जिन हाथों ने पीढ़ियां संवारीं, उनके कल में उजियारा कब होगा
समय के साथ आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियां भी बदली हैं।

एड.दिनेश सिंह सिकरवार
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका केवल किसी सरकारी योजना की अंतिम कड़ी नहीं हैं। वे बच्चों के पोषण, प्रारंभिक शिक्षा, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और परिवार कल्याण से जुड़ी सेवाओं को समाज के अंतिम छोर तक पहुंचाने वाली महत्वपूर्ण जमीनी कड़ी हैं। देश में करोड़ों लाभार्थियों तक पहुंचने वाली इस व्यवस्था की सफलता काफी हद तक उन महिलाओं के श्रम पर निर्भर है, जो सीमित संसाधनों के बीच लगातार अपने दायित्व निभाती हैं। ऐसे में सवाल केवल आंगनवाड़ी व्यवस्था के विस्तार का नहीं, बल्कि उसे चलाने वाली महिलाओं के वर्तमान और भविष्य की सुरक्षा का भी है।
मार्च 2026 तक देश में करीब 14.03 लाख आंगनवाड़ी केंद्र संचालित थे और इनके माध्यम से लगभग 8.98 करोड़ पंजीकृत लाभार्थियों तक सेवाएं पहुंच रही थीं। पूरक पोषण, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, पोषण एवं स्वास्थ्य शिक्षा, टीकाकरण, स्वास्थ्य जांच और जरूरत पड़ने पर रेफरल जैसी सेवाएं इस व्यवस्था का हिस्सा हैं। यह आंकड़ा बताता है कि आंगनवाड़ी तंत्र देश के सामाजिक विकास और बाल कल्याण की एक बड़ी आधारभूत व्यवस्था है।
समय के साथ आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियां भी बदली हैं। अब उन्हें केवल बच्चों और माताओं तक सेवाएं पहुंचाने तक सीमित नहीं रहना पड़ता, बल्कि डिजिटल माध्यमों पर विभिन्न जानकारियां दर्ज करने, बच्चों की वृद्धि और पोषण की निगरानी करने तथा योजनाओं से संबंधित आंकड़ों को नियमित रूप से अपडेट करने की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है। तकनीक ने निगरानी और पारदर्शिता के नए अवसर दिए हैं, लेकिन इसके साथ कार्यकर्ताओं पर काम का दबाव और तकनीकी जिम्मेदारियां भी बढ़ी हैं।
इसके बावजूद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं नियमित सरकारी कर्मचारी के बजाय मानदेय आधारित कार्यकर्ता के रूप में कार्य करती हैं। केंद्र स्तर पर मुख्य आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के लिए 4,500 रुपये, मिनी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के लिए 3,500 रुपये और सहायिका के लिए 2,250 रुपये मासिक मानदेय का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन भी दिया जाता है। राज्यों की ओर से अतिरिक्त राशि मिलने के कारण वास्तविक भुगतान राज्यवार अलग-अलग हो सकता है।
यहीं से एक स्वाभाविक प्रश्न सामने आता है—जब जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं, लाभार्थियों की संख्या इतनी बड़ी है और डिजिटल रिपोर्टिंग सहित कार्य का स्वरूप लगातार विस्तृत हो रहा है, तो क्या मानदेय और सामाजिक सुरक्षा की समय-समय पर समीक्षा नहीं होनी चाहिए? यह प्रश्न किसी व्यक्ति या सरकार के विरोध का प्रश्न नहीं है। यह उस व्यवस्था की स्थिरता से जुड़ा प्रश्न है, जिसके माध्यम से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और माताओं तक महत्वपूर्ण सेवाएं पहुंचाई जाती हैं।
मध्य प्रदेश में भी आंगनवाड़ी व्यवस्था व्यापक स्तर पर संचालित है। राज्य में करीब 94 हजार से अधिक आंगनवाड़ी केंद्र हैं और हजारों कार्यकर्ता तथा सहायिकाएं गांवों, कस्बों और शहरी बस्तियों में अपनी सेवाएं दे रही हैं। इन केंद्रों की वास्तविक कार्यक्षमता का आधार केवल भवन या सरकारी योजना नहीं, बल्कि वहां प्रतिदिन काम करने वाली कार्यकर्ता और सहायिका हैं।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता स्थानीय परिवारों के साथ सीधे संपर्क में रहती हैं। बच्चों के पोषण और वृद्धि की निगरानी से लेकर माताओं को स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी जानकारी देने और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक उनका काम निरंतर संवाद और जिम्मेदारी से जुड़ा है। इसलिए उनकी भूमिका को केवल मानदेय प्राप्त करने वाले कार्यकर्ता के रूप में देखना इस सेवा की वास्तविक प्रकृति को सीमित कर देता है।
