत सामने आए हैं।

 

 इनमें 271 नदियों में 296 प्रदूषित नदी-खंड चिन्हित किए गए। यह संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ एक सकारात्मक तथ्य भी सामने आया है। 2018 के आकलन में प्रदूषित नदी-खंडों की संख्या 351 थी, जो 2025 के आकलन में घटकर 296 रह गई। पहले चिन्हित 219 प्रदूषित नदी-खंडों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया और 148 नदी-खंड अब प्रदूषित नदी-खंडों की सूची में नहीं रहे। यह बताता है कि निरंतर प्रयासों से नदी की स्थिति बदली जा सकती है।

 

नदी संरक्षण की सफलता का सबसे बड़ा आधार केवल नदी की सतह से कचरा हटाना नहीं, बल्कि प्रदूषण को नदी तक पहुंचने से रोकना है। इसके लिए सीवेज का उपचार, औद्योगिक अपशिष्ट का नियमन, ठोस कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन और नदी तटों की सुरक्षा जरूरी है। जब शहर का गंदा पानी बिना उपचार नदी में जाने से रोका जाएगा, तभी नदी की वास्तविक निर्मलता सुनिश्चित होगी।

 

गंगा संरक्षण के लिए चलाए जा रहे नमामि गंगे कार्यक्रम में इसी व्यापक दृष्टिकोण को अपनाया गया है। कार्यक्रम में सीवरेज उपचार, नदी तट विकास, नदी की सतह की सफाई, जैव-विविधता संरक्षण, वनीकरण, जन-जागरूकता, औद्योगिक अपशिष्ट की निगरानी और गंगा ग्राम जैसे कई पहलुओं को शामिल किया गया है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार कार्यक्रम के तहत 200 सीवरेज अवसंरचना परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी, जिनकी कुल लागत करीब 31,810 करोड़ रुपये थी; इनमें 116 परियोजनाएं पूरी होकर संचालित हो चुकी थीं।

 

यह आंकड़ा यह संदेश देता है कि नदी स्वच्छता केवल सफाई कर्मचारियों या सरकारी विभागों का काम नहीं है। इसके लिए इंजीनियरिंग, पर्यावरण विज्ञान, नगर नियोजन, उद्योग, कृषि, स्थानीय प्रशासन और नागरिक समाज—सभी को एक साथ काम करना होगा।

 

नदियों को साफ रखने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी शहरों की है, क्योंकि बड़ी मात्रा में घरेलू सीवेज और ठोस कचरा शहरी क्षेत्रों से निकलता है। यदि प्रत्येक शहर अपने सीवेज का प्रभावी उपचार सुनिश्चित कर ले और बिना उपचार के नालों का पानी नदी में पहुंचना बंद हो जाए, तो नदी प्रदूषण की समस्या में बड़ा बदलाव आ सकता है।

 

मध्य प्रदेश के संदर्भ में भी नदी संरक्षण को स्थानीय स्तर पर गंभीरता से देखने की जरूरत है। नर्मदा, चंबल, बेतवा, क्षिप्रा, ताप्ती और अन्य नदियां प्रदेश के जीवन, कृषि और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हैं। इन नदियों की स्वच्छता केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि प्रदेश की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ी हुई है।

 

केंद्रीय आकलन में मध्य प्रदेश की कई नदी प्रणालियों के साथ सीवेज उत्पादन और उपचार क्षमता के बीच अंतर भी सामने आता है। उदाहरण के लिए बेतवा नदी से संबंधित क्षेत्रों में करीब 431 एमएलडी सीवेज उत्पादन के मुकाबले 80.48 एमएलडी उपचार क्षमता दर्ज की गई। नर्मदा, गौर और वैनगंगा से संबंधित क्षेत्रों में करीब 249 एमएलडी सीवेज उत्पादन के मुकाबले 150 एमएलडी उपचार क्षमता दर्ज की गई। खान नदी से संबंधित क्षेत्र में करीब 450 एमएलडी सीवेज उत्पादन और 90 एमएलडी उपचार क्षमता का आंकड़ा दर्ज है। ये आंकड़े बताते हैं कि आगे की सबसे बड़ी जरूरत सीवेज उपचार क्षमता बढ़ाने और मौजूदा संयंत्रों को प्रभावी ढंग से संचालित करने की है।

 

लेकिन समाधान केवल सरकार से अपेक्षा करने में नहीं है। नागरिक का व्यवहार भी नदी के भविष्य को तय करता है। पूजा सामग्री, प्लास्टिक, कपड़े, घरेलू कचरा या अन्य अपशिष्ट नदी में डालने से बचना एक छोटा कदम दिखाई दे सकता है, लेकिन करोड़ों नागरिक यदि यही संकल्प लें तो उसका प्रभाव बहुत बड़ा होगा।

 

श्राद्ध-पक्ष में तर्पण करते समय नदी में सामग्री प्रवाहित करने की परंपरा को भी पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सकता है। पूजा सामग्री के लिए अलग संग्रह केंद्र, जैविक सामग्री का उचित निस्तारण और प्लास्टिक का पूर्ण बहिष्कार धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच सुंदर संतुलन बना सकता है।