कोविड-19 महामारी के दौरान यह जमीनी भूमिका और स्पष्ट हुई। जब समाज भय और अनिश्चितता से गुजर रहा था, तब स्वास्थ्य और कल्याण से जुड़ी सेवाओं को घर-घर तक पहुंचाने के लिए स्थानीय स्तर के कार्यकर्ताओं पर निर्भरता बढ़ी। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं ने भी अपने क्षेत्रों में अनेक जिम्मेदारियां निभाईं।
मैंने स्वयं कोविड काल में महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा की ओर से गुना में स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन के साथ समन्वय करते हुए सेवा कार्यों को निकट से देखा। उस समय संस्था की ओर से प्रशासन को ऑक्सीजन कंसंट्रेटर उपलब्ध कराए गए और स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रशंसा-पत्र एवं सम्मान भी मिला। उसी दौर में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं की भूमिका तथा उनके सम्मान का प्रश्न भी मेरे सामने अधिक गंभीरता से आया।
मेरे लिए यह केवल व्यक्तिगत अनुभव का विषय नहीं है। इस अनुभव ने एक व्यापक प्रश्न को सामने रखा कि संकट के समय जिन स्थानीय कार्यकर्ताओं पर समाज और प्रशासन निर्भर करता है, उनके लिए स्थायी सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण की व्यवस्था कितनी मजबूत है?
सरकार की ओर से आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं के लिए विभिन्न सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाएं की गई हैं। पात्र कार्यकर्ता और सहायिकाएं प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना तथा प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना जैसी योजनाओं से जुड़ सकती हैं। स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए पात्र परिवारों को आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का लाभ भी उपलब्ध है। मातृत्व अवकाश और अन्य अवकाश व्यवस्थाओं के साथ पेंशन से जुड़ने के लिए प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन जैसी योजना भी मौजूद है।
कुछ परिस्थितियों में सहायिकाओं को कार्यकर्ता और कार्यकर्ताओं को पर्यवेक्षक जैसे पदों पर आगे बढ़ने के अवसर भी मिलते हैं। ये व्यवस्थाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सामाजिक सुरक्षा का अर्थ केवल बीमा या किसी योजना की पात्रता तक सीमित नहीं हो सकता।
बीमा दुर्घटना या मृत्यु की स्थिति में आर्थिक सहायता दे सकता है, लेकिन पर्याप्त और सम्मानजनक नियमित आय, वृद्धावस्था की सुरक्षा, सेवा के बाद आर्थिक स्थिरता, सुरक्षित कार्यस्थल और शिकायतों के प्रभावी समाधान की जरूरत अलग विषय हैं। किसी महिला ने यदि वर्षों तक समाज और बच्चों की सेवा की है, तो उसके भविष्य को केवल वर्तमान मानदेय के आधार पर नहीं देखा जा सकता।
सम्मान का अर्थ केवल किसी मंच पर माला पहनाना या प्रशस्ति-पत्र देना नहीं है। सम्मान का वास्तविक अर्थ ऐसी कार्य-व्यवस्था बनाना भी है, जिसमें जिम्मेदारी और उपलब्ध संसाधनों के बीच उचित संतुलन हो।
आज आंगनवाड़ी व्यवस्था डिजिटल हो रही है। पोषण ट्रैकर जैसे माध्यमों से बच्चों की उपस्थिति, वृद्धि मापन, प्रारंभिक बाल शिक्षा, पोषण सेवाओं और अन्य गतिविधियों की निगरानी की जा रही है। डिजिटल व्यवस्था पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने में उपयोगी हो सकती है, लेकिन उसके साथ कार्यकर्ताओं को पर्याप्त प्रशिक्षण, उपकरण, तकनीकी सहायता और व्यावहारिक कार्यभार देना भी जरूरी है। तकनीक का उद्देश्य कार्यकर्ता को सक्षम बनाना होना चाहिए, केवल उसकी जिम्मेदारियां बढ़ाना नहीं।
आंगनवाड़ी केंद्रों को बेहतर बनाने और उन्हें सक्षम आंगनवाड़ी के रूप में विकसित करने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। बेहतर बुनियादी सुविधाएं, बच्चों के अनुकूल वातावरण, पोषण और प्रारंभिक शिक्षा की व्यवस्था निश्चित रूप से आवश्यक है। लेकिन किसी भी योजना की सफलता केवल भवन, ऐप या आंकड़ों से तय नहीं होती। योजना को जमीन पर लागू करने वाला मानव संसाधन मजबूत होगा, तभी उसका वास्तविक लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा।
प्रशासन में अनुशासन और जवाबदेही जरूरी हैं। कार्यकर्ताओं के काम की निगरानी भी आवश्यक है। लेकिन निगरानी का उद्देश्य सेवा की गुणवत्ता सुधारना और मार्गदर्शन देना होना चाहिए। यदि किसी कार्यकर्ता को अनुचित दबाव, अपमानजनक व्यवहार या कार्यस्थल से जुड़ी समस्या का सामना करना पड़ता है, तो उसकी शिकायत सुनने और उसका निष्पक्ष तथा समयबद्ध समाधान करने की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
महिला को निर्देश चाहिए, भय नहीं; जवाबदेही चाहिए, अपमान नहीं।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की तुलना किसी अन्य सेवा क्षेत्र के कर्मचारियों से करना आवश्यक नहीं है। उनकी अपनी भूमिका ही समाज में सम्मान का पर्याप्त आधार है। वे बच्चों, गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और परिवारों तक पोषण, स्वास्थ्य जागरूकता और प्रारंभिक बाल विकास से जुड़ी सेवाएं पहुंचाती हैं। वे उस सामाजिक व्यवस्था की जमीनी कड़ी हैं, जहां सरकारी नीति सीधे परिवारों के जीवन से जुड़ती है।
अब आवश्यकता केवल तालियों की नहीं, नीति की है। मानदेय की समय-समय पर समीक्षा, सामाजिक सुरक्षा का विस्तार, वृद्धावस्था के लिए स्पष्ट व्यवस्था, कार्यभार और मानव संसाधन में संतुलन, डिजिटल जिम्मेदारियों के अनुरूप प्रशिक्षण तथा शिकायतों के निष्पक्ष निवारण जैसी व्यवस्थाओं पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
करीब नौ करोड़ लाभार्थियों तक पहुंचने वाली व्यवस्था को चलाने वाली महिलाओं के भविष्य पर भी उतना ही गंभीर ध्यान दिया जाना चाहिए, जितना उन बच्चों के भविष्य पर दिया जाता है जिनकी सेवा के लिए यह व्यवस्था बनाई गई है।
किसी राष्ट्र की प्रगति केवल नई योजनाओं की संख्या से नहीं मापी जाती। यह भी देखना पड़ता है कि उन योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने वाले लोगों की स्थिति कितनी मजबूत है।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका वर्षों से बच्चों के पोषण, माताओं की देखभाल और परिवारों के कल्याण में योगदान दे रही हैं। इसलिए उनका प्रश्न केवल मानदेय का प्रश्न नहीं है। यह श्रम की गरिमा, महिला सम्मान, सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक नीति की प्राथमिकताओं से जुड़ा प्रश्न है।
जिसने एक बच्चे को पोषण दिया, उसने भविष्य को पोषण दिया। जिसने संकट में समाज का साथ दिया, उसने मानवता का साथ दिया।
तो फिर सबसे बड़ा सवाल यही है—जिन हाथों ने पीढ़ियों को संभाला है, उन हाथों को अपने भविष्य के लिए सहारे की तलाश में कब तक रहना पड़ेगा?
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका किसी व्यवस्था की केवल कार्यकर्ता नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की जीवंत कड़ी हैं। इसलिए सरकार, प्रशासन और समाज के सामने चुनौती यही है कि उनके लिए सम्मान, सुरक्षा और भविष्य की ऐसी व्यवस्था मजबूत की जाए, जिसमें वर्षों की सेवा के बाद उनका अपना भविष्य अनिश्चितता में न रहे।