 

हमारी परंपरा प्रकृति के प्रति सम्मान सिखाती है। इसलिए नदी को स्वच्छ रखना हमारी संस्कृति के विरुद्ध नहीं, बल्कि संस्कृति की मूल भावना के अनुरूप है। नदी में कचरा न डालना भी सेवा है। किसी नाले का गंदा पानी नदी में जाने से रोकना भी नदी पूजा है। नदी किनारे पौधा लगाना भी पर्यावरण साधना है। जल का अपव्यय रोकना भी आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी है।

 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नदी संरक्षण को केवल शिकायत का विषय न बनाया जाए। हर नागरिक अपने स्तर पर कुछ कर सकता है। मोहल्ले में नदी या तालाब की सफाई के लिए जागरूकता पैदा की जा सकती है। स्थानीय निकाय को प्रदूषण की सूचना दी जा सकती है। प्लास्टिक के स्थान पर पर्यावरण अनुकूल सामग्री अपनाई जा सकती है। धार्मिक आयोजनों में नदी संरक्षण का संदेश दिया जा सकता है। स्कूलों और महाविद्यालयों में जल संरक्षण को व्यवहारिक शिक्षा का हिस्सा बनाया जा सकता है।

 

नदी के प्रति श्रद्धा तभी सार्थक होगी, जब श्रद्धा हमारे व्यवहार में दिखाई दे। आरती के दीपक से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसी नदी में हम कचरा न डालें। तर्पण की अंजलि से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जिस जल को पवित्र मानते हैं, उसे गंदा करने से स्वयं को रोकें।

 

यह भी समझना होगा कि नदी की स्वच्छता केवल आज की आवश्यकता नहीं है। स्वच्छ नदी का सीधा संबंध भूजल, कृषि, पेयजल, मत्स्य पालन, जैव-विविधता और मानव स्वास्थ्य से है। नदी का पानी और नदी का पारिस्थितिक तंत्र जितना स्वस्थ होगा, उतना ही मजबूत हमारा भविष्य होगा।

 

नदी संरक्षण में तकनीक की भूमिका भी बढ़ रही है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, रियल टाइम जल गुणवत्ता निगरानी, औद्योगिक इकाइयों की निगरानी, जीआईएस आधारित मैपिंग और वैज्ञानिक जल प्रबंधन जैसे उपाय नदी संरक्षण को अधिक प्रभावी बना सकते हैं। लेकिन तकनीक तभी सफल होगी, जब उसका संचालन नियमित हो और नियमों का पालन भी सुनिश्चित किया जाए।

 

भारत में नदी संरक्षण की यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि सुधार संभव है। 2018 से 2025 के बीच प्रदूषित नदी-खंडों की संख्या में कमी और 148 नदी-खंडों का सूची से बाहर होना उम्मीद पैदा करता है। इसका अर्थ यह है कि सही योजना, निरंतर निगरानी, पर्याप्त निवेश और नागरिक सहयोग से नदियों की स्थिति बदली जा सकती है।

 

हमें नदी को केवल संकट के समय याद करने की आवश्यकता नहीं है। नदी के साथ हमारा संबंध वर्षभर का होना चाहिए। जिस तरह हम अपने घर की सफाई नियमित करते हैं, उसी तरह अपने जलस्रोतों के प्रति भी नियमित जिम्मेदारी निभानी होगी।

 

श्राद्ध-पक्ष हमें अतीत से जोड़ता है। पितरों का स्मरण हमें यह भी सिखाता है कि हम अपने पूर्वजों से मिली प्राकृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाएं। यदि हमने स्वच्छ नदियां आने वाली पीढ़ियों को दीं, तो यह भी एक प्रकार का तर्पण होगा।

 

गंगा को माँ कहना हमारी श्रद्धा है, नर्मदा को मैया कहना हमारी भावना है और हर नदी को जीवनदायिनी मानना हमारी सभ्यता का हिस्सा है। लेकिन इस संबोधन को कर्म से जोड़ना हमारा वर्तमान कर्तव्य है।

 

आइए, इस श्राद्ध-पक्ष में एक सकारात्मक संकल्प लें—नदी में कचरा नहीं डालेंगे, प्लास्टिक का उपयोग कम करेंगे, पूजा सामग्री को उचित स्थान पर देंगे, जल का सम्मान करेंगे और अपने आसपास के जलस्रोतों को स्वच्छ रखने में भागीदारी निभाएंगे।

 

तब हमारी अंजलि केवल जल की अंजलि नहीं होगी, बल्कि जिम्मेदारी की अंजलि होगी। तब तर्पण केवल पितरों के प्रति श्रद्धा नहीं रहेगा, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता भी बनेगा।

 

 

 

माँ को पूजना हमारी परंपरा है, लेकिन माँ की धारा को निर्मल रखना हमारी जिम्मेदारी। यदि श्रद्धा कर्म बन जाए और तर्पण संकल्प बन जाए, तो भारत की नदियों का भविष्य बदला जा सकता है। स्वच्छ नदी केवल पर्यावरण की उपलब्धि नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था और आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे सुंदर विरासत होगी।